[संगीत] देव राजेंद्र यह सत्य में मेरा सौभाग्य ही है कि मुझे अपनी यात्रा और पूजा का आरंभ इतने दिव्य स्थान से करने का अवसर प्राप्त हुआ इसीलिए अब अविलंब मुझे अपनी पूजा करनी चाहिए किंतु भ्राता किंतु परंतु का समय नहीं है अभी गणेश मुझे पूजा के लिए भेल पत्र और पुष्प भी एकत्रित करने है भ्राता सुनिए तो नहीं गणेश अभी मैं कुछ भी नहीं सुनने वाला हूं सर्वप्रथम मैं अपना कर्तव्य पूर्ण करूंगा उसके पश्चात ही तुमसे कोई बात [संगीत] [संगीत] करूंगा [संगीत] ये पुष्प कहां चले [संगीत] गए वहां बेलपत्र है सर्वप्रथम वही ले लेता [संगीत] हूं बिल पत्र भी अश यह कौन है कहीं कोई असुर तो नहीं [संगीत] है यह हो क्या रहा है यह इसलिए हो रहा है भ्राता क्योंकि आपने अधूरी कथा सुनी पूरी कथा सुने बिना पूजा की सामग्री लेने चल दिए अधुरी का अर्थात हां भ्राता यह स्थान मात्र इसलिए तीर्थ नहीं है कि यहां प्रभु महादेव ने देवराज इंद्र को दर्शन दिए थे अपितु इसका तो एक और बड़ा कारण है वह भी तो सुन लीजिए एक और कारण क्या है वह कारण गणेश भ्राता श्री केदारनाथ धाम वह पावन स्थान है जहां प्रथम बार पिता श्री और माता ने समस्त संसार के समक्ष यह सत्य उजागर किया था कि कैसे दोनों पृथक होते हुए भी वैवाहिक रूप में एक ही है अ यही वह स्थान है जहां देह रूप में पिता श्री और मां एकाकार हुए और सर्वप्रथम अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट हुए सर्वप्रथम अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट हुए प्रणाम [संगीत] प्रभु [संगीत] संस्कारी सुशील सर्व गुण संपन्न है कुमारी देव सेना कैलाश को ऐसी एक योग पुत्र वधु की आवश्यकता है माता मेरा मन तो अधीर व्याकुल हुआ जा रहा है उन्हें यह बताने के लिए कि वही गणेश जी की होने वाली भाभी और और माता आपकी पुत्रवधू है मैं समझ सकती हूं नंदी जी किंतु अभी हमें थोड़ा धीरज रखना होगा पुत्र कार्तिके ने अभी विवाह के लिए अपनी स्वीकृति नहीं दी है प्रणाम माता माता मैंने अवश्य ही कोई महान पुण्य किए होंगे जो आपकी और जगत पिता महाद देव की छत्रछाया में सुरक्षित रहने का अवसर प्राप्त हुआ ये मेरा परम सौभाग्य है जो मुझे आपका स्नेह प्राप्त करने का अवसर मिला मां अरे अब तो लाया और माता तोतला जी क्या क्या कह रहे य ग अच्छा है कि तोतला जी को समझना बिल्कुल भी सरल नहीं माता ये ये क्या बोल रहे हैं और सभी मुझे इतनी उत्सुकता से क्यों देख रहे हैं पुत्री इनके कहने का अर्थ है कि कैलाश की छत्र छाया और मेरा स्नेह सदा तुम्हें प्राप्त [संगीत] होगा देवसेना को तो अपने पूर्व जन्म के वरदान की कोई स्मृति ही नहीं अन्यथा इसको लेकर कैलाश में जो उत्सुकता है उससे यह समझ जाती हम इसे अपने होने वाली पुत्र वधु के रूप में देख रहे हैं किंतु इसके मन में भी कार्तिके के भाती विवाह को लेकर कहीं अनिच्छा तो [संगीत] नहीं माता मैं आपकी कुछ सहायता [संगीत] करूं सीधे विवाह की चर्चा करना तो अनुचित होगा किंतु कथा सुनाने के माध्यम से मैं विवाह के महत्व को अवश्य समझा सकती हूं कदाचित