Wednesday, 31 December 2025

महर्षि वेद व्यास जी की कहानी क्या थी Malkhan Singh Uzair Basar Vighnaharta Ganesh Episode 620

प्रभु नारायण के सभी अवतारों का कोई विशेष प्रयोजन होता है तो प्रभु ने ऋषि वेदव्यास के रूप में अवतार क्यों और कैसे लिया कृपया बताइए पिताश्री जिससे मेरी जिज्ञासा की भूख शांत हो और उधर की भूख भी कुछ समय के लिए ना सताए उनकी कथा का आरंभ महान ज्योतिषाचार्य स्मृति का ब्रह्म ज्ञानी ऋषि पराशर से हुआ था ओम नमो भगवते ऋषि की आत्मा साधना और योग के बल पर अपने आराध्य नारायण से सीधे संपर्क में थी उन्हें अपने ध्यान की अवधि में यह आभास हो गया था कि ग्रह नक्षत्रों के अनुसार नारायण के अगले अवतार का समय निकट आ गया था और शिवर को उसम एक बड़ा भाग भी निभाना था किसी अवतार का अवतरण अकारण और सरलता से नहीं होता है योग्य पात्र गुज में एक बड़ी भूमिका निभानी पड़ती है एक और जहां वेदव्यास की की होने वाली माता को इस भूमिका के लिए स्वयं को तैयार करना था दूसरी और ऋषि पराशर के समक्ष एक बड़ा दायित्व था मेरे आराध श्री हरि नारायण अपना अवतार लेने जा रहे हैं और उन्होंने मुझे अपने पिता के रूप में स्वीकार किया है यह तो मेरा सौभाग्य होगा किंतु उनकी जननी बनने की क्षमता किसम है भक्त ऋषि पराशर अ प्रभु के कार्य को संपन्न करने की चिंता में थे यमुना नदी के तट के साथ-साथ वो प्रभु की जननी बनने की उचित पात्र को ढूंढते हुए जब कालपी स्थान पहुंचे तो नदी के निकट उन्हें स्त्री के रूप में एक दिव्य ऊर्जा का आभास हुआ और वोह दिव्यता की प्रतीक और कोई नहीं देवी सत्यवती थी जो पूर्व जन्म में एक अफसरा और उपरि चर वासु की पुत्री थी और नारायण की भक्त किंतु ब्रह्मदेव के शाप वश उन्हें धरती पर एक मत्स्य के गर्भ से जन्म लेना पड़ा जिसे निषद राज ने अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया जब देवी सत्यवती से मत्स्य गंध उन तक पहुंची तो ऋषि पराशर दिव्य दृष्टि से देवी सत्यवती के जीवन से परिचित हो [संगीत] गए ऋषिवर को ज्ञात हुआ कि देवी सत्यवती का जन्म एक मत्स्य से हुआ था इसलिए मत्स्य गंध उनसे अभिन्न थी इसलिए उन्हें मत से गंधा भी पुकारा जाता [संगीत] था प्रणाम ऋषिवर मैं आपकी क्या सहायता कर सकती हूं सकारात्मक ऊर्जा पावन प्रभा मंडल की धनी यह देवी तो सर्व गुण संपन्न है प्रभु के अवतार को पृथ्वी पर लाने के लिए देवी इस संसार में महत्वपूर्ण घटना घटित होने वाली है जिस सफल क्रिया वन के लिए स्वयं प्रभु विष्णु अवतार लेने वाले हैं मेरा निवेदन है कि आप जननी बनना स्वीकार कीजिए मेरे पुत्र की जननी प्रभु नारायण के अगले अवतार की जननी ऋषिवर मैं आपका सम्मान करती हूं परंतु मैं आपके इस प्रस्ताव को कैसे स्वीकार कर सकती हूं यदि मैंने ऐसा किया तो यह समाज मुझे कदा भी क्षमा नहीं करेगा और मुझे बग बग पर अपमान सहना पड़ेगा देवी मुझे आपकी इस दुविधा का आभास है पुनः आपसे निवेदन करता हूं कि आप मेरे इस प्रस्ताव को स्वीकार करें क्योंकि इसमें सृष्टि का कल्याण निहित है मुझे ज्ञात है कि यह स्वीकार करना कितना कठिन है किंतु इस दिव्य प्रयोजन के लिए परमात्मा ने स्वयं आपको योग्य जानकर आपका चुनाव किया है हमारा जन्म इसी उद्देश्य से हुआ था कि हम प्रभु नारायण के इस अवतार के अवतरण का माध्यम बन