Wednesday, 31 December 2025

महागणाधिपति ने शंखचूड़ की मृत्यु का रहस्य बताया Nishkarsh Vighnaharta Ganesh Episode 727 PenBhakti

प्रभु परम कृष्ण वो यहां कैसे [संगीत] है ये क्या हो रहा है ये कैसा दृश्य दिखाई दे रहा है मुझे यह दुली स्मृतियां कब की है मुझे अब इनका स्मरण क्यों हो रहा है विघ्न हरत प्रथम पूज्य गणेश जी ने शंक चून को नारायण अस्त्र का प्रयोग करने से रोक करर इस इस विघ्न को कुछ समय के लिए रोक तो दिया किंतु अब वो क्या करेंगे सावधान हो जाओ पुत्र देवता ल कर रहे हैं तुमसे विघ्न हरता तुम्हारी विजय में विघ्न उत्पन्न करने आए हैं गजानन यहां आपका कोई कार्य नहीं यह युद्ध मेरे और महादेव के मध्य है आप तो स्वयं कृष्ण तत्व है इसलिए आपको कृष्ण भक्त की विजय में बाधा नहीं बनना चाहिए बाधाएं भी कभी-कभी मुक्ति का कारण बनती है शंखचूर विघ्न हर्ता कृष्ण भक्त शंखचूर के विघ्न करता मत बनिए विघ्न यह विचार तुम्हारे मन में कहां से आया मैं तो यहां तुम्हें आशीर्वाद देने आया हूं आशीर्वाद गणेश उसे वार करने से रोक रहा है जिससे कि सूर्यास्त हो जाए और आज युद्ध विराम का समय हो जाए आशीर्वाद प्रभु किंतु युद्ध के बीच में यह कैसा आशीर्वाद है मैं प्रसन्न हूं प्रभावित हूं तुमसे महान कृष्ण भक्त हो तुम जिसने अपनी कृष्ण भक्ति को ही अपनी शक्ति बना लिया शिव सेना के महा पराक्रमी योद्धाओं को बल से नहीं तो छल से बंदी बना लिया छल नहीं गजा युक्ति कहते हैं उसे हा ल को ही युक्ति कहते हो तुम सभी यही असुरों की परंपरा है और यह भी तुम असुरों की मान्यता है कि युद्ध में सब उचित है ना कोई नियम है और ना कोई मर्यादा गणपति गजानंद शंखचूड़ युद्ध के वैदिक नियमों को जानता भी है और उसका पालन भी करता है मैंने किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया मुझे व्यर्थ उलझाने की युक्ति मत कीजिए युद्ध करने दीजिए मुझे उसमें बाधा उत्पन्न मत कीजिए आप इतने समझदार होकर भी ना समझो की भाती व्यवहार कर रहे हो आशीर्वाद कभी किसी के लिए बाधा नहीं बनता वह तो मार्ग को सुलभ बना देता है मेरा आशीर्वाद तुम्हें नियम भंग करने से बचाएगा अन्यथा तुम्हारी विजय भी हुई तो वह भी पराजय के समान ही होगी मैं समझा नहीं प्रभु मैंने कहा ना मैं युद्ध के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं कर रहा हूं अच्छा तो पश्चिम दिशा में देखो शंखचूर सूर्यदेव अस्त हो चुके हैं और वैदिक नियमों के अनुसार यह युद्ध विराम का संकेत है गणेश की बुद्धि और युक्ति के समक्ष कोई दिख ही नहीं सकता है नहीं पुत्र रुको गणेश जी की चतुराई में मत उलझो तुम्हें वार करने से रोकने के लिए तुम्हारा समय व्यर्थ कराया जा रहा है जो अनुचित है वो मत करो शंखचूर झुका लो अपना अस्त्र युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ बस आज के युद्ध का अंत हुआ है भस्मासुर हो या त्रिपुरासुर सबका अंत युक्ति