इसे अपने पूर्व जन्म के वरदान का स्मरण हु आए और यह विवाह के लिए अपना मन बना ले तब तक गणेश भी अपने भ्राता को मना लेगा अब भ्राता को कैसे समझाऊ कि विवाह एक समझौता नहीं नहीं अपितु दायित्वों भरा मर्यादित जीवन की ओर बढ़ा एक पग है विवाह स्त्री और पुरुष दोनों को सुख विकास प्रदान करता है जिसमें एक दूसरे के लिए अपार प्रेम निस्वार्थ त्याग जैसे अनेक भाव समाहित होते हैं जिस प्रकार एक पुष्प सुगंध से मिलकर ही पूर्ण होता है उसी प्रकार स्त्री और पुरुष एकाकार होकर पूर्ण हो जाते हैं इसलिए जब भ्राता पिता श्री और मां के अर्धनारीश्वर रूप की महिमा सुनेंगे तो उनके एकात्म के महत्व को समझकर विवाह के लिए अवश्य तैयार हो [संगीत] जाएंगे अब फिर किस विचार में डूब गए हो तुम गणेश सुनाओ कथा आगे सुनाओ किस प्रकार पिता श्री और माने अर्धनारेश्वर रूप धारण किया अवश्य सुनाऊंगा भ्राता किंतु सर्वप्रथम आपको मेरे एक प्रश्न का उत्तर देना होगा पिता श्री और मां दोनों में महानतम कौन है श्रेष्ठ कौन है माता इस प्रश्न का उत्तर भला कोई कैसे दे सकता है स्त्री और पुरुष एक ही तत्व के दो रूप है इसीलिए एक ही तत्व के दो भागों में कौन श्रेष्ठ है यह भला कोई कैसे कह सकता है पिताश्री और मां दोनों श्रेष्ठता के चर्म है गणेश तुम मुझे शब्दों में उलझा रहे हो नहीं भ्राता इस प्रश्न का अर्धनारीश्वर की कथा से विशेष जुड़ाव है क्योंकि अर्धनारीश्वर की कथा का ऐसे एक भक्त से संबंध है जो प्रभु महादेव को ही श्रेष्ठतम माना करता था और उस भक्त का नाम था ऋषि [संगीत] भृंगी ओम नमः [संगीत] शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय प्रभु महादेव की पूजा में लीन ऋषि भृंगी ने केदार धाम को अपना निवास बना लिया अपने आरा प्रभु शंभू की आराधना और तपस्या करते करते ऋषि भृंगी भक्ति की उस पराकाष्ठा पर पहुंच गए कि प्रतिदिन भगवान को अपने भक्त को दर्शन देने के लिए आना पड़ता था और ऋषि भृंगी प्रभु के दर्शन के साथ ही अपने नेत्र खोलते और उनका मंत्र उच्चारण भी प्रभु प्रदक्षिणा के बाद ही थमता ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय ओम नमः [संगीत] शिवाय नागेंद्र हारा रागा महेश्वराय नित्या शुद्ध दिगंबराय तस्म नकारा नमः [संगीत] शिवाय ओम नमः शिवाय ऐसा कौन सा भक्त जिसे स्वामी स्वयं प्रतिदिन दर्शन देने जाते हैं मुझे यह ज्ञात करने की उत्सुकता हुई तो एक दिन मैं भी प्रभु के साथ केदार नाथ गई [संगीत] प्रणाम [संगीत] प्रभु ओम नमः [संगीत] शिवाय ओम नमः शिवाय [संगीत] हे प्रभु अपने इस भक्त की भक्ति स्वीकार करें प्रभु ओम नमः [संगीत] शिवाय ओम नमः शिवाय प्रभु का इतना निष्ठावान भक्त यह ज्ञात कर मेरा मन अति आनंदित है किंतु क्या इसे ज्ञात नहीं कि प्रभु और मैं तो अन भिन्न है ऋषि भृंगी ने अपनी संपूर्ण निष्ठा और भक्ति प्रभु महादेव पर उड़ेल दी और माता को सर्वथा अनदेखा कर दिया माता आपके सामने होने पर भी वो आपको क्यों नहीं देख सके मैं भी बहुत चकित थी तो इसीलिए दूसरे दिन भी मैं प्रभु के साथ गई और प्रभु के और