श्री गणे श्री गणे मेरा जलंधर का वध करना कहां उचित होगा मैं ऐसा नहीं कर सकता महेश्वरी नहीं पिता श्री जिसका जन्म संकट मय है उसे बढ़ने देना कदापि उचित नहीं सर्वथा उचित है मां का सुझाव कृपया आप जालंधर का वध कर संसार को इस भावी संकट से मुक्त [संगीत] कराइए आप सभी को मेरा प्रणाम पिता श्री श्वर अगस्ति ने मुझे बताया कि कि जालंधर अब अकेला नहीं एक और कुटिल कपटी शक्ति जुड़ गई है उसके साथ हां पिता श्री जालंधर से उत्पन्न संकट और भी विकराल रूप धारण कर रहा है फिर भी आप उसका अंत क्यों नहीं करना चाहते पिता श्री अब आपने विलंब किया तो संसार का अनिष्ट हो सकता है स्वामी पिताजी इस संकट को तो आप यही रोक सकते हैं यह अन्याय होगा जब तक जलंदर सृष्टि के प्रति कोई बड़ा अपराध नहीं करता मैं उसे कैसे दंडित कर सकता हूं मानव दानव देव गंधर्व राक्षस यक्ष किनर सभी प्राणियों को जीवित रहने का अधिकार है बात मात्र और बुराई की नहीं जलंदर का वध मात्र इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका जन्म एक विशेष परिस्थिति में प्रकृति के विरुद्ध जाकर हुआ है मैं सबको पर्याप्त अवसर देता हूं कि सत्य के पर चले किंतु अपने अवसर का दुरुपयोग करने वाले निरंतर पाप करने वाले अतः स्वयं का ही अंत करते हैं किंतु यदि उसने इस अवसर का उचित लाभ उठाया तो मुझे जगत पिता होने के नाते उसे सनमार्ग पर चलने का अवसर तो देना ही होगा यद्यपि उसकी नियति विनाशकारी है किंतु यदि उसने अपनी इच्छा शक्ति से नियति को परिवर्तित कर धर्म और भक्ति का मार्ग चुना तो हमें प्रतीक्षा करनी [संगीत] [प्रशंसा] होगी क्योंकि किसी के भावी पापों की आशंका से उसे दंडित नहीं किया जा सकता इसलिए मैं अभी किसी का अंत कदा भी नहीं कर सकता [संगीत] किसी के साथ अन्याय कदा भी नहीं करूंगा चाहे वह जालंधर क्यों ना हो पिताश्री निर्णय ले चुके हैं तो आप प्रतीक्षा कर के सिवाय और कोई उपाय [संगीत] नहीं कहीं महादेव के इस धर्मो चित व्यवहार के कारण कोई बड़ा संकट ना उत्पन्न हो जाए प्रथम पूज्य गणेश जी मैं आपका कृतज्ञ हूं आपने दक्षिण को अकाल मुक्त किया और ऋषिवर के कमंडल से कावेरी नदी को मुक्त कर आपने दक्षिण वासियों के साथ-साथ हम पर भी बहुत बड़ा उपकार किया है हम आपके आभारी है इसमें उपकार कैसा देवराज वह तो मेरा परम कर्तव्य था मुझे प्रसन्नता तो इस बात की है कि अंततः ऋषि अगस्ती ने भी अपना मोह त्याग कर जन कल्याण में धर्म का साथ दिया किंतु गणेश जी मेरा कर्तव्य मुझे स्वर्ग लोक बुला रहा है आप सभी से अनुरोध है आप मुझे यहां से प्रस्थान करने की अनुमति दे [संगीत] प्रणाम देवी पार्वती अब हमें भी आज्ञा दे पुत्र गणेश आने वाले संकट के प्रति जागरूक रहकर उसके प्रति सभी को सावधान करना हमारा कर्तव्य था जिसका निर्वाह हम कर चुके हैं किंतु महादेव ने कहा है हमारा प्रतीक्षा करना ही उचित होगा वही हमें करना है कदाचित जालंधर कुमार्ग छोड़कर सनमार्ग का ही चुनाव करें उचित है फूपा जी चाहता तो मैं भी हूं कि ऐसा