मां बस बहुत हुआ तुम्हारी जैसी संतान के लिए इस घर में कोई स्थान नहीं निकल जाओ इस घर से जब विवेक जाग्रत हो तब वापस आना मेरा विवेक तो जागृत है पिताजी आपको क्या हुआ आज मां मुझे भूख लगी है भोजन दो कोई भोजन नहीं मिलेगा तुम्हें इस घर में तुम्हारे लिए कोई भोजन नहीं निकल जाओ यहां से ये क्या कह रहे हैं आप इसकी अवस्था तो देखिए एक बार ऐसे में कहां जाएगा वो एक गौ पुत्र को आप इतना लाड करते हैं और अपने ही पुत्र को घर से निकाल रहे हैं अरे दोष क्या है इसका एक धनी परिवार के बालक ने मदिरा पान कर ही लिया तो इसमें गलत क्या है आ मैं भोजन देती हूं आवश्यकता से अधिक ममता और लाड़ भी संतान को भटका देते हैं यदि उस दिन धुंधली ने आत्मदेव को उसके साथ कठोर होने दिया होता तो धुंधकारी निडर होकर अधर्म के मार्ग पर नहीं चलता वहीं दूसरी ओर गोकर्ण वेद ज्ञान में निपुण होकर अब अपना ही ग्रंथ लिखना आरंभ कर चुका था फर गणेश जी आगे जो हुआ उससे आत्मदेव को अपने भाग्य से परिचित होने का अवसर मिला पिता श्री देखिए मैंने अपना ग्रंथ पूर्ण कर लिया है अति उत्तम पुत्र अति उत्तम यदि बता धनकारी ने फिर कुछ अनुचित कहा या किया तो पिताजी पुन क्रोधित होंगे अ मुझे ही इस परिस्थिति को संभालना होगा पिताजी ये देखिए ना यह देखिए अरे व्यर्थ की बातें करने से कुछ नहीं होने वाला आप दोनों का ग्रंथों से पेट नहीं भरता धन से बढ़ता है आनंद प्राप्त होता है मां भोजन दो आओ देखो मैंने तुम्हारे लिए क्याक पकवान बनाए हैं आओ बैठो कैसा बेस्वाद खाना है यह वृद्ध हो गई है आप या तो भोजन बनाना भूल गई है अरे यह तो पशुओं के लिए ही ठीक है ले जाइए इसे और खिला दीजिए अपने गौक को ुरी पिता श्री माता पिता का स सन नहीं कर सकते तो मत करो भोजन का तो सम्मान करो जिससे तुम्हें जीवन मिलता है सीखो कुछ अपने भाई से सीखू इस पशु से जो मेरा झूठा खाता आया है उससे भोजन का सम्मान करना सीखू हां गोकर्ण को जो मिलता है वह प्यार से खाता है तुम्हारी तरह भोजन व्यर्थ नहीं करता रहने दो पुत्र रहने दो इतना क्रो मत करो मैं तुम्हारे लिए कुछ और स्वादिष्ट बना लाती हूं नहीं मां सुना नहीं आपने पिताजी ने क्या कहा कि भोजन को व्यर्थ नहीं करते भोजन का सम्मान करते हैं तो मैं पिताजी को भोजन कराता हूं अरे पिताजी तो आप ही कीजिए ना भोजन का सम्मान व्यर्थ नहीं करते पिताजी सम्मान करिए भोजन का मान करिए और भोजन को अपमानित नहीं करते हैं पिताजी और यह रहा आपका सम्मान विधि के नियति के विपरीत जाकर सुख प्राप्ति का प्रयास दुख ही लाता है एक पुत्र धर्मात्मा इतना अधर्मी ऐसे अधर्मी पुत्र को तो घर से ढकेल के निकाल देना चाहिए बड़ी रोचक कथा है फिर आगे क्या हुआ क्या धनकारी इस कथा में पिशाच बना मार्ग खुल गया मेरा रेखा मिट गई क्या करूं क्या करूं अवसर सामने है किंतु कथा का अंत भी तो जानना है अच्छा तो यह विचार घुमड़ रहा है इनके मन में और भी रुचिकर है इसके आगे की कथा क्योंकि अब दीवार के लिए सब कुछ बदलने वाला था चिंता क्यों करूं रा जो मिट चुका है अब फिर नहीं जुड़ेगा कथा समाप्त होते ही छूमंतर हो जाऊंगा कथा सुनेंगे तो समझेंगे कि आपका रुकना क्यों आवश्यक है पुष्पदंत जी कहिए गणेश जी आगे की कथा कहिए उत्र ने जो अपमान किया उससे आत्मदेव की आत्मा हिल गई उस घटना ने उन्हें झग झोड़ [संगीत] दिया पिता श्री जब नशे के कारण किसी का मस्तिष्क ही उसके वश में ना हो तो उसकी बातों का बुरा क्या मानना भ्राता दुकारी को तो ज्ञात भी नहीं होगा कि उसने क्या किया है और क्या कहा [संगीत] है भूल समझ के भूल जाइए पिता श्री उन्हें क्षमा कर दीजिए भूल उसकी नहीं भूल तो मेरी थी मैं क्या क्षमा करूंगा उसको आपकी भूल कैसे पिता श्री