सके आप एक दिव्य पुरुष प्रतीत होते हैं आपकी सहायता करना मेरा सौभाग्य होगा क्या आप मुझे अपनी नौका में इस नदी के मध्य ले जा सकती है नियती में ईश्वर के हर अवतार का जिस प्रकार कारण और माध्यम निर्धारित होता है उसी प्रकार स्थान भी निर्धारित होता है और नारायण के इस अवतार के लिए नदी के माध्य का स्थान एवं प्रहर निर्धारित था पुत्र देवता तेजस्वी एक महान ऋषि है आप और मैं साधारण निषद पुत्री हूं विश्वास नहीं होता इस महान कार्य में भाग लेने के लिए आप मुझसे अनुरोध कर रहे हैं मुझसे प्रबल मतस्य गंध प्रवाहित होती है इसीलिए सभी मुझे मतस्य गंधा कहकर भी पुकारते हैं और ऐसे में किसी को मेरे निकट आना कहां स्वीकार होगा [संगीत] देवी सुगंध और दुर्गंध गुण और दोष के प्रतीक नहीं होते किंतु मैं आपको इस दुविधा से मुक्त कर आपकी आंतरिक पवित्रता को उजागर करता [संगीत] हूं आश्चर्य ऋषिवर नदी के मध्य मुझे उपवन सुगंध आ रही है य आपकी आत्मा की पवित्रता की सुगंध है देवी सत्य है आप महान ऋषि है जिन्होंने मेरी मत से गंध को हरकर मेरे जीवन को सुगंधित कर दिया किंतु ऋषिवर प्रभु नारायण के अवतार के लिए हमारा मिलन इस नदी के मध्य सूर्य की दृष्टि में इस नौका में कैसे संभव है ऋषिवर एक ऋषि होने के नाते इस पवित्र मिलन की मर्यादा को मैं अच्छी तरह से जानता हूं उसकी चिंता आप ना करें [संगीत] [प्रशंसा] देवी [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] मुझे आप पर पूरा विश्वास है ऋषिवर इस संयोग से हमारा पुत्र आपके समान ज्ञानी और बुद्धिमान होगा ज्ञानी ही नहीं महा ज्ञानी पुत्र होगा आपका जो समस्त जन का विस्तार करेगा अंततः वो पावन घड़ी आ ही गई थी जब नारायण को एक ऐसे महा ज्ञानी महिषी के रूप में अवतार लेना था जिनके हाथों अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथों एवं महाकाव्य की रचना होने वाली थी नारायणाय सुर मंडन मंडलाय नारायणाय सकल स्थिति कारय नारायणाय भव भीति निवारणा नारायणा प्रभ वाय नमो [संगीत] नमस्ते कंचना भावरा भयम पदम धरा मुकुट जवला मेर मुख शिव पत्नी कात्यायनी सुते नमोस्तुते पंबर परिधान नाना अलंकार भूषित सिह स्थिता परम हस्ता कात्यान सुते नमोस्तुते परमान पदम देवी परब्रह्म परमात्मा परम शक्ति परम भक्ति कात्यायन सुते [संगीत] नमोस्तुते नारायणम गदा दक्षम गोविंदम कीर्ति भाजन गोवर्धन उ धरम देवम भू धरम भुवनेश्वर सा सा सरे स सा सा सरे सा सा स स सा स सरे सा सा सा सा रे सा सा सा सा रे सा सा सा रे सा सा सा सा रे सा सा सा सा रे सा सा सा सा रे सा सा सा रे सा सा सा सा रे सा सा सा रे सा सा सा सा रे सा सा सा रे सा सा सा सा रे मातृ देवो भव पितृ देवो भवा आपका जन्म कृष्ण वर्ण में हुआ है अतः मैं आपको नाम देता हूं कृष्ण दव [संगीत] पान कृष्ण पिता श्री मुझे इतना सुंदर नाम दे के लिए आपका कोटि कोटि धन्यवाद किंतु आपसे और मेरी मां से मेरा एक और निवेदन है इस नदी के जल के समान समय बड़ी तीव्र गति से बहता जा रहा है और मुझे एक पल भी व्यर्थ किए बिना अपनी तपस्या के लिए प्रस्थान करना चाहिए जिससे मैं अपने जन्म के उद्देश्य को पूर्ण करने की क्षमता प्राप्त कर सकूं मुझे अनुमति [संगीत] दीजिए उचित है पुत्र तुम्हारी दिव्यता पर मुझे पूर्ण विश्वास है और तुम्हें तो असाधारण कार्य करने