Wednesday, 31 December 2025

मनुष्य को अपना कर्तव्य किस प्रकार निभाना चाहिए Mahabharat Best Scene B R Chopra Pen Bhakti

[संगीत] महाभारत उधत आत्माना आत्मानम ना आत्मानम अवसाद आत्म व हत मनो बंधु आत्म वरि परात्मन मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह अपना पतन न होने दे और स्वयं ही अपना उद्धार करें मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र भी है और अपना शत्रु भी जिसने अपने अहम अपने मन और अपनी इंद्रियों को अपने वश में कर लिया हो वह स्वयं ही अपना मित्र है और जो इनके वश में हो गया पार्थ वह स्वयं ही अपना शत्रु है जो शीत काल और ग्रीष्म काल सुख और दुख मान और अपमान में शांत रहे और संतुलन रखे वह जितेंद्रिय पुरुष सदैव परमात्मा में लीन रहता है किंतु हे पार्थ बहुत खाने वाले या बिल्कुल ही ना खाने वाले या अधिक सोने वाले या बिल्कुल ही ना सोने वाले को यह योग सिद्ध नहीं होता जीवन संतुलन का नाम है पार्थ और संतुलित ढंग से जीने वाले मनुष्य का योग उसके दुखों को हर लेता है जैसे वायु रहित स्थान पर दीपक की ज्योति निश्चल रहती है वैसे ही मोह रहित योगी भी निश्चल रहता है चंचल मन को मनमानी ना करने दो पार्थ उसे रोको और उसे अपने आत्मा का अधीन बनाओ तुम्हारी उलझनों का यही उपचार है मेरी ओर देखो पार्थ मेरी ओर देखो जिसे हर दिशा और हर वस्तु में केवल मैं ही दिखाई दूं वह तो कभी भटक ही नहीं सकता जो मुझे नहीं भूलता पार्थ मैं भी उसे नहीं भूलता वह तो सांसारिक जीवन व्यतीत कर हुए भी संसार से अलग और मेरे भीतर रहता है हे अर्जुन जो योगी सबके सुख दुख को अपना सुख दुख माने वही परम श्रेष्ठ है आत्मा उपम मेन सर्वत्र समम पश्यति र्जुन सुखम वा यद वा दुखम सहयोगी परमो मत किंतु योग मार्ग पर चलते चलते मन भटक तो सकता है भटक क्यों नहीं सकता अवश्य भटक सकता है केशव तो फिर ब्रह्म की प्राप्ति के मार्ग में इस भटकन का परिणाम क्या होता है भटक जाने वाला बादल की भाति छिन्न भिन्न होकर कहीं नष्ट नहीं हो जाता केशव वह चाहे लोक हो चाहे परलोक कल्याणकारी शुभ कार्य करने वालों की दुर्गति तो हो ही नहीं सकती हे कुंती पुत्र मुझ में मन लगाओ मुझ पर निर्भर होकर योग करो तुम्हें मेरा संशय रहित पूर्ण ज्ञान मिल जाएगा हे धनंजय सबसे बड़ा सत्य तो मैं ही हूं मैं ही वह धागा हूं जिसमें यह सारी प्रकृति मणियों की भांति पिरोई हुई है हे कौंतेय जल में रस मैं हूं सूर्य और चंद्रमा में प्रकाश मैं हूं वेदों में ओमकार मैं हूं आकाश में शब्द भी मैं ही मैं ही पृथ्वी में पवित्र सुगंध हूं मैं ही अग्नि में तेज हूं प्राणियों में जीवन शक्ति मैं हूं तपस्विजी मैं हूं बुद्धि मानों की बुद्धि में तेजस्वी का तेज में बलवान में काम रहित बल भी मैं ही हूं और प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न जाने वाला काम भी मैं ही हूं मैं सब में हूं पार्थ किंतु सबसे अलग भी हूं मैं अविनाशी हूं मैं निर्गुण हूं हे पार्थ मैं बीते हुए सारे कालों इस बीतते हुए आधुनिक काल और आने वाले सारे कालों के सारे प्राणियों को जानता हूं परंतु मुझे कोई नहीं जानता मैं ही जगत का पिता भी हूं माता भी और पोषक भी मैं ही ऋग्वेद हूं और मैं