से ही किया गया था अन्यथा इनम से किसी का भी बोध संभव नहीं था अपने वार को कल पर मत छोड़ो संभव है कल तुम्ह इसका अवसर ही ना मिले शंखचूड़ इस युद्ध में तुमने कोई नियम अभी तक भंग नहीं किया तो अब भी मत करो पुत्र नियम मर्यादा सब व्यर्थ है विजय प्राप्त हुई तो सब उचित हो जाता है अन्यथा सब अनुचित इसलिए विजय प्राप्ति के लिए जो करना है अभी करो नियमों को भंग करना तो किसी भी असुर के लिए साधारण बात है किंतु श्री परम कृष्ण का कोई भक्त ऐसी शर भूल कैसे कर सकता है सूर्यास्त के बाद नारायण अस्त्र का प्रयोग सर्वथा अनुचित है ये तुमने ऐसा किया तो धिक्कार है तुम्हे मिथ्या है तुम्हारी भक्ति सोचो शंखचूड़ अपने आराध्य का अपमान कर एक असुर की भाति कर्म करना चाहते हो या भक्त बनकर मर्यादा का पालन करते हुए अपने आराध्य का मान रखना चाहते हो अब यह तुम पर निर्भर है [संगीत] यह क्या कर दिया तुमने पुत्र विघ्न हरता को तुमने विघ्न करता क्यों बनने [संगीत] दिया [संगीत] आज तो सृष्टि पर छाया यह महा संकट गणेश के कारण टल गया शंख चूड़ पीछे हट गया [संगीत] नम नम श्री गणेशा श्री गणेशा श्री गणेशा विता श्री [संगीत] गणेशा नारायण नारायण नारायण नारायण प्रभु आप ऐसे निश्चिंत है कैसे आज ना सही लेकिन शंखचूड़ कल भी तो वार कर सकता है नारायण अस्त्र से इसका तो एक ही उपाय है मां इससे पहले कि शंखचूड़ आक्रमण करें पिताश्री स्वयं अपने वार से उस शंख चूड़ के साथ-साथ इस युद्ध का भी अंत कर द नहीं भ्राता उसका कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि उसकी सुरक्षा के लिए शंख चूड़ को प्राप्त है कृष्ण कवच कृष्ण कवच कृष्ण कवच कृष्ण कवच कृष्ण कवच तो इसीलिए आपने उस पर वार नहीं किया था पिता श्री हां पुत्र कार्तिकेय मैं किसी भी स्थिति में कृष्ण कवच पर वार नहीं कर [संगीत] सकता तब तो हमें वह कृष्ण कवच उससे दूर करने की युक्ति सोचनी चाहिए कृष्ण कवच ही नहीं उसके साथ असुर शंख चूड़ को एक और कवच प्राप्त है ऐसा कवच जिसे ना कोई भेद सकता है ना ही शंखचूड़ से छीन सकता है वोह कवच जिसे उससे कोई दूर नहीं कर सकता और वह है उनकी पत्नी देवी तुलसी के अनुपम प्रेम अपने पति के प्रति उनकी निष्ठा और उनका समर्पण अर्थात उनके पति व्रत का कवच ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो [संगीत] नमः पिता श्री मैं अपने कारण तुलसी को इतनी पीड़ा में नहीं देख सकता मुझे उसे उसके तप से उठा देना चाहिए नहीं पुत्र तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे क्योंकि वह तो अपने तब से तभी उठना चाहेगी जब तुम इस युद्ध में विजय होकर वापस लौटो जब तक मेरा पतिव्रत सुरक्षित है उसकी शक्ति सुरक्षित है कैसा भी संकट क्यों ना जाए भयंकर से भयंकर बवंडर ही क्यों ना मैं आपके इस विजय दीपक कदापि नहीं पूछने दो आश्चर्य है दीपक में घृत नहीं फिर भी उसकी ज्योति स्थिर [संगीत] है आप सभी ने उस पर इतने