हैं इसलिए तुम्हें रोकना कदापि उचित नहीं होगा जाओ [संगीत] पुत्र ऋषि कृष्ण किंतु यदि उनका नाम कृष्ण द्व पायन था तो फिर वो ऋषि वेदव्यास क्यों कहलाए क्योंकि पुत्र ऋषि कृष्ण दव पायन के जन्म के समय वेद एक ही थे उनमें चार वेदों का ज्ञान समाहित था इसलिए इसलिए उनमें समाहित ज्ञान प्राप्त करना किसी के लिए भी अत्यंत कठिन था अपनी तपस्या के पश्चात ऋषि कृष्ण दव पायन ने वेदों को चार भागों में विभाजित किया ऋग्वेद सामवेद यजुर्वेद और अथर्ववेद इसलिए उनका नाम पड़ा ऋषि वेदव्यास चार भागों में वेदों को बांटकर उन्होंने सभी के लिए उनका अध्ययन बना दिया जिससे कलयुग में भी सभी उन्हें पढ़कर उनका ज्ञान प्राप्त कर सके उन्हें समझ सके उसके बाद उन्होंने 18 पुराणों की भी रचना की इससे संसार ने उन्हें गुरु की उपाधि दी उनके जन्म दिवस आषाढ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता [संगीत] है पिता श्री ऋषि वेदव्यास तो अत्यंत महान है मैं फिर से उनसे भेट करने का इच्छुक हूं मुझे विश्वास है तुम्हारी इच्छा भी अवश्य पूर्ण [संगीत] होगी किंतु अभी तो मैं मां से भेंट करना चाहता हूं उनके हाथ का बना भोजन जो प्राप्त करना है मुझे जब तक ऋषिवर की कथा सुनने में व्यस्त है तब तक तुम्हें भोजन का ध्यान नहीं आया और अब फिर से भोजन का स्मरण हो आया मैं विवश हूं पिता श्री 41 दिनों के व्रत में प्रत्येक दिन एक ही बार भोजन जो किया है इसलिए अब तो मेरे नेत्रों के आगे बस मां के बनाए व्यंजन ही आ रहे हैं मोदक खीर पूरी और मेरी नासिका को तो उनकी सुगंध भी मिल रही है वो इसलिए पुत्र कि हमारी यात्रा समाप्त होने वाली है हम कैलाश पहुंचने वाले हैं [संगीत] और आपके सहायक और मार्गदर्शक बनने के लिए सृष्टि रचता ब्रह्मदेव से उपयुक्त भला और कौन होंगे प्रभु महादेव का सुझाव उपयुक्त था प्रभु ब्रह्मदेव ही मुझे इस दुविधा से मुक्ति दिला सकते [संगीत] हैं ओ ब्रह्म देवा ओ ब देवा मां पुत्र प्रणाम मां बहुत लंबी यात्रा से लौटे हैं हम बहुत भूख लगी है शीघ्र कुछ स्वादिष्ट भोजन परोस दीजिए [प्रशंसा] ना प्रणाम महादेव प्रणाम प्रभु [संगीत] महादेव पिताश्री आप भी आसन ग्रहण कीजिए मां ने अवश्य हमारे लिए बहुत स्वादिष्ट पकवान तैयार किए हैं इस स्वादिष्ट भोजन की सुगंध तो इतनी प्रबल है कि यहां से दक्षिण भैया कार्तिकेय तक पहुंच जाएगी आइए पिताश्री आपको भी तो भूख लगी होगी मां अब शीघ्रता कीजिए ना मां हम भोजन करने के लिए तैयार हैं किंतु मैं अभी तैयार [संगीत] नहीं हां देवी अन्नपूर्णा गणेश इतनी दीर्घ अवधी के व्रत के उपरांत बहुत भूखा है स्वामी एक मां ही होती जो अपनी संतान की हर एक इच्छ उसके बिना बोले समझ जाती मेरा हृदय जानता है कि कितने समय से मेरे पुत्र ने मेरे हाथों का पकवान तो क्या मेरे हाथ की खीर तक नहीं [संगीत] खाई मां के हाथों की बनी खीर आहा मेरे हाथों से बना पकवान उसे कितना प्रिय है और इस सुख से वो वंचित है किंतु किंतु वो तो कैलाश से बहुत दूर है दूर कैलाश से कहां मैं तो यही बैठा हूं आपके समक्ष भूखे पेट भोजन के लिए उत्सुक मुझे पुत्र गणेश के साथ पुत्र कार्तिके की भी चिंता है वो भी तो मेरे हाथों का भोजन करने के लिए लला होगा फिर आप उसे क्यों नहीं बुलाते स्वामी ओ अब समझा मां मेरी नहीं भैया की बात कर रही है