विधि के विधान के विपरीत जा आप और आपकी पत्नी के सुख को मिटा भी सकता है संभालो संभालो आओ यहां विश्राम करो हटो पिता श्री आप कोई भूल कैसे कर सकते हैं पुत्र मोह ही मेरी सबसे बड़ी भूल थी विधि के विधान के विरुद्ध पुत्र जो चाहा था मैंने उसी का परिणाम है यह ऐसे पुत्र से तो पुत्र हीन ही रहना बेहतर था पिता श्री जीवन देना तो पुण्य कर्म है इसमें आपका कोई पाप नहीं कोई दोष नहीं आपने हम दोनों को समान शिक्षा दी धर्म पथ पर चलना सिखाया किंतु कौन से पथ का कौन चुनाव करेगा यह आप निर्धारित कैसे कर सकते हैं भ्रात सुप से भटक गए किंतु मैं मैंने आपके दिए गए विचारों का पालन किया और मैं ज्ञान साधना में इतना आगे बढ़ गया वंश भी संतान से नहीं अच्छे विचारों से ही आगे बढ़ता है इसीलिए केवल भ्राता का विचार कर अपने मन को दुखी मत [संगीत] कीजिए अपने मन से मोह माया को त्याग दीजिए तो दुख भी मिट जाएगा मृत्यु लोक में मोह माया के बंधन से कदाचित कोई मुक्त हुआ होगा कामनाओं के माया जाल में लगभग सभी उलझे बस यही कारण है दुख और विनाश का तो पुत्र मैं क्या करूं पुत्र इसका सुझाव मैं कैसे दे सकता हूं पिता श्री क्यों वेद शस्त्र के ज्ञाता हो तुम दिव्य आत्मा हो जो भी कहोगे उचित ही होगा पुत्र मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करो पिता श्री शास्त्रों के अनुसार आपका गृहस्थ आश्रम समाप्त हो चुका है अब आप वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश कर सकते हैं घर गस्ती पुत्र धन सभी को त्याग कर वैराग्य अपनाए प्रभु की भक्ति में लीन हो जा मुक्ति दाता आपको दुखों से मुक्ति देंगे भक्ति से ही मुक्ति मिलती है आपकी नियति आपका भाग्य प्रभु भक्ति है [संगीत] पिता मेरी आंखें खोलने के लिए अनेकों धन्यवाद पुत्र पुत्री नहीं गुरु हो तुम मेरे तुमने उचित कहा वान प्रस्थ ही अब मेरी नियत है मैं वन की ओर प्रस्थान करूंगा तुम अपनी मां से पूछ लो क्या वो भी मेरे साथ जाएंगी नहीं जाऊंगी मैं कहीं नहीं जाऊंगी एक ग का बछड़ा कुछ भी कहेगा और मैं मान लूंगी मैं नहीं आने वाली इसकी बातो [संगीत] में अब यहां रहने का अर्थ है दुखों को सहना सत्य को स्वीकार कर हम बन जाएंगे नहीं आपको जाना है तो आप जा यही रहूंगी कुछ दिनों में पुत्र का विवाह होगा पुत्र वधु आएगी मेरी सेवा करेगी मैं ये सारे सुख भोगी पुत्र ही अपमान करेगा तो पुत्र वधु कैसे मान रखेगी तुम्हारा सम्मान करेगा मेरा पुत्र मेरा सम्मान करेगा मेरी बहुत सेवा होगी मुझे कोई कमी नहीं होने देगा पुत्र धुंधकारी वर्षों पहले पुत्र मोह में मैंने एक भूल की थी आज तुम भी वही भूल करने जा रही हो भूल मैं नहीं भूल आप कर रहे हैं स्वामी जिसका उद्देश्य परिवार में फूट डालकर सब कुछ हड़प लेने का है उसकी बातों में आकर आप भूल कर रहे हैं किंतु मेरे रहते यह कुछ हड़प नहीं सकेगा मैं फिर से तुम्हें सचेत कर रहा हूं धुली बहुत बड़ी भूल कर रही हो तुम विधा श्री मैं आपके साथ चलता हूं नहीं पुत्र गोकन तुम मेरे साथ नहीं चल सकते यहां तुम्हारी मां अकेली है धुंधकारी तो मदिरा के प्रभाव में मर्यादा की कौन सी सीमाए लाग जाए कौन जानता है जो अपने ही वश में नहीं रहता वो कुछ भी कर सकता है मुझे एक वचन दो जब तक तुम्हारी मां तली यहां पर है तब तक तुम उसे छोड़कर कहीं नहीं जाओ जी पिता श्री पिता श्री श्रीमद् भागवत के दशम कांड का पाठ कीजिएगा स्वयं प्रभु परम श्री कृष्ण से मिलाने में यह पाठ आपकी सहायता [संगीत] करेगा इस प्रकार आत्मदेव वहां से चले गए अपना पूरा ध्यान भक्ति में लगाया और बस भागवत के दशम अध्याय में लीन हो [संगीत] गए कर्म अच्छे हो और पूजा में सच्ची भक्ति हो तो उसका फल अवश्य और शीघ्र मिलता