[संगीत] महाभारत और अब कुल गुरु कृपाचार्य समारोह को आरंभ करने के लिए उठे हैं चंद्र मौल महादेव की जय हस्तिनापुर की जय हस्तिनापुर के निवासियों की जय जय गंगापुत्र भीष्म की जय महाराजा धरा धृत राष्ट्र की जय आचार्य द्रोण की इससे पहले कि यह समारोह आरंभ हो मैं आप सबसे निवेदन करना चाहता हूं कि यह कोई क्रीड़ा स्थान या लीला ग्रह नहीं है और ना ही आपके मनोरंजन के लिए यहां कोई खेल खेला जाने वाला है आज हस्तिनापुर अपनी कोटि कोटि आखों से स्वयं देखेगा कि उसका भविष्य जिन राजकुमारों के हाथों में जाने वाला है वो गुरुकुल से क्या सीख कर आए हैं इसलिए यह समारोह नहीं हस्तिनापुर के राजकुमारों के लिए परीक्षा का आंगन है सबसे पहले मैं ज्येष्ठ राजकुमार युधिष्ठिर को आमंत्रित करता हूं प्रणाम महाराज राजकुमार युधिष्ठिर महाराज को अपना परिचय दो राजकुमार मैं जेष्ठ पांडव पुत्र युधिष्ठिर हूं महाराज महाराज कुंती भोज मेरे नाना श्री हैं और स्वयं महाराज मेरे ता हमने तो सुना है कि हमारा यह पुत्र बहुत लंबा है कुंती हां दीदी आशीर्वाद देने को यदि उसका सर चूमने को जी चाहे तो पंजू के बल उठना पड़ता है दीदी युधिष्ठिर आपको प्रणाम कर रहा है आयुष्मान भव भाग्यवान भव ज्येष्ठ राजकुमार युधिष्ठिर ने अपने लिए भाले का चयन किया है तो इनके सारे अनुज भ्राता चारों ओर से इन पर आक्रमण करेंगे और यह अकेले ही उन सबका सामना करेंगे [संगीत] [प्रशंसा] [प्रशंसा] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [प्रशंसा] [संगीत] राजकुमार युधिष्ठिर की राजकुमार की दीदी आचार्य द्रोण का कहना है कि आपकी युधिष्ठिर से अच्छा भाला चलाने वाला इस संसार में तो कोई नहीं है यदि आचार्य द्रोण ऐसा कह रहे हैं तो यही सत्य होगा कुंती अब कौन आ रहा है अश्वथामा भीम और दुर्योधन बुला रहे हैं दीदी ऐसा लगता है यह दोनों जो साथ-साथ हाथ लगाए तो पृथ्वी को उठा ले अपना परिचय दो ज्येष्ठ गांधारी नंदन ज्येष्ठ गुरु राजकुमार दुर्योधन महाराज को प्रणाम करता है आयुष्मान भव अपना परिचय दो कुंती नंदन महारानी कुंती के द्वितीय पुत्र महाराज कुमार युधिष्ठिर का अनुज और आचार्य द्रोण का शिष्य भीम सेन इन दोनों ने गदा का चयन किया है महाराज गदा युद्ध आरंभ किस सोच में पड़ गए आचार्य क्या आप अपने प्रिय शिष्य को इस योग्य नहीं समझते कि वो सामना कर सके यह देखिए मेरे पास धनुष भी है और तुनीर मेवान भी और मैं इस भरी रंग भूमि में आपके शिष्य अर्जुन को ललकार रहा हूं इस प्रतियोगिता के पश्चात स्वयं हस्तिनापुर य निर्णय लेगा कि सर्वश्रेष्ठ नुर कौन है यदि आजा हो तो मैं अपने बानों से इस अभिमानी के होठों को सीध गुरुदेव अर्जुन क्षमा चाहता हूं कुलगुरु आगे आओ धनुर्धर यह गुरुकुल के राजकुमारों की रंग भूमि है धनुर्धर गुरुकुल के गुरुदेव रंगभूमि सार्वजनिक है और मैं इस रंगभूमि में सार्वजनिक घोषणा करता हूं कि या तो मुझे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर घोषित किया जाए या फिर गुरुकुल का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर मेरे साथ द्वंद युद्ध करके यह सिद्ध करे कि वह सर्वश्रेष्ट धनुर्धर कहलाने के योग्य है धनुर्धर जिस धनुर्धर को तुमने ललकारा है पहले उससे तुम्हारा परिचय करवा दूं यह चंद्रवंशी राजकुमार अर्जुन है जो महाराज पांडु का पुत्र है महारानी कुंती जिसकी माता है और आचार्य द्रोण जिसके गुरु अब तुम बताओ धनुर्धर तुम्हारा परिचय क्या है जाने जो बोले नहीं जो बोले अ जान कण स्वयं कैसे कहे क्या उसकी पहचान क्या उसकी पहचान धनुर्धारी