जब पुत्र कार्तिकेय को ज्ञात हुआ कि सृष्टि की रचयिता ब्रह्मदेव प्रणव शब्द के अर्थ से अनभिज्ञ है तो उसने ब्रह्मदेव को बंदी बना लिया अनुभव और आयु में मुझसे कम होने पर भी प्रभु महादेव के पुत्र कार्तिके ने मुझे बंदी बनाकर कदापि उचित नहीं किया अब तो मुझे प्रभु महादेव ही मुक्त करा सकते [संगीत] हैं ओम नमः शिवाय ओ करपूर गौरम करुणा ब्रह्मदेव की प्रार्थना सुनकर महादेव को यह ज्ञात हुआ कि व किस स्थिति में है तो फिर हम दोनों उनके निकट [संगीत] गए प्रणाम प्रणाम पिता पुत्र कार्तिकेय तुमने ब्रह्मदेव को क्यों बंदी बना रखा है सृष्टि के आधार प्रणव शब्द के गुण रहस्य से जो अनभिज्ञ हो व भला सृष्टि की देखर कैसे कर सकते हैं पिता श्री तो क्या तुम मुझे प्रणव शब्द का रहस्य समझा सकते हो अवश्य पिता श्री किंतु प्रणव शब्द का गण रहस्य केवल एक गुरु ही शिष्य को प्रदान कर सकता है और ज्ञान के आदान प्रदान की मर्यादा के अनुसार गुरु का स्थान शिष्य से ऊंचा होता है इसीलिए इस प्रक्रिया में यदि आपको मुझसे गुण रहस्य ज्ञात करना है तो आपको मुझे स्वयं का गुरु बनाकर स्वयं से उच्च स्थान पर स्थित करना होगा किंतु पु यह कैसे संभव है वो तुम्हारे पिता है मां जो ज्ञान देता है उसका स्थान उसकी आयु से निर्धारित नहीं होता इसीलिए यदि पिताश्री को मुझसे प्रणव शब्द के गुण रहस्य को ज्ञात करना है तो उन्हें मुझे गुरु बनाकर स्वयं से उच्च स्थान पर स्थित करना ही होगा किंतु पुत्र जहां महादेव वो स्थान स्वत ही सर्वोच्च हो जाता है जगतपिता महादेव से ऊंचा स्न तो संसार में हो ही नहीं सकता पुत्र पुत्र कार्तिके गुरु से उच्च तो कोई स्थान नहीं होता और मैं तुम्हें गुरु के रूप में स्वीकार कर स्वयं से उच्च स्थान देता [संगीत] हूं आप गुरु रूप में मुझे उस शब्द कार्थ समझाइए जो प्रणव शब्द ओम [संगीत] है ओम ओम गम गणपते नमो नमः [संगीत] निष्प्रभ अस्मिन निरालो के सर्व तस्त असा ब दंडम भदम प्रजा नाम विजम [संगीत] अवम मुझे श्लोक का अर्थ समझाने की कृपा करें गजानन सृष्टि के आरंभ में कुछ भी नहीं था प्रकाश भी नहीं था सर्वत्र अंधकार था तब उस समय एक बहुत बड़ा अंड प्रकट हुआ जो सभी प्रजा का अविनाशी बीज [संगीत] था [संगीत] गुरु तो स्वयं को तपा करर अपने शिष्य में ज्ञान का प्रकाश भरता है गुरु का स्थान सर्वोपरि और महादेव जो स्वयं जगत गुरु अपने ही पुत्र को गुरु मानकर एक शिष्य की मर्यादा का पालन कर रहे हैं अद्भुत है महादेव हे गुरु गुहान मैंने गुरु स्वीकार किया है आपको तो अब मुझे प्रणव शब्द का अर्थ और उसका गुण रहस्य समझाने की कृपा करें गुरु का ज्ञान तो शिष्य के कान में गुप्त रूप से ही दिया जाता है इसीलिए [संगीत] सुनिए प्रणव शब्द अर्थात ओमकार आदि मंत्र है अनंत ऊर्जा का स्रोत है आदि मंत्र ओमकार क्योंकि यदि शिव वाच्य तो आदि मंत्र उनके वाचक अर्थात वो स्वयं शिव के ही ब्रह्म स्वरूप है ओम मैं स्वयं शिव के तेज अर्थात उनकी आंतरिक शक्ति से उत्पन्न हुआ हू इसीलिए मैं भी शिव हूं और शिव भी मैं हां प्रभु मैं ही प्रणव हूं सुब्रमण्य सु अर्थात स्वरूप ब्रह्म अर्थात ब्रह्म के प्रति प्रणव का ही स्वरूप हो सत्य है प्रणव शब्द ओ महतम है अपार महिमा मय है लघु ध्वनि रूपी प्रणव शब्द ओ मात्र एक अक्षर नहीं मात्र एक ध्वनि भी नहीं किंतु उस अक्षर और ध्वनि में समाहित समस्त सृष्टि का सार है उसकी रचना का आधार है इसीलिए कोई भले ही छोटा हो या बड़ा रचनाकार हो अथवा स्वयं रचना सभी शिव के ही अंश है इसीलिए किसी के भी द्वारा किसी अन्य का तिरस्कार उचित नहीं क्योंकि वास्तव में सभी की रचना दिव्य ओम अर्थात प्रणव शब्द से ही हुई है और यही प्रणव का हह भी [संगीत] है क्षमा प्रभु क्षमा ज्ञान का अहंकार भी कभी-कभी अज्ञानता से ग्रस्त कर देता है मैं सत्य जानकर भी कुछ समझ नहीं पा रहा था स्वयं को मैं सृष्टि का रचयिता समझता था किंतु सत्य अब स्पष्ट है मैं मात्र एक माध्यम हूं किंतु सृष्टि की रचना का मूल आधार तो एक मात्र प्रणव शब्द ओमकार ही [संगीत] है अदभुत कितना सरल कितना सुगम है ओमकार का [संगीत] ज्ञान गुरु रूप में मुझे बताने वाले कि प्रणव ही तुम्हारा भी ब्रम स्वरूप अर्थात सुब्रमण्यम है इसलिए आज से तुम्हें भी सुब्रमण्यम कहा जाएगा सुब्रमण्यम कहा जाएगा मेरे गुरु बनकर मुझे ज्ञान देने के नाते तुम्हारे नाम के साथ स्वामी भी जुड़ेगा इसलिए आज से तुम्ह सुब्रमण्य स्वामी भी कहा जाएगा इसलिए आज से तुम्हें सुब्रमण्यन स्वामी भी कहा जाएगा इसलिए आज से तुम्हें सुब्रमण्य स्वामी भी कहा जाएगा धन्य है स्वामी आप पुत्र आज मैंने तुम्हें अपने नाथ के गुरु अर्थात स्वामी के रूप में देखा है इसीलिए आज मैं तुम्हारे सम्मान में मैं भी तुम्हें एक नवीन नाम देती हूं स्वामीनाथ स्वामीनाथ स्वामीनाथ [संगीत] [संगीत] स्वामी स्वामीनाथ सुब्रमण्यम मां और पिताश्री [संगीत] [प्रशंसा] मेरे प्रिय [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] पुत्र [संगीत] प्रणाम पिता [संगीत] श्री प्रणाम [संगीत] [संगीत] मां [प्रशंसा] माता पिता के दर्शन तो सूर्यदेव के प्रचंड ताप में शीतल छाया के समान मुझे मुझे इस आनंद की प्राप्ति होने वाली है इसका तो मुझे तनिक भी अनुमान नहीं था किंतु मां अनुज गणेश कहां है अपने बड़े भ के साथ संपूर्ण परिवार को यहां लाकर भोजन कराने का विचार तो उसी का था किंतु तुम्हारे ही समा अपने कर्तव्य से मुख कैसे मोड़ सकता था व मार्ग में ही अपनी कर्तव्य की पुकार सुनकर उसे जाना [संगीत] पड़ा गुरु द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या की शिक्षा देते हुए अर्जुन से पूछा कि यदि तुम उस पक्षी को देख रहे हो तो बताओ उसके अंग कैसे बोले मैं मात्र उस पक्षी का नेत्र देख रहा हूं अन्य अंगों पर मेरी दृष्टि नहीं है वि सुव [प्रशंसा] है बुद्धि के देवता प्रथम पूज्य गणेश ज्ञान के सागर में डूबना स्वाभाविक ही था व अपनी भूक प्यास को भूलकर अपनी पूरी एकाग्रता के साथ महा ऋषि वेदव्यास के कहे शब्दों को सुनकर उनका लेखन कर रहे हैं महा ज्ञानी है विघ्न हरता है किंतु महादेव पुत्र गणेश जी का स्वभाव नटखट भी है इसी कारण तो उन्होंने इस कार्य में स्पर्धा का भाव भी रखा है और यदि महर्षि उनके समान गति नहीं रखेंगे तो गणेश जी की लेखनी भी रुक जाएगी इसीलिए गणेश जी के हाथ और तीव्र गति से लेखन करते जाते हैं और महर्षि उनके समान