आक्रमण किए किंतु वह सुरक्षित रहा क्योंकि उसका एक मात्र कारण है देवी तुलसी का पतिव्रत ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः सत्य है देवी तुलसी की तपो शक्ति ने ही मुझे रोका मुझे आभास कराया कि मैं कृष्ण कवच पर ही प्रहार करने वाला था तुलसी के कारण ही मैंने समय पर कृष्ण कवच को क्रियान्वित किया अन्यथा प्रभु महादेव का वार मुझ पर अवश्य होता तब मैं तब मैं कदापि सुरक्षित नहीं रहता किंतु सत्य तो यह है कि उसकी शक्ति ने ही मुझे महादेव का सामना करने के लिए आत्मविश्वास दिया जब तक शंखचूड़ को ऐसे अनुपम स्नेह ऐसी निष्ठा ऐसे पतिव्रत की शक्ति प्राप्त है वह तो त्रिदेव के सामने भी अजय रहेगा स्वयं देवाधि देव महादेव उसको पराजित नहीं कर सकते कल इस युद्ध में स्वयं देवाधि देव होंगे मेरे सामने किंतु फिर भी मैं अजय और अमर रहूंगा क्योंकि तुलसी के पति व्रत की शक्ति मेरे साथ रहेगी किंतु अन्य मर्यादाओं से बंधे होने के कारण आप कृष्ण कवच पर तो प्रहार करेंगे नहीं और देवी तुलसी के पाति वृति के सम्मान में आप उस शंखचूड़ का अंत भी नहीं करेंगे तो फिर यह अधूरा युद्ध क्यों पिताश्री युद्ध हो जाए तो योद्धा का पीछे मुड़ना उसकी पराजय का सूचक होता है देव सेनापति इसलिए युद्ध भूमि में मेरा जाना अनिवार्य है और पतिव्रत की शक्ति के विरुद्ध अस्त्र प्रहार ना करना मेरी विवशता इसलिए मैं देवी तुलसी के पवित्र प्रेम और पतिव्रत पर आज नहीं आने दूंगा कल यु का धर्म अवश्य निभाऊंगा अस्त्र उठाऊंगा किंतु अपने से देवी तुलसी के पतिव्रत को भंग नहीं होने [संगीत] दूंगा तुलसी मैं अब तुम्हें इस कष्ट में नहीं रहने दूंगा कल युद्ध भूमि में प्रवेश करते ही नारायण अस्त्र का प्रयोग कर इस युद्ध के साथ तुम्हारे कष्ट का भी अंत करूंगा किंतु पुत्र तुम्हारे लिए विघ्नहर्ता अब विघ्न कर्ता बन चुके हैं कदाचित अब तुम्हारे लिए इतना सरल नहीं रहा यह युद्ध क्योंकि वो नारायण के अस्त्र के वार का तोड़ ढूंढकर तुम्हारी विजय में विघ्न उत्पन्न कर सकते हैं शंखचूड़ उसकी युक्ति भी ढूंढ लेगा वो जो करने वाला है उसका कोई तोड़ मेरे पास भी नहीं विघ्न हरता होने पर भी मेरे पास ऐसा कोई उपाय नहीं कि मैं इस विघ्न को हर सकूं स्वयं विघ्न हरता गणेश विघ्न हरने की युक्ति ना सोच सके यह असंभव है अनुज गणेश कठिन परिस्थिति में ही पुत्र बुद्धिमान की बुद्धि की वास्तविक परीक्षा होती है वह अंधकार में भी प्रकाश की एक किरण को ढूंढ ही लेता है और मुझे पूर्ण विश्वास है पुत्र तुम इसका भी कोई उपाय ढूंढ ही लोगे हां पुत्र भोर होने तक तुम्हें अवश्य ही कुछ ना कुछ सूझ ही जाएगा मैं आपके विश्वास पर खरा उतरने का प्रयास करूंगा तब तक आप सभी विश्राम कीजिए प्रणाम माता प्रणाम भ्राता व विन हरता गणेश है पुत्र व इतनी सरलता से अपनी असफलता स्वीकार नहीं करेंगे तुलसी के पति व्रत की शक्ति के आगे उनकी सभी युक्तियां विफल होंगी ओ नमो भगवते देवाय कृष्णाय नमो नमः ऐसे अद्भुत पति व्रत का कोई तोड़ नहीं इस संकट को दूर करने के लिए सभी मुझसे ही आस लगाए हुए हैं पूर्ण विश्वास है पु तुम इसका भी कोई उपाय ढूंढ ही लोर होने तक तुम्ह अवश्य स्वयं विन हरता गणेश विघ्न हरने की युक्ति ना सोच सके य असंभव है अनुज गणेश कल यु का धर्म अवश्य निभाऊंगा अस्त्र उठाऊंगा किंतु अपने वार से देवी तुलसी के पतिव्रत को भंग नहीं होने दूंगा अर्थात जब तक देवी तुलसी का पतिव्रत सुरक्षित है संसार की सुरक्षा का कोई उपाय सफल नहीं होगा शंख चोर का वध संभव नहीं होगा ओम नमो भगवते वासुदेवा कृष्णा नमो नम नहीं नहीं मैं तो ऐसे समाधान की कल्पना भी नहीं कर सकता आपको एक असुर की पत्नी बन पूर्ण श्रद्धा से पतिव्रत धर्म का पालन करना होगा और इसके भी पूर्व अपने भूल को सुधारने के लिए आपको अपने अपूर्ण तप को संपन्न करना होगा मैंने उनको जो सुझाव दिया था वो तो उसी पर टिकी है अपने पति धर्म का पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा से पालन कर रही है इसलिए यही एक मात्र समाधान नहीं हो सकता एक मात्र यही समाधान शेष [संगीत] है प्रणाम प्रभु महा गनाधिपति [संगीत] जी सम काही समाधान है ना और देवी तुलसी के पति व्रत के कवच का भंग होना गणेश तुमने देवी तुलसी को जो वरदान दिया था उसके पूर्ण होने का समय अब आ गया है शीघ्र आपका जन्म एक दिव्य पौधे के रूप में होगा जिसका नाम भी तुलसी ही होगा जिसका नाम भी तुल होगा आप इस दिव्य पौधे के रूप में प्रभु श्री कृष्ण के शालिग्राम रूप की अर्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त करेंगी उन्हे अब शीघ्र दिव्य तुलसी पौधे के रूप में प्रकट होना है किंतु ऐसा तभी होगा जब देवी तुलसी का पतिव्रत भंग होगा और इस कार्य को आप संपन्न करेंगे नारायण किंतु एक कार्य तुम्हे भी करना है गणेश और इसका माध्यम आपको ही बनना होगा नारायण हे महा गनाधिपति आप य मुझे कैसी दुविधा में डाल रहे हैं एक भक्त से उसके वरदान में मिले कवच को लौटाने को कह रहे हैं और दूसरे भक्त से उसके पतिव्रत के कवच को भेदने को कह रहे हैं ऐसा करने के लिए मुझे एक भक्त के साथ पाप और दूसरे भक्त के साथ छल करना होगा यह मैं कैसे करूंगा महा गनाधिपति शंख चूड़ ने बुरे कर्म किए इसलिए उससे उसका कवच लौटाना भले ही उसके कर्मों का फल माना जाए किंतु प्रभु देवी तुलसी के साथ तो यह अन्याय होगा यह मैं कैसे करूं प्रभु देवी तुलसी ने एक जन नहीं अपत दो जन्मों में मेरी ही तपस्या की है मेरे ही प्रति समर्पित रही फिर भी मुझे नहीं पा सकी और अब मैं उसे इतना बड़ा दंड कैसे दे दूं ये मैं कैसे करूंगा महा गनाधिपति हां प्रभु देवी तुलसी तो पूर्ण श्रद्धा के साथ अपना कर्तव्य निभा रही है पवित्रता के साथ अपने पतिव्रत धर्म का पालन कर रही हैं फिर यह उनके प्रति अन्याय और दंड समान नहीं होगा इस अन्याय में न्याय छुपा है कभी-कभी दंड प्रत्यक्ष