लगता है तुमने मेरा प्रश्न सुना नहीं मैंने अभी-अभी अर्जुन का परिचय देकर तुमसे पूछा था कि तुम्हारा परिचय क्या है तुम किस वंश के हो मेरा धनुष मेरा परिचय है और वान मेरी पहचान है इतने परिचय से रण भूमि में तो काम चल सकता है धनुर्धर परंतु रंग भूमि में नहीं यदि तुम क्षत्रिय राजकुमार नहीं हो तो इस रंग भूमि में अर्जुन को नहीं ललकार सकते इसलिए या तो अपना परिचय दो या फिर शांत हो जाओ ये आप क्या कह रहे हैं कुलगुरु सूर्य स्वयं अपनी पहचान है चंद्रमा स्वयं अपना परिचय है क्या कोई हिरनी सिंह को जन्म दे सकती है यह निसंदेह क्षत्रिय है और इसे किसी वीर माता ने ही जन्म दिया है यह मैंने कब कहा कि य क्षत्रिय नहीं है लेकिन नियम फिर भी नियम होते हैं द्वंद युद्ध के लिए किसी राजकुमार को राजकुमार या फिर राजा ही ललकार सकता है और कोई अपने माता-पिता का परिचय देने से घबराए ही क्यों धनुर्धर मैं तुमसे तुम्हारे माता-पिता का नाम नहीं पूछूंगा मैं तुमसे यह भी नहीं पूछूंगा कि तुम किसके वंशज हो मेरे लिए तुम्हारा इतना परिचय ही बहुत है कि तुम केवल वीर ही नहीं महावीर हो और तुम्हें किसी और परिचय की आवश्यकता भी नहीं है परंतु यदि कुल गुरु यह कह रहे हैं कि नियम के अनुसार अर्जुन को ललकार का तुम्ह तभी प्राप्त हो सकता है जब तुम यह सिद्ध कर दो कि तुम राजा हो या राजकुमार तो यही सही मैं तो कभी सोच भी नहीं सकता था कुलगुरु कि कभी वह दिन भी आ सकता है जब हस्तिनापुर अपने आंगन में खड़े हुए किसी महावीर के लिए आंखें बिछाने की जगह उसका अपमान करेगा परंतु आज का दिन वही दिन है और मैं यह कभी सहन नहीं कर सकता मैं नहीं जानता कुलगुरु यह धनुर्धर कौन है पर मैं इतना अवश्य जानता हूं कि यह वीर पुत्र है और आप सबके संतोष के लिए आज मैं अपने उन अधिकारों का प्रयोग करूंगा जो मुझे मेरे पूज्य पिता श्री से मिले हुए हैं और पितामह जिनके साक्षी हैं तुम्हारा नाम क्या है धनुर्धर मेरा नाम कर्ण है अंग देश का राज्य मेरे अधिकार में है कुलगुरु और मैं आज अपने मित्र करण को अंग देश का राजा बनाता हूं अंग राज करण की [संगीत] जय मित्र दुर्योधन तुम्हारे इस अनुग्रह का ऋण तुम्हे अपने प्राणों से भी नहीं चुका सकता आज से मेरा जीवन तुम्हारे लिए मेरी निष्ठा तुम्हारे लिए और मेरी मृत्यु भी तुम्हारे लिए होगी मेरे मित्र करण के राज्याभिषेक का आयोजन किया जाए कुलगुरु क्या आप अब भी गुरु द्रोणाचार्य के प्रिय शिष्य को ललकार का अधिकार मुझे नहीं देंगे कुलगुरु अब आज्ञा देने में कुलगुरु को भला क्या आपत्ति हो सकती है रंगभूमि प्रतियोगिता का स्थान है युद्ध का स्थान नहीं इसलिए अंग नरेश तुम मुझसे प्रतियोगिता की आज्ञा मांगो जो आज्ञा गुरुदेव परंतु यदि कभी रणभूमि में अर्जुन और मेरा सामना हो गया तो आप वहां मेरे और अर्जुन के बीच अपने शब्दों की ढाल नहीं रख पाएंगे गुरु द्रोण का यह शिष्य भी युद्ध ही की आज्ञा मांग रहा है कुल गुरु क्योंकि उसे हस्तिनापुर की भूमि पर उगाने वाला यह अभिमान का वृक्ष अच्छा नहीं लग रहा इससे पहले कि यह जड़ पकड़ ले इसे काट ही डालना चाहिए क्या तुम्हारे पास केवल शब्दों के वान है पार्थ ये धनुष और ये वनों से भरा तुनीर क्या केवल दिखावे के लिए परंतु याद रहे कि मैं ब्रह्मास्त्र तक तुम्हारा पीछा नहीं छोडूंगा इसलिए अग्नियास्त्र वरुणा आस्त्र इत्यादि को रहने दो आज केवल वो वाण चलाए जाएं जो छाती के आर पार हो जाते हैं दान में पाया हुआ राज्य किसी को क्षत्रिय नहीं बना सकता है अंग राज करण मनुष्य को छत्री बनाती है उसकी खाव खाने योग्य छाती