है उसी प्रकार सच्ची श्रद्धा से भागवत कथा में ली आत्मदेव की भक्ति भी फलित [संगीत] हुई रा राधे राधे [संगीत] मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूं आत्मा देव कहो क्या वरदान चाहिए तुम्हें प्रभु आपके दर्शन मिल गए उससे अधिक मैं क्या मांग सकता हूं किंतु तुम्हारे तप का फल वो तो तुम्हें मिलना ही चाहिए तो प्रभु मुझे यह वरदान दीजिए कि मैं आप में समाहित होकर आपसे ही एकी का हो जाऊ [संगीत] तथा [संगीत] श्री हरि श्री हरि श्री [संगीत] हरि मा पिता श्री को इस संसार से मुक्ति मिल गई मां दुखी मत हुई यह तो पिता जी के लिए सौभाग्य की बात है उन्हें परम श्री कृष्ण का धाम मिला मां मां मां मां मां दुखी मत होइए मां मां मां मां मां द्वार खोलिए मां मां राता पिता श्री ह सामने से मां [प्रशंसा] [संगीत] पुत्र तुम्हारे पिताजी यह रोने धोने का स्वांग बंद करो कोई जीवित है या नहीं इससे नहीं बस मुझे इससे अंतर पड़ता है कि जब मैं कहूं मुझे भोजन चाहिए तो भोजन मिलना चाहिए अन्यथा इसका परिणाम क्या होगा इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी इसलिए शीघ्र भोजन लाओ एक बार गलत मार्ग पर निकल जाओ तो लौटना कठिन होता है और धुंधकारी तो अब दोषों की खाई में ही गिर पड़ा था वह अंधिका खाई जो उसे महा प्रेत पिशाच बनने की ओर ले जा रही थी किंतु धुली का पुत्र प्रेम अभी समाप्त नहीं हुआ था उन्हें अभी भी आशा थी उनका पुत्र उनका ध्यान रखेगा और इसके लिए वह धुंधकारी के विवाह के विषय में विचार करने लगी यह जाने बिना कि उनके पुत्र के मन में तो विवाह को लेकर भी को विचार पनप रहे थे पुत्र यह वस्त्र पहन लो एक बहुत संस्कारी कन्या ढूंढी है मैंने तुम्हारे लिए जो तुमसे प्रेम करेगी तुम्हारा ध्यान रखेगी और मेरी भी थोड़ी सेवा कर देगी उसी के माता पिता को बुलाया है आज अरे पुत्र अच्छा जाते हो तो जाओ मगर शीघ्र लौट आना और मदिरा पान मत करना मेरी इ है तुम्ह विवाहित देखने की अपनी मां की इच्छा पूरी करना [संगीत] पुत्र आपका घर तो बहुत अच्छा है किंतु आपके पुत्र से भी भेंट हो जाती तो बस थोड़ी देर और प्रतीक्षा कर लीजिए मेरा पुत्र बस आता ही [संगीत] होगा क्षमा करें देर हो गई है अब हमें जाना होगा आप कहे हम कल फिर से आ जाएंगे बस कुछ समय और रुक जाइए मेरा पुत्र बस आता ही होगा आता होगा नहीं मां आ गया आओ मेरी पंच रत्नों मुझे संभाल [संगीत] लो [संगीत] मां तुम्हारी इच्छा थी ना कि मैं तुम्हारे लिए पुत्र वधु लाऊं देखो मैं तुम्हारे लिए कितनी पुत्र वधु लेकर आया हूं स्वागत नहीं करोगी इनका तुम ही कहती थी ना कि वो पुत्र वधू चाहिए जो मुझसे प्रेम करे जो मेरा ध्यान रखे तो लो मैं ले आया लेकिन एक नहीं मैं पांच पांच पुत्र वधु लेकर आया हूं मां बताओ मां कैसी लगी आपके पुत्र को इन नयों के साथ ही रहना था तो हमें अपमानित करने के लिए क्यों बुलाया आपने और क्या अपने पुत्र को आप ही रखिए और आप ही सहिए चलिए स्वामी जाइए महाराज जाइए ओ हो मां अब ऐसे ही देखती रहोगी इनको या इनका स्वागत भी करोगी सुनो यह बात समझ लो अपनी सेवा का विचार बुला दो अब तुम्हें इनकी सेवा करनी है मां तो जाओ पुष्प लाओ आरती उतारो इनकी भगवान खिलाओ आसन बिचाओ और अच्छे से स्वागत करो मां इनका वर्षों पहले पत्र मुह में मैंने एक भूल की थी आज तुम भी वही भूल करने जा रही [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हो अंतत वो घड़ी आई गई जब धुंधली को यह आभास हुआ कि संतान की परवरिश में अत्यधिक लाड़ प्यार और अनुशासन हीनता से दुखद परिणाम ही प्राप्त होते हैं संस्कार का कुपोषण व्यक्ति को दृष्टिहीन बना देता है
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