[संगीत] महाभारत [संगीत] अरे पुत्र तुम मैं हजारों बाणों के घाव सहन कर सकता हूं पिता महाराज परंतु आपके इस मौन का घाव मुझसे सहा नहीं जाता मुझे तो बताइए कि क्या बात है क्या बताऊ पुत्र वही बात जिसने आपको मौन की इस मरुभूमि का बंदी बना दिया है कोई बात है ही नहीं पुत्र तो बताऊ क्या यदि राज्य की कोई चिंता हो तो युवराज होने के नाते मुझे तो इसका ज्ञान होना ही चाहिए ना अवश्य किंतु राजा भी अपनी सारी चिंताएं किसी को नहीं बता सकता पुत्र क्या पिता भी अपनी सारी चिंताएं अपने पुत्र को नहीं बता सकता [संगीत] पिता भी अपनी सारी चिंताए पुत्र को नहीं बता सकता परंतु पिता महाराज जाओ पुत्र विश्राम करो जो आज्ञा महाराज जो [संगीत] आज्ञा आओ सारथी मैं पिता महाराज के लिए बहुत चिंतित हूं आप उनके मित्र भी हैं और सारथी भी यह प्रतिदिन आप पिता महाराज को कहां ले जाते हैं जहां ले जाने की आज्ञा मिलती है राज और वह कहां ले जाने की आज्ञा देते हैं जहां जाने को उनका जी करता है आपकी निष्ठा आदरणीय है परंतु लगता है आप राजा भक्त हैं राज्य भक्त या देशभक्त नहीं इस समय पिता महाराज का मन भटका हुआ है मेरा यह जानना आवश्यक है कि प्रतिदिन सूर्योदय के बाद वो कहां जाते हैं यह प्रश्न आपसे मैं नहीं कर रहा हूं आपसे यह प्रश्न हस्तिनापुर कर रहा है और इस प्रश्न का उत्तर देना हस्तिनापुर के प्रति आपके निष्ठा का कर्तव्य है मैं क्षमा चाहता हू योराज परंतु मैं महाराज से विश्वासघात नहीं कर सकता और आप पिता महाराज के सुख चैन से विश्वासघात कर सकते हैं और आप हस्तिनापुर से विश्वासघात कर सकते हैं और आप भारतवर्ष और भरत वंश के साथ विश्वासघात कर सकते हैं निष्ठा की जो परिभाषा आपने सोच रखी है व वास्तव में निष्ठा नहीं अनिष्ठा है वे प्रतिदिन यमुना तट पर जाते युवराज यमुना तट और वहां जाकर वो करते क्या है किसी पेड़ की ओट से दास राज की पुत्री सत्यवती को देखते रहते हैं पेड़ की ठ से जी राज दिन भर जी राज क्या पिता महाराज कभी सत्यवती से मिले जी राज मिले और दास राज से जी राज उनसे भी मिले [संगीत] मेरा रथ तैयार किया जाए महाराज महाराज गंगापुत्र देवव्रत पधारे हैं उन्हें आदर के साथ अंदर बिठा जो आजा कुमार विराज गंगापुत्र इतनी रात गई दास राज को गुरु पुत्र देव व्रत का प्रणाम दास के घर में यह जो आपकी कृपा का चांद निकला तो इस घर की रात दिन में बदल गई परंतु युवराज ने सूर्योदय की प्रतीक्षा क्यों नहीं की मैं हस्तिनापुर राज्य के सूर्य की ओर से चिंतित होकर आपकी सेवा में आया हूं दाश राज आप मुझे यह बताएंगे कि यहां और हमारे पड़ाव के बीच पिता महाराज कहां खो गए आप फिर राजिए तो ये बैठने का समय नहीं है दास राज कृपया आप मुझे पिता महाराज के विषय में कुछ बताएं वे मेरी पुत्री सत्यवती से विवाह करना चाहती हैं तो फिर रुकावट क्या है क्या पिता महाराज का हृदय और हस्तिनापुर का राजमहल आपको देवी सत्यवती के लिए छोटा दिखाई दे रहा है यह आपने क्या कह दिया गंगापुत्र तो फिर बस एक रुकावट है गंगापुत्र और व रुकावट है क्या सत्यवती की भाग्य रेखा कहती है कि उसका पुत्र राज करेगा और यही एक वचन महाराज ने नहीं दिया वे यह वचन दे ही नहीं सकते थे दास राज