भी निकट स्थित [संगीत] रही माता को लगा था ऐसा करने से ऋषि भृंगी उनकी भी प्रदक्षिणा करने पर विवश हो जाएंगे किंतु एक विचित्र हट था ऋषिवर का नमः शिवाय [संगीत] अर्थात मैंने उचित ही समझा था ऋषि भृंगी को मेरी भक्ति में कोई रुचि नहीं मां ने ऋषिवर को अपनी भूल सुधारने के और भी अवसर दिए वह पिता श्री के और भी निकट स्थित हो जाती किंतु ऋषिवर ने अपने हट का परित्याग नहीं किया वह एकमात्र प्रभु महादेव की प्रदक्षिणा करने का कोई ना कोई उपाय ढूंढ ही लेते [संगीत] थे ओम नमः शिवाय अगले दिवस माता ने इतना स्थान भी रिक्त नहीं छोड़ा कि एक नेवला भी उसमें से निकल [संगीत] सके ओम नमः शिवाय अंततः एक दिन माता ने निर्णय लिया कि वह प्रभु महादेव के अत्यंत निकट बैठेगी जिससे ऋषि भृंगी को उन दोनों के मध्य से निकलने का कोई स्थान प्राप्त ना [संगीत] हो [संगीत] प्रभु भक्ति का यह अर्थ नहीं कि भक्त उनके अर्ध भाग को ही स्वीकार करें ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय [संगीत] आपके क्रोध का कारण मुझे ज्ञात है प्रिय कभी कभी भक्त अपने आराध की भक्ति में इतने लीन हो जाते हैं कि वो अन्य किसी को स्वीकार ही नहीं कर पाते वो आपके प्रति निष्ठावान है ऋषि भृंगी आपके बड़े भक्त है मैं इसीलिए क्रोधित नहीं हूं स्वामी मेरे दुख का कारण है कि आपके भक्त होने पर भी वो आपकी अर्धांगिनी का तिरस्कार क्यों कर रहे हैं स्वामी क्योंकि यदि आप पिता है तो मैं माता हूं आप शिव है तो मैं आपकी शक्ति हूं फिर आपके भक्त का ये कैसा हट है प्रिय ऋषि सत्य को भूल रहे हैं कि आपके बिना मैं अपूर्ण हूं इसलिए वो मेरे अर्ध रूप की ही भक्ति कर रहे हैं किंतु अब समय आ गया है कि इस भक्त को ज्ञात हो जाए कि मेरे प्रति उसकी भक्ति अधूरी ही है प्रिय जग को सीख देने के लिए हमें एक ऐसा मार्ग अपनाना होगा जहां हम दो ना होकर एक हो ऐसा तालमेल का उदाहरण प्रस्तुत करें जिससे उच्च स्तर के जीवन के लिए समझौता करना सीख सके पिता श्री और मां दोनों एक समझौते के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार थे कैसा कैसा समझौता गणेश ऐसा समझौता जिसके अनुसार वह दोनों ऋषि भृंगी के साथ साथ संपूर्ण जगत को एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सीख देने वाले [संगीत] थे लोचन की जग में लागे नमः शिवाय बन का विन और नील शिवाय जध गंगा जग की प्यास [संगीत] बुझाए ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय नम [संगीत] शिवाय शरीर का मां और पिता श्री ने अपने अर्ध तनों का त्याग किया और संसार को प्रथम बार अपने अर्धनारीश्वर स्वरूप का दर्शन दिया ओ नम शिवाय काम कुम चता चता राजा पुल च राय नमवा शिवाय नम शिवाय नम शिवाय कितना अपूर्व दिव्य दृश्य रहा होगा ना गणेश मां और पिता श्री के इस रूप के दर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य तो मैं भी प्राप्त करना चाहूंगा दर्शन ही क्यों भ्राता आप स्वयं भी विवाह के पश्चात ऐसे बन सकते हैं मेरा अर्थ है यदि आप जीवन साझा करें तो किसी के साथ रहना वह तो