ही हो किंतु यदि ऐसा नहीं हुआ तो मुझे एक बार पुनः पिता श्री से बात करनी चाहिए प्रणाम फूपा जी प्रणाम मामा जी उचित कहते हैं पिता श्री भविष्य में कौन कैसा व्यवहार करेगा कौन जानता है किंतु दुष्ट की दुष्टता के प्रति सचेत रहना भी तो हमारा कर्तव्य है उसमें असावधानी हमारे लिए हानिकारक हो सकती है मेरे प्रिय बल श्रेष्ठ असुर गुरु शुक्राचार्य हमें इसी पर्वत पर मिलेंगे [संगीत] किंतु यह कठिन चढ़ाई पार कर हम हम उस शिखर तक पहुंचेंगे [संगीत] कैसे सर्वश्रेष्ठ जलंदर है तुम्हारे साथ फिर भी चिंता कर रही हो कठिन को सरल बनाना आता है मुझे चलो वृंदा चिंता त्यागो और मेरी पृष्ठ पर आरुण हो [संगीत] जाओ सर्वश्रेष्ठ जलंदर ले जाएगा तुम्हें इस पर्वत के शिखर पर उचित है मेरे प्रिय बल [संगीत] श्रेष्ठ [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] जो जो सर्वश्रेष्ट जलंदर के मार्ग में आएगा वो कितनी भी ऊंचाई पर स्थित क्यों ना हो मेरे समक्ष झुकने पर विवश हो [संगीत] जाएगा सागर की अतल गहराई को नाप चुका हूं मैं अब इस पर्वत की गगन चमी ऊंचाई की बारी [संगीत] है नहीं मुझे पूर्ण विश्वास है मेरे प्रिय पल श्रेष्ठ पर कुछ नहीं होने देंगे मुझे तुझ पर्वत कोई नहीं गिरा सकता सर्वश्रेष्ठ जलंदर को ऐसी कोई बाद नहीं जो सर्वश्रेष्ठ जलंदर को रोक सके इस सच पर्वत का इतना दु साहस जो मेरे पथ में बाधा [संगीत] बने मुझे चकड़े रहना वृंदा अवश्य [संगीत] श्रेष्ठ मेरे प्रिय बल श्रेष्ठ मेरा भार वाहन कर आप अपनी कठिनाई क्यों बढ़ा रहे हैं मैं आपका अनुसरण कर आपके पीछे पीछे आ जाऊंगी नहीं वृंदा मेरी प हो तुम तुमने मुझे उस असुर गुरु शुक्राचार्य के पास जाकर उनसे मार्गदर्शन प्राप्त करने का सुझाव देकर मेरे प्रति अपना कर्तव्य निभाया है तो अब मैं तुम्हारे प्रति अपना कर्तव्य निभाऊंगा इस पर्वत के शिखर पर मैं ही लेकर जाऊंगा [संगीत] तुम्हें [संगीत] नहीं नहीं कुछ नहीं हो सकता मुझे मुझे विश्वास है अपने बल श्रेष्ठ पर वो हमें गिरने नहीं [संगीत] [संगीत] देंगे [संगीत] सर्वश्रेष्ठ जलंधर हूं मैं जो चाहता हूं वो करके दिखाता हूं प्रणाम पिता श्री मुझे क्षमा करें पिता श्री मैं आपसे वाद विवाद करने की दृष्ट कदापि नहीं कर सकता आपकी मान्यता है कि अवसर तो सबको प्राप्त होना चाहिए वह तो ज्ञात है मुझे पिताश्री और यह भी ज्ञात है कि अभी तक जालंधर ने किसी को हानि भी नहीं पहुंचाई है किंतु जब से आपकी क्रोधाग्नि सागर में गिरी है तभी से फूफाजी ब्रह्मदेव को संकट का पूर्वाभास हो रहा है ऋषिवर अगस्ती को भी भावी अनिष्ट का भान हुआ है पिता श्री तो क्या इसके पश्चात भी हमें सावधान नहीं रहना चाहिए सावधान रहना उचित होगा गणेश किंतु पूर्वाभास के आधार पर किसी को दंडित करना यह उचित नहीं पिता श्री मैं आपसे पूर्ण रूप से सहमत हूं कि दंड का अधिकारी तो अपराधी ही होता है किंतु जालंधर की आसुरी प्रवृत्ति भी हमसे छिपी नहीं जिसका अर्थ है उसका झुकाव अवश्य अधर्म की ओर ही [संगीत] होगा और वो