रूप में कठोर प्रतीत होता है किंतु उस दंड में उसके प्रति न्याय होता है जैसे वृक्ष की आयु पूर्ण होने पर उसे जड़ से काट दिया जाता है किंतु उसके काष्ट को विभिन्न कार्यों के लिए प्रयोग में लाया जाता है यही उस वृक्ष की जीवन की सार्थकता है इसी प्रकार प्रत्येक तप का परिणाम वरदान नहीं होता तप का फल भिन्न रूप से भी आता है क्योंकि सत्य तो यह है कि विधाता कभी कभी छोटा कष्ट देकर बड़े कष्ट हर लेता है किंतु प्रभु देवी तुलसी के वत में ही उनके प्राण है यदि वह अपने इस धर्म का पालन ना कर सकी तो यह उनके लिए मृत्यु से कम नहीं होगा और वह मृत्यु उसके लिए वरदान बनेगी उसके जीवन के लक्ष्य के निकट ले जाएगी क्योंकि उसे तो दिव्य तुलसी पौधा बनकर फिर से जन्म लेना [प्रशंसा] [संगीत] है जिस समान से वो अब तक वंचित रही उसे प्राप्त करेगी यह उनके लक्ष्य प्राप्ति की चढ़ाई का अंतिम भाग है उनके कठिनाइयों भरे मार्ग का चलम है किंतु प्रभु यह कौन उसका विचार भी मैं कर चुका हूं यह भक्त और भगवान के संबंध का विषय है इसलिए उसके इस अनंत सम्मान का मार्ग खोलने का ये दायित्व श्री हरि नारायण का ही है किंतु एक कार्य तुम भी करना है गणेश कल युद्ध आरंभ होने पर शंख चूड़ नारायण अस्त्र का प्रयोग करने का प्रयास करेगा किंतु तुम्हें उसे ऐसा करने से रोकना होगा जिससे नारायण को अपने कर्तव्य निभाने का पर्याप्त समय प्राप्त हो सफल भव कभी-कभी भक्तों के उद्धार के लिए भगवान को अपना हृदय कठोर कर पाषाण बनना पड़ता है किंतु यही एक मात्र उपाय होता है भक्तों के के जीवन को एक नवीन अर्थ देने [संगीत] का प्रभु आपके नेत्रों में अशु क्यों प्रभु ऐसा क्या घटित होने वाला है जिसने आपके नेत्रों में अश्रु छलका दिया नियती ने जो जिसकी योजना व इतने लंबे समय से बना रही है जिसके लिए सभी योग उत्पन्न हो रहे हैं जिसके लिए नियति ने इतनी घटनाओं का चक्र बुना है अब भगवान की परीक्षा का समय आ गया है देवर्ष अब तुलसी पौधे के आगमन का पथ स्वयं नारायण को ही खोलना होगा जो उनके लिए अत्यंत कष्टकारी होगा [संगीत] [संगीत] आ हे प्रभु श्री हरि नारायण मुझे आशीष दीजिए कि आज का दिन मेरे जीवन का महानतम दिन हो अवश्य होगा आज का दिन आपके लिए महान ही होगा महाराज [संगीत] शंखचूर किंतु यह भी सत्य है कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी पड़ता है प्रणाम ब्राह्मण देव आपके इन शुभ वचनों के लिए आपके इस आशीर्वाद के लिए आप मुझसे क्या चाहते हैं जो चाहे मांग लीजिए यह कृष्ण भक्त श चूड़ अवश्य देगा वचन देकर उसमें बंद जाए उससे पहले एक बार और विचार कर लीजिए महाराज शं चूड़ मैं आपके दर्शन कर रहा हूं तो मुझे ऐसा आभास हो रहा है जैसे मेरे प्रभु ही मेरे सामने हो और मेरा जो भी है उस पर सर्वप्रथम मेरे प्रभु का ही अधिकार है इसलिए मुझे आपको कुछ देने का वचन देने से पहले पुनर्विचार करने की आवश्यकता नहीं है मांगिए ब्राह्मण