अपने शब्दों की गति बढ़ाने पर विवश हो जाते हैं यदा यदा धर्म गला भवती भारत अनम अधर्मस्य द तदान गजानन की गति तो बढ़ती ही जा रही है श्वर को शीघ्रता करनी होगी यदि ऐसा ना हुआ तो गणेश जी अपनी नियत अवस्था के अनुसार यह लेखन रोक देंगे और यह अत्यंत महत्वपूर्ण महाकाव्य अधूरा रह जाएगा परित्राणाय साधुना विनाशा चता धर्म संस्थापन संभवा युगे य तो अत्यंत अदभुत प्रदा है हा सूर्यदेव कभी गणेश जी आगे होते हैं तो कभी [संगीत] [प्रशंसा] ऋषिवर [संगीत] आलो हम निशित शस्त्र शरीर [संगीत] परिकर्नल [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] लोहे या धातु से बने अस्त्र शस्त्र ही घातक होते हैं क ऐसे पदार्थ जो प्राण घातक सिद्ध हो सकते हैं जिन में से एक है ला जो अग्नि में पिघल करर किसी को भी भस्म करने की क्षमता रखता [संगीत] है जगत जननी और जगत पिता के शुभ चरण जहां भी पड़ते हैं व स्थान तो स्वत ही धन्य हो जाता है अब अपने पुत्र और इस भक्त को अपनी पूजा करने की अनुमति [संगीत] दीजिए [संगीत] [प्रशंसा] पिता श्री मुझे क्षमा करना आपको समर्पित करने हेतु मैं बेलपत्र तो पाने में असमर्थ रहा किंतु मुझे पूर्ण विश्वास है इन सुंदर अर्जुन वृक्ष के पत्रों को अवश्य स्वीकार [संगीत] करेंगे [संगीत] पुत्र भक्ति का पावन भाव ही ऐसी युक्ति है जो सबके भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है आज मेरे लिए यह अर्जुन पत्र ही बेल पत्र के समान है आज से अर्जुन वृक्ष भी सकारात्मक ऊर्जा से पूर्ण होगा और उसमें औषधीय गुणों का भंडार होगा पिता श्री आपके इस कृपा हेतु आपको कोटि कोटि धन्यवाद पुत्र आते ही तुमने हमारी पूजा आरंभ कर दी किंतु मैं तो तुम्हारे लिए अपने हाथों से पक्का भोजन लाई थी कितने दिनों से मेरे लाल ने मेरे हाथों का पक्का भोजन नहीं खाया चलो शीघ्रता करो पुत्र मां सत्य में मेरा पेट तो आप दोनों के दर्शन से ही भर गया है चित अब तनिक भोजन से भी भर लो नंदी जी जो आज्ञ माता मां किंतु आप दोनों और गणेश पुत्र एक मां होने के नाते मेरा स्नेह तुम दोनों के लिए बराबर है और मैंने गणेश को वचन दिया है कि मैं भोजन उसके साथ ही [संगीत] करूंगी किंतु मां आपके हाथों भोजन करने का प्रथम अधिकार तो गणेश का ही है [संगीत] ना यह मोदक मेरे प्रिय अनुज गणेश के लिए है मा [संगीत] नंदी [संगीत] [संगीत] [संगीत] जी [संगीत] रिजवर की गति तो मंद पड़ती जा रही है और गणेश जी गणेश जी अपनी गति बढ़ा रहे हैं यदि गणेश जी के पास लिखने के लिए कुछ ना रहा तो व व अवश्य रुक [संगीत] जाएंगे यज्ञ सेन कुमारी कृष्णा अपनी रक्षा के लिए श्री कृष्ण विष्णु हरि और नर आदि इन भगवत नामों को उच्च और द्रवित स्वर में पुकार रही थी इसी समय धर्म स्वरूप महात्मा श्री कृष्ण ने अव्यक्त रूप से भाति भाति के सुंदर वस्त्रों से द्रौपदी को युक्त कर दिया हे गजानंद हम गंधर्व भी आपकी इस अद्भुत लीला के साक्षी बनने का सौभाग्य पाने आए हैं प्रभु ऋषिव के मुख से लोको की गति गजानन के लेखन की तुलना में और भी मंद हो गई [संगीत] है ऋषिवर मात्र एक शब्द से गणेश जी से आगे हैं ऋषिवर तो जैसे रोक गए अब कुछ नहीं हो सकता यह महाकाव्य भी यही