और उसकी वान चलाने योग्य बुझाए भ्राता दुर्योधन को प्रणाम करो और अंग देश चले जाओ और यदि अंग भूमि अपना यह अपमान सहन कर ले तो राज करो जाओ तुम मेरे मित्र का अपमान नहीं कर सकते अर्जुन जो सत्य से अपमानित हो उसका मान क्या सत्य तो अब मेरे वण बोलने जा रहे है भीम अर्जुन सावधान बेटा बाबा विदुर जी महाराज यह क्या हो रहा है चरण स्पर्श हो रहा है महाराज अंगराज कारण अधिरथ के चरण छूकर उनसे आशीर्वाद ले रहे हैं अधिरथ के चरण क्यों मेरी तो समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या कहूं यह सूचना मिलते ही कि महाराज कुमार दुर्योधन ने मेरे पुत्र को अंगदेश का राजा बना दिया और उसका राज्य अभिषेक हो रहा है मैं दौड़ा दौड़ा आया तेरी मां तो मुझे पुकारती ही रह गई तू तो सचमुच यह मुकुट पहनकर क्षत्रिय दिखाई देने लगा है पुत्र यह सूत पुत्र है इसके हाथ में कश दो दुर्योधन और इससे अपना रा तवाओ आ जाओ अर्जुन यह तुम्हारे हाथों आने वाली मृत्यु के योग्य नहीं ऋषियों के गोत्र नदियों के स्रोत को कौन देखता है भीम और यह भी मत भूलो कि तुम सबके जन्म के विषय में भी अटपटे प्रश्न किए जा सकते हैं मैं तो सूत पुत्र नहीं हूं कण ने तो केवल अर्जुन को ललकारा था मैं तुम पांचों भाइयों को ललता हूं आओ और अपना सीत्व सिद्ध करो सूर्यास्त के पश्चात युद्ध सत्य धर्म के विरुद्ध है समारोह का समापन [प्रशंसा] हो बचपन की बातें भूल जाओ द्र बचपन तो नासमझ होता है आज तुम भी बालपन की सारी सीमाएं पार कर चुके हो और मैं भी तुम्हारी समझ में सामाजिक जीवन का यह छोटा सा रहस्य भी नहीं आया कि मित्रता तो बराबर वालों में होती है कृपा जा आओ कृपा चारे प्रणाम ऋषि पुत्र इतनी रात गए आने का कष्ट कैसे किया कृपाचार्य अपनी और कृपी की ओर से प्रार्थना करने आया था ऋषि पुत्र अब तो घर चलिए अभी नहीं कृपाचार्य अभी नहीं परंतु क्यों ऋषि पुत्र क्यों मैं कृपी से यह कहकर घर से निकला था कि मैं उसके पुत्र के लिए गाय लेने जा रहा हूं बिना गाय लिए मैं घर कैसे जाऊ भगवान की दया से आज हमारे पास बहुत सी गाय है ऋषि पुत्र परंतु वह गाय नहीं है जिसे लेने के लिए मैं घर से निकला था तो क्या ध्रुपद के पास एक गाय नहीं थी उसके के पास गाय भी थी और अपमान भी उसने गाय तो ना दी अपमान बहुत दिया अपमान हां वो दृश्य आज भी मेरे सामने है मैं अ भी देख रहा हूं द्रुपद मेरी ओर ऐसे देख रहा था जैसे वण छाती के आर पार हो जाता है बचपन की बातें भूल जाओ द्र बचपन तो नासमझ होता [संगीत] आज तुम भी बालपन की सारी सीमाएं पार कर चुके हो और मैं भी तुम्हारी समझ में सामाजिक जीवन का यह छोटा सा रहस्य भी नहीं आया कि मित्रता तो बराबर वालो में होती है मित्रता का अधिकार जताए बिना तुम कुछ भी मांगो तुम एक ब्राह्मण हो मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगा बचपन की बातें भूल [संगीत] जाओ पर आपने वहीं पर द्रुपद को उसकी सभ्यता का दंड क्यों नहीं देती ऋषि पुत्र यदि वो कोई शत्रु होता तो अवश्य दंड देता वह मित्र था और मित्र होते हुए भी उसने समानता की बात उठाई थी कृपाचार्य उसने कहा ब्राह्मण होने के नाते दान में जो चाहे मांग लो परंतु तुमने यह सोचा कैसे कि तुम मेरे मित्र भी हो सकते हो मित्रता बराबर वालों में होती है और यदि मैं उसे बराबर वाला समझता तो अवश्य डंड देता परंतु अब दंड देने की घड़ी आ गई है अब तुम जाओ कृपाचार्य मेरे शिष्य आते ही होंगे जो आग ऋषि पुत्र महाभारत महा भारत महा भारत हो महा भार [संगीत]
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