ही सामवेद मैं ही स्वामी हूं और मैं ही शरण मैं ही सृजन हूं और मैं ही विलोपन मैं ही सबका आधार हूं पार्थ मैं ही सब कुछ हूं सब कुछ ग्रीष्म भी मैं और वर्षा भी मैं हूं और हे पार्थ मैं ही संसार का अविनाशी बीज भी हूं मैं सबका अति प्रिय मित्र हूं किंतु सबके लिए एक जैसा हूं ना कोई मुझे प्रिय है और ही अप्रिय परंतु जो मुझे श्रद्धा से पूजते हैं मित्र वे मुझ में है और मैं उनमें समोह सर्व भूतेषु नमे द्वेश प्रिय ये भजंते तु माम भक्त मते तेश चाप [संगीत] हम हे कृष्ण आप पर ब्रह्म है परम शोधक है आप शाश्वत है दिव्य तत्वज्ञान धर केवल आप ही को आपका ज्ञान है तो हे योगेश्वर हे ज्ञानमूर्ति मैं आपको जानू कैसे आपको पहचानू कैसे कृपया विस्तार से मुझे बताइए कृपया विस्तार से मुझे बताइए माधव हे गुरु श्रेष्ठ मेरे विस्तार का तो कोई अंत ही नहीं है फिर भी सुनो मैं प्राणियों के हृदय में आत्मा हूं अहम आत्मा गुणा केश सर्व भूता शय स्थित अदिश मध्य च भूता नाम अंत ए वच हे गुड़ाकेश मैं ही आरंभ भी हूं मध्य भी और अंतिम का अंतिम छोर भी मैं आदित्य में विष्णु हूं मरतो में मरीच ज्योतियां में सूर्य और नक्षत्रों में चंद्र हूं वेदा नाम साम वेदो स्म देवा नाम अस्मि वासवा इंद्रिया नाम मन चस्म भूता नाम अस्मि चेतना मैं वेदों में सामवेद हूं देवों में इंद्र हूं इंद्रियों में मन हूं और प्राणियों में चेतना हूं मैं रुद्र में शंकर हूं यक्ष और राक्षसों में कुबेर हूं वुओं में अग्नि हूं और पर्वतों में सुमेरू हूं पुरोहितों में मैं बृहस्पति हूं सेनापतियों में कार्तिकेय और जलाशयों में महासागर महर्षि हों में मैं भृगु हूं वाणी में ओमकार यज्ञों में जय यज्ञ और अडिग में हिमालय हूं मैं वृक्षों में पीपल हूं और देव ऋषियों में नारद हूं मैं गंधर्व में चित्ररथ हूं और सिद्धों में कपिल मुनि हे महारथी मैं अश्व में अमृत से उत्पन्न होने वाला उच्च शवा हूं मैं गजों में ऐरावत हूं और मनुष्यों में नरपति मैं शस्त्रों में वज्र धेनु में काम धेनु जनकोविक हम नते य पक्षम मैं दैत्यों में प्रहलाद हूं गण कोल हूं वन चरों में सिंह हूं और पक्षियों में विष्णु वाहन गरुड़ हूं और हे धनुर्धर मैं शस्त्र धारियों में राम हूं अक्षरों में अकार हूं मैं कभी ना समाप्त होने वाला समय हूं मैं चहु मुखी सृष्टा हूं पार्थ मैं ही मृत्यु हूं पार्थ और मैं ही उन सब का आरंभ हूं जो आने वाले कालों में जन्म लेने वाले हैं और अभी तक जिनके आरंभ का आरंभ ही नहीं हुआ है मृत्यु सर्व हरस चाह उद्भव भविष्य काम कीर्ति श्रीर वा नारी नाम स्मृतिर मेधा तिमा मैं स्त्रियों में कीर्ति श्री वाक स्मृति मेधा धृति और क्षमा हूं मैं ऋतुओं में ऋतुराज हूं और तेजस्विन का तेज हूं मैं गुण हूं मैं विजय हूं मैं प्रयत्न हूं मैं यादवों में वासुदेव हूं और पांडवों में अर्जुन मैं मुनियों में व्यास हूं और कवियों में शुक्राचार्य यप सर्व भूता नाम बीजम तद नत दस्ती विना य्या मया भूतम चराचर मैं ही तो उत्पत्ति का बीज हूं पार्थ व चाहे चर हो चाहे अचर मेरे बिन तो हो ही नहीं सकता मैं प्राणों का प्राण और जीवन का [संगीत] जीव महाभारत महाभारत [संगीत]

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