रुक जाएगा और संसार इससे वंचित रह जाएगा यह स्याही तो अब समाप्त होने वाली है यदि ऐसा हुआ तो मेरी लेखनी मध्य में ही रुक जाएगी पुत्र कार्तिकेय अब तुम शीघ्र भोजन ग्रहण करो हमें कैलाश भी लौटना है हां [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] पुत्र मेरा पुत्र अकेले यहां किस प्रकार रहता होगा कितनी कठिनाई होती होगी उसे कैसे छोड़कर जाऊं मैं उसे ममता की छाव से भला कौन वंचित होना चाहता है मां यदि मेरे वश में होता ना मां तो मैं तो आपकी ममता से भरा स्नेह पाने के लिए आपको यही रोक [संगीत] लेता नहीं मैं कदापि नहीं जाऊंगी मैं यहां रहूंगी पुत्र कार्तिक के साथ नहीं मां मैं आपको यहां रुकने के लिए कैसे कह सकता हूं आप अपने कर्तव्य से बंधी हैं और मैं अपने ही [संगीत] से कनेश की शाही समाप्त होने के कारण ऋषिवर को पुनः एक अवसर प्राप्त हुआ है हां लो कसे क गणेश जी को उनके लेखन में कुछ समय लगेगा महाकाव्य की रचना सुरक्षित होगी आप लोग निश्चिंत हो रहे हैं किंतु ऐसा नहीं है कि ऋषिवर को समय और मिल गया यदि शाही समाप्त हो गई तो गणेश जी का लेखन भी रुक जाएगा तो फिर कैसे पूर्ण होगा यह महाकाव्य जब जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तब तक मैं अपने रूप रचता हूं अर्थात साकार रूप से लोगों के सम मुख प्रकट होता हूं साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए और पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए एवं धर्म की स्थापना के लिए मैं युग युग में प्रकट होता [संगीत] हूं शाय अंतिम भू से कुछ ही शब्दों का लेखन कर सकेंगे गणेश जी स्वामी मैं कैसे कहूं कि मैं यहां अपने पुत्र के साथ रहने की इच्छुक हूं मां को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि मैं उन्हें यहां रोकना नहीं चाहता किंतु मेरे कहने पर वह रुक भी जाएंगे जो उचित नहीं होगा मुझे आभास हो रहा है कि आप दोनों एक दूसरे से दूर नहीं होना चाहते इच्छा तो मेरी भी यही है कि हमारा पुत्र हमारे साथ ही रहे स्वामी इसीलिए यहां से जाने के लिए मेरे पांव ही नहीं उठ रहे मां नियति वश हम दोनों की कर्म भूमि विपरीत दिशाओं में है मैं कर्तव्य के मध्य भावनाओं को कदा भी नहीं आने दूंगा इसीलिए ना मैं आपको जाने से रोकूंगा और ना मैं स्वयं आपके साथ जाऊंगा पुत्र कार्तिकेय तो स्वयं को समझा लेगा किंतु पार्वती एक मां की ममता समझाना कठिन होगा मां पिता श्री आप दोनों का बहुत-बहुत धन्यवाद आप दोनों के चरण का स्पर्श कर यह स्थान अत्यंत पावन हो गया है इसीलिए आज मैं यह घोषणा करता हूं कि युग युगांतर तक इसे शैलम पुकारा [संगीत] जाएगा यही दक्षिण का कैलाश है जहां मां पार्वती और प्रभु महादेव का वास है वहीं कैलाश है कदाच देवी पार्वती को समझाने का उपाय मिल गया [संगीत] मुझे अब स्याही समाप्त हो चुकी है ऐसा प्रतीत होता है गणेश जी अपनी नियत अवस्था का मान नहीं रख पाएंगे फिर कैसे होगा य महा काव पूण क्या गणेश जी प्रथम बार किसी कार्य में असफल होंगे ज्ञान देने वाले का स्थान सदैव ऊंचा होता है क्योंकि ज्ञान देने वाला गुरु होता है
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