देवता आप जो भी कहेंगे आपको अवश्य देगा [संगीत] शंखचूर तब मुझे वो दो जो तुम्हारा नहीं है वो जो तुम्हें वरदान में मिला है वो जो स्पष्ट कहिए ना प्रभु आपको मेरा कृष्ण कवच चाहिए ओ नमो भ वासुदेवाय नम ओम नमो भगवते मुझे कोई संकोच नहीं मैं आपको कृष्ण कवच देने के लिए प्रस्तुत [संगीत] हूं किंतु बस आप अपने वास्तविक रूप में मुझे दर्शन दे दीजिए और मांग लीजिए अपना कृष्ण [संगीत] कव [संगीत] नमो भगवते वासवा मैं धन्य हुआ प्रभु किंतु आपका यह कृष्ण भक्त जिस रूप में आपको पूछता रहा है उस रूप में भी दर्शन देकर मुझे कृतार्थ कीजिए [संगीत] मुझे अपना कृष्ण कवच दे दो शंखचूर मुझे अपना कृष्ण कवच दे दो शू मुझे अपना कृष्ण कवच दे दो शू [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] आ ये लीजिए प्रभु मैंने आपकी आज्ञा का पालन किया वैसे भी मुझ जैसा पथभ्रष्ट इस कवच के योग्य नहीं है महादेव ने इस कवच का मान रखते हुए मुझ पर वार नहीं किया किंतु मैंने मैंने क्या किया केवल उन पर प्रहार ना ही यह धर्मो चित है और ना ही युद्ध की मर्यादा इसलिए आप यह कवच ले लीजिए तभी युद्ध समानता के साथ होगा प्रभु मैं असुर हूं मेरे लिए नियमों का कोई अर्थ नहीं है किंतु वके भक्त को तो आपके द्वारा स्थापित नियमों का पालन तो करना ही चाहिए स्वयं आपके आराध्य देवाधि देव महादेव को सम्मोहित करना उन पर वार करना आपके नियमों के स्वयं स्वयं आपके विरुद्ध होगा जो मैं कदापि नहीं करना चाहता इसलिए संकोच मत कीजिए प्रभु निसंकोच यह ये कवच ले लीजिए किंतु प्रभु महादेव के सामने टिके रहने की शक्ति अब भी मुझ में [संगीत] है लीजिए प्रभु इस इस दिव्य कृष्ण कवच को आप ले लीजिए [संगीत] प्रभु [संगीत] मैंने कवच अवश्य खोया है किंतु मेरा वास्तविक कवच मेरी तुलसी और उसका पतिव्रत अब भी मेरे साथ है जिसे कोई नहीं छीन सकता कोई नहीं ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो [संगीत] [संगीत] नमः [संगीत] इन सभी के लौटने का अर्थ है कि प्रभु नारायण ने कृष्ण कवच पुनः प्राप्त कर लिया है मुझे पूर्ण विश्वास था अनुज गणेश कि तुम कोई ना कोई समाधान अवश्य ढूंढ लोगे [संगीत] असुर शंख चूड़ अब अपने दिव्य कृष्ण कवच से तो सुरक्षित [संगीत] नहीं नमो भगवते वासुदेवाय नम ओ नमो भगवते वासुदेवाय नम [प्रशंसा] [संगीत] [हंसी] [संगीत] शंखचूर तुमने आज मुझे अपना कवच लौटा करर बहुत बड़ा त्याग किया है इसलिए मैं तुम्हें अपार बल और सामर्थ्य का आशीष देता [संगीत] हूं [संगीत] वही प्रेम शक्तिशाली होता है जिसमें शुद्धता हो और ऐसे प्रेम की शक्ति का सम्मान स्वयं ईश्वर भी करते हैं

No comments:

Post a Comment

ॐ जय शिव ओंकारा आरती Sawan Special Om Jai Shiv Omkara हर हर महादेव Pen Bhakti

[संगीत] [प्रशंसा] ओम जय शिवा ओंकार स्वामी जय शिवा प्रभु जय शिवा ओमकारा [संगीत] ओम जय शिवा ओंकार [संगीत] [संगीत] हंसते गरुड़ तन हर...