अच्छा होता है ना हम भले ही कितने ही सामर्थ्य वान क्यों ना हो किंतु कभी-कभी किसी और का हमारे जीवन में होना हमें और भी आगे जाने के लिए उत्साहित करता है हमें निखार कर हमारे श्रेष्ठतम स्वरूप को बाहर लाता है जैसे मां और पिता श्री का यह महान [संगीत] महिमामंडन हैं और पूर्ण आकार लेते हैं वैसे ही एक पति और पत्नी एक दूसरे के साथ एकही का होकर एक दूसरे से अभिन्न हो जाते हैं इसलिए ऐसा दृढ़ और अटूट संबंध स्थापित करते हैं जो एकमात्र विवाह में ही स्थापित हो सकता है फिर तो श्री अर्धनारेश्वर के रूप के दर्शन पाकर ऋषि भृंगी भी समझ गए होंगे कि पति पत्नी एक दूसरे से विलग होकर भी एक दूसरे के भाग होते नहीं भ्राता ऋषि भृंगी तो अभी भी यह समझने में असमर्थ थे क्योंकि उनका अर्थ जन और उनका हट अभी भी उन पर हावी था प्रभु और माता की दिव्य अर्धनारीश्वर स्वरूप के दर्शन पाकर भी ऋषि भृंगी ने मा को देखकर भी अनदेखा ही किया और मात्र पिता श्री की प्रदक्षिणा करने के लिए एक मूषक का रूप धारण कर वो उन दोनों के मध्य कुतर कर मार्ग बनाने वाले [संगीत] थे माता को ऋषि की भावना का आभास हुआ तो उनका क्रोध चरम सीमा पर पहुंच गया [संगीत] [संगीत] [संगीत] रुकिए भगवान के लिए भक्त भी पुत्र समान ही होते हैं इसलिए यदि पुत्र कोई भूल करता है तो उसे सुधारना भी भगवान का ही कार्य होता है उस प्रकार भ की अजनता को दूर कर उसे उचित मार्ग पर लाना भगवान का ही का है अब आपको समझाने का एक ही उपाय है इसलिए अब मैं तुम्ह श्राप देती हूं तुम्ह अपने आराध्य के पुरुष तत्व में ही आस्था है ना तुम्हारे तन से तुम्हारा रक्त तुम्हारी मांस पेशिया जो तुम्हारे श्री तत्व से उत्पन्न हुई है वो इसी क्ण लुप्त हो जाए जिससे तुम्ह तुम्हारे आराध्य की पूर्णता का आभास हो सके [संगीत] [संगीत] मा सू शति स नमस्तय नमस्तय नमस्तय नम नम क्षमा करे माता मैं पूर्व में नहीं समझ पाया कि आप दोनों एक दूसरे के बिना अपूर्ण है माता शक्ति के बिना शिव नहीं और और शिव के बिना शक्ति है मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है इसके लिए मुझे श क्षमा करे माता आमीन आ इस सृष्टि के सभी के भीतर पुरुष और स्त्री तत्व दोनों दोनों एक दूसरे के पूरक है और जब विवाह उपरांत स्त्री और पुरुष एक साथ आते हैं तो पति पत्नी के रूप में अर्धनारेश्वर जागृत होता है और वो एक दूसरे से अभिन हो जाते इसमें दाहिने हाथ पर पुरुष और बाने हाथ पर स्त्री तत्व होता है जिसम से एक का भी ना होना उन्हे अप कर देता है अज्ञानता वश आपके इस भक्त से बहुत बड़ी भूल हुई है मैं आपको नहीं अपने आराध्य प्रभु महादेव के अर्ध भाग को अपमानित करने का अपराध किया है माता शवा करे माता शवा करे माता श कर तुमने य सत्य समझने में बहुत विलंब कर दिया इसीलिए अब मैं चाकर अपने श्राप को नहीं लौटा स ल स नहीं ल [संगीत] हठी व्यक्ति अपने हठ में सत्य को नहीं देख पाता और इस कारण उसे दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है
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