मैं समझा नहीं कुमार उन्हें तो यह वचन देने का अधिकार ही नहीं था दास राज राजा को वचन देने का अधिकार नहीं कि उसके बाद राजा कौन होगा अधिकार है परंतु पिता महाराज उस अधिकार का प्रयोग कर चुके हैं कोई राजा एक ही वस्तु या पदवी को दो व्यक्तियों को तो नहीं दे सकता ना दास राज आपने पिता महाराज के धर्म संकट को समझने का प्रयत्न ही नहीं किया तो आप समझा दीजिए हस्तिनापुर का राज सिंहासन वो मुझे दे चुके हैं वो राज सिंहासन उनके बाद मेरा होने वाला है और मेरे रहते हुए वे राज सिंहासन किसी और को दे दे यह तो असंभव होगा नाना दाश राज यह तो घोर अन्याय हो जाएगा हां मैं यदि चाहूं तो वह राज सिंहासन किसी को दे सकता हूं इसलिए मैं आपको यह वचन देता हूं कि हस्तिनापुर का राज सिंहासन देवी सत्यवती और पिता महाराज के ज्येष्ठ पुत्र को ही मिलेगा आप धन्य है गंगापुत्र और आपके चरणों की धूली पाकर मेरा घर भी धन्य हो गया धन्य है वो देश जिसमें आप जैसा महापुरुष और पुत्र जन्मा अपने पिता की प्रसन्नता का दाम अपने भाग्य से चुकाना हर व्यक्ति के बस की बात नहीं नहीं दास राज नहीं जो हो रहा है वह भाग्य रेखा के अनुसार ही हो रहा है यदि हस्तिनापुर की राजगद्दी मेरे भाग्य में होती तो देवी सत्यवती की भाग्य रेखा उसका विरोध क्यों करती भाग्य रेखाए कभी एक दूसरे को नहीं काटती दाश राज इसलिए मैं देवी सत्यवती की भाग्य रेखा को प्रणाम करता हूं और अब यदि आप आज्ञा दें तो मैं उन्हें अपने साथ ले जाऊं परंतु गंगापुत्र अब ये कौन सा परंतु है दाश राज जिसने सर्प के समान फड़ काट लिया जिस प्रकार महाराज को आपकी ओर से कोई वचन देने का अधिकार नहीं था उसी प्रकार आपको भी अपने वंशज की ओर से कोई वचन देने का अधिकार नहीं है यदि आपकी संतान ने हस्तिनापुर के राज सिंहासन पर अधिकार का प्रश्न उठाया तो उसका परिणाम क्या होगा गंगापुत्र आपकी यह आशंका आधार ही नहीं इसलिए मैं इस अजगर का मुंह भी कील देता हूं हां मैं अपनी संतान की ओर से कोई वचन देने का अधिकारी नहीं परंतु मैं संतान हीन रहने का अधिकारी तो हूं दाश राज इसलिए मैं गंगापुत्र देवव्रत चारों दिशाओं धरती और आकाश को साक्षी मानकर आज यह प्रतिज्ञा करता हूं कि आजीवन ब्रह्मचारी रहूंगा जीवन भर विवाह नहीं करूंगा वंश हीन ही जिऊंगा और वंश हीन ही मरूंगा ये मेरी अखंड प्रतिज्ञा है आ [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] चंद्र तरे सूरज तरे डिगे अडिग हिमवंत देवव्रत का भीष्म व्रत रहे अखंड अनंद [संगीत] कुछ पता चला नहीं महाराज यह तो बड़े आश्चर्य की बात है कि किसी को यह नहीं मालूम कि युवराज है कहां देवव्रत ने पहले तो कभी ऐसा नहीं किया मुझे तो बड़ी चिंता हो रही कि वह गए कहां [संगीत] [संगीत] कुछ समय के लिए रथ रुकवा गंगापुत्र अवश्य सारथी रथ रोको [संगीत] क्या बात है देवी हस्तिनापुर पहुंचने के बाद मैं तो तुम्हारी मां हो जाऊंगी तब मेरे लिए वो करना संभव नहीं होगा जो मैं करना चाहती हूं मां तो आप अप भी है देवी परंतु वह कौन सा ऐसा कार्य है जो मां बनने के पश्चात आपके लिए संभव नहीं होगा मैं तुम्हारे चरण छूना चाहती हूं नहीं माते महा पुत्र के चरण छुए यह तो बड़ा अनर्थ हो गया होता आपका यह पुत्र आपके रथ और नरथ दोनों का सारथी [संगीत] है अब तुम जैसे पुत्र कभी पैदा नहीं होंगे कभी नहीं पिता [संगीत] महाराज पधारिए माता [संगीत] सत्यवती आप बिना कारण ही हिचक चाए थे पिता महाराज आपको मेरी ओर से यह वचन देने का पूरा अधिकार था कि माता सत्यवती का ष्ठ पुत्र ही राज करेगा परंतु पुत्र हस्तिनापुर के राज सिंहासन का नहीं आपका पुत्र हूं आपके सुख की सेवा करना मेरा कर्तव्य है और इसीलिए इस कर्तव्य का पालन करने के लिए मैंने आज जीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा कर ली नहीं इतनी भीषण इतनी भयं का प्रतिज्ञा पुत्र नहीं देवत भूल जाइए पिता महाराज कैसे भूल जाऊ पुत्र कैसे भूल जाऊ कि तुमने मेरे आनंद के लिए अपने जीवन के सारे सुखों का त्याग कर दिया परंतु पिता महाराज आपके आनंद में ही तो मेरे जीवन के सारे सुख है भूल जाइए पिता परंतु मैं ये कैसे भूल जाऊ पुत्र कि राज गद्दी के विषय में भारतवंशियों को स्वयं शकुंतला पुत्र महाराज भरत से यह परंपरा मिली है कि राज गती का अधिकारी जन्म से नहीं कर्म से जुड़ा हुआ है और जो अभी जन्मा ही ना हो उसका कर्म क्या परंतु राजा का एक कर्तव्य यह भी है महाराज कि वह अपनी प्रजा के अधिकारों की रक्षा करें राजा का यह कर्तव्य अवश्य है पुत्र परंतु मैंने ने कौन से अधिकारों की रक्षा नहीं की मेरे पिता श्री आप मेरे एक अधिकार की रक्षा नहीं कर रहे तुम यह क्या कह रहे हो पुत्र आप मेरे वचन देने के अधिकार की रक्षा नहीं कर रहे हैं पिता महाराज तुमने तो मुझे अवाक कर दिया पुत्र अब इसके आगे मैं क्या कहू तुमने तो वो किया है जो जग को सदा याद रहेगा इसके तुम्हारा पिता तुम्ह आशीर्वाद देता है सुख दुख शांति और अशांति के दोराहे पर खड़ा यह शांतनु तुम्हें वरदान देता है कि जब तक तुम स्वयं इच्छा ना करो मृत्यु लोक को नहीं त्यागो ग पुत्र भीष्म तुम्हारा नाम सदा अमर रहेगा तुम जब तक चाहोगे जियोगे और मृत्यु तुम्हारी इच्छा के बिना तुम्हारे पास नहीं आएगी [प्रशंसा] [संगीत] पाते पिता श्री को समझाइए कि मेरे साथ चाहे न्याय हुआ हो चाहे अन्याय व स्वय मैंने ही किया है [संगीत] आज से हम देवव्रत को भीष्म ही कहेंगे अरे पुत्र हम ही नहीं त्रिलोक उसे भीष्म के नाम से पुकारेगा और भीष्म के नाम से ही जानेगा आ [संगीत] [संगीत] प्रणाम माते आयुष्मान भव आज आपसे बातें करने को जी हो आया था माते कहो मैंने जो कुछ किया ठीक किया ना माते तुम अधर्म कर ही नहीं सकते पुत्र तुम्हारा जन्म ही हुआ है इस धरती पर धर्म का नाम बढ़ाने के लिए तुम्हारी मां होना बड़े गर्व की बात है बस आपका आशीर्वाद चाहिए माते वह तो सदैव है पुत्र प्रतिज्ञा शब्द को अर्थ देने वाले अपने इस पुत्र के लिए तो मेरा आशीर्वाद सदैव है जो तुमने किया व किसी मानव या देव के लिए संभव ना था परंतु जो तुमने किया वो करना भी चाहिए था तो फिर अब मेरे लिए क्या आदेश है तुम आदेशों से ऊपर हो पुत्र तुम उनमें से नहीं जो केवल अपने कर्तव्य का पालन कर लेते हो तुम वो हो जो धर्म का पालन करने के लिए ही जन्म लेते हैं [संगीत] आ [संगीत] कोई आपत्ति राज गुरु युवराज का स्थान रिक्त क्यों है राजन [संगीत] [प्रशंसा] महाराज उस समय तक