वाह भैया वाह मां को अपना स्मरण कराने का कोई और अवसर नहीं मिला था आपको प्रिय कर्म के दर्पण में ही व्यक्ति का चरित्र प्रतिबिंबित होता है वर्षा ताप और बवंडर में भी पर्वत अटल अचल खड़ा होकर अपना क निभाता है उसी प्रकार आपका पुत्र कार्तिक भी दक्षिण में असुरों से संसार की रक्षा के लिए अपने कर्तव्य पर अड़क खड़ा है अब आप ही बताइए क्या हम उसके कर्तव्य से उसे विमुख कैसे कर सकते हैं और मेरे कर्तव्य का क्या स्वामी मेरी संतान मेरे पुत्र के प्रति मुझे अपने पुत्र की चिंता है जिसे आप अपने इन शब्दों से शांत नहीं कर सकते स्वामी यहां उसका संपूर्ण परिवार भोजन करे और वो वहा केला इस सुख कारी अफसर का भाग नहीं बन सके नहीं स्वामी यह मुझे स्वीकार नहीं है मां की ममता उसकी संतान के प्रति उसके स्नेह के पावन भाव का मैं सम्मान करता हूं किंतु वो पावन भाव आपके पुत्र के प्रण को भंग करे उसके कर्तव्य में बाधा बने यह उचित नहीं होगा उचित है स्वामी मैं उसके कर्तव्य में बाधा नहीं बनूंगी किंतु मैं अपने कर्तव्य को भी भंग नहीं होने दूंगी इसीलिए जब तक मेरे हाथों से यह भोजन प्राप्त नहीं करेगा मुझे भी भोजन करना स्वीकार नहीं है [संगीत] स्वामी आप सभी के लिए भोजन तैयार है आप लोग खा लीजिए मां भोजन नहीं करेंगी कार्तिक को उसका भोजन प्राप्त हो या ना हो किंतु मैं आप दोनों को आपका प्रिय भोजन अवश्य परोस जब मेरी अर्धांगिनी भोजन रहित रहेगी तो उसका अर्धांग कैसे भोजन ग्रहण कर सकता है स्वामी क्या अब पिताश्री [संगीत] भी यदि मैं वहां जाकर उनसे कहूं कि मैं भोजन ग्रहण नहीं करूंगा तो संभवतः मां एवं पिता श्री अपने इस हट को त्याग [संगीत] देंगे जब मेरा पूरा परिवार ही भोजन नहीं करेगा तो फिर मैं भी कैसे कुछ खा सकता हूं मां पुत्र मैं भी कुछ नहीं खाऊंगा ओहो यदि गणेश जी भोजन ग्रहण नहीं करेंगे तो मैं भोजन कैसे ग्रहण कर सकती हूं ओम ब्रह्म देवाय नमः सर्वे भवंतु सुख सर्वे संतो निरा सर्वे ओ ब्रह्म देवाय पृथ्वी शांति रा ब्रह्म देवाय नम श नस्तय श्र देवाय नम ओ शांति शांति [संगीत] शांति प्रणाम [संगीत] ब्रह्मदेव ऋषि वेदव्यास आपके स्मरण और आवाहन का क्या कारण है वेदों के विभाजन और 18 पुराणों में ज्ञान दर्शन न्याय और अर्थशास्त्र संबंधित ज्ञान को लिखने के पश्चात भी मेरे अंदर एक अपूर्णता का भाव है किंतु प्रभु महादेव ने ऐसा संकेत दिया कि शीघ्र ही मुझे पूर्णता का आभास होगा एक नवीन रचना के साथ देवाधि देव महादेव ने ऐसा भी कहा है कि केवल आप ही मेरा मार्ग दर्शन कर सकते हैं महादेव का संकेत कभी भी मिथ्या नहीं होता ऋषिवन अब समय आ गया है उस महाकाव्य की रचना का जो आपके हदय और मस्तिष्क में कब से जन्म ले चुका है आपके विचलित होने का कारण भी यही है लोक कल्याण के लिए आप आतुर है उसे संसार के सामने लाने के लिए आप आपके वेदों का ज्ञान इतना विशाल है कि उसका ज्ञान आपके भीतर एक नवीन रचना को मूर्त रूप देने के लिए उत्सुक है इसलिए आपको ऐसे महाकाव्य की रचना करनी होगी जो आने वाले युगों में सरल ज्ञान से सभी का जीवन प्रकाशित [संगीत] करेगा [संगीत] जब तक व्यक्ति स्वयं अपना ज्ञान वर्धन कर अपने आप को योग्य नहीं बनाता तब तक वह समाज के कल्याण के लिए कार्य नहीं कर सकता

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