जब कोई ऐसा अपराध करेगा तो उसे उसका दंड अवश्य [प्रशंसा] मिलेगा किंतु अभी हमारा प्रतीक्षा करना ही उचित है गणेश विता जब अपना शीश उठाएगी हमें उसको मिटाने का उपाय भी अवश्य प्राप्त होगा पिता श्री नियति की अपार शक्ति को तो महानतम ऋषि और तपस्वी भी नहीं नकार पाते फिर जालंधर तो एक असुर मात्र है आप कहते हैं कि विपदा आएगी तब उसका समाधान ढूंढेंगे हम किंतु पिता श्री मुझे आभास हो रहा है कि विपदा तो हमारे समक्ष आकर ही रहेगी ओम नमः शिवाय ओम नमः [संगीत] शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः [संगीत] शिवाय वृंदा कहां है तुम्हारे असुर शुक्राचार्य ओम नमः शिवाय बल श्रेष्ठ हस गुरु शुक्राचार्य ओम नमः शिवाय असुर गुरु वहां ध्यान मगन है ओम नमः शिवाय व्यर्थ के ध्यान में अपना समय गवा रहे [संगीत] हैं ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः [संगीत] शिवाय असुर गुरु शुक्राचार्य असुर गुरु शुक्राचार्य असुर गुरु शुक्राचार्य [संगीत] [संगीत] महादेव प्रभु आप यहां मेरे आराध्य महादेव आप स्वयं यहां मैं धन्य हो गया प्रभु धन्य हो गया [संगीत] [संगीत] हे इतना बड़ा छलावा वो भी मेरे असुर गुरु शुक्राचार्य के साथ महादेव का रूप धारण करिए जो भी है यह मेरे साथ इसका यह परिहास उचित नहीं तो आप ही है वह सगुरु शुक्राचार्य जिनकी महिमा का गुणगान करते मेरी पत्नी की जीवा नहीं थकती [संगीत] प्रणाम असुर गुरु मैं वृंदा [संगीत] हूं और यह मेरे प्रिय बल श्रेष्ठ सर्वश्रेष्ठ जलंधर हम आपके पास यहां मार्गदर्शन के लिए आए हैं अवश्य लेंगे मार्गदर्शन किंतु सर्वप्रथम मुझे यह बताइए कि असुर गुरु आपने मुझे महादेव कह के संबोधित क्यों किया कहिए क्या मैं महादेव के समान दिखाई देता हूं यदि इसके मुख पर इन चिन्हों का विकार ना होता तो कोई इसमें और महादेव में भेद ही नहीं कर पाता कदाचित मैं भी नहीं कौन है ये पाखंडी मुझे महादेव पुकारा इन्होंने मेरे समक्ष हाथ जोड़कर नत मस्तक थया सरगुरु और अभी भी मुझे देखकर स्तम खड़े हैं क्या इसका कारण आ समझा उत्तम अधि उत्तम वृंदा उचित कहा था तुमने असुर गुरु शुक्राचार्य हमें संसार पर विजय प्राप्त करने का मार्ग दिखाएंगे हां मेरे प्रिय बल श्रेष्ठ किंतु असुर गुरु ने तो अभी तक हमसे कुछ कहा भी नहीं तो जितना वो कह चुके पर्याप्त है मेरे लिए समस्त संसार पर विजय प्राप्त करने का मार्ग ज्ञात करने आया था आपके पास सर्वश्रेष्ठ जलंदर किंतु वो तो मुझे स्वयं ही सूझ गया आपने मुझे महादेव पुकार कर उपाय सि दिया नवे पनक संसार के समक्ष आऊंगा नवीन भगवान बनूंगा और भगवान स्थापित होते ही संता संपूर्ण संसार मेरे अधीन हो जाएगा नवीन भगवान होंगे मेरे प्रिय मेरे प्रिय बल श्रेष्ठ हा उचित ही तो है बलशाली है बुद्धिमान है साहसी है सर्वश्रेष्ठ है तो भगवान होने के सर्वथा योग्य है ये विनाश काली विपरीत बुद्धि बल के अहंकार में आकर स्वयं को भगवान तुल्य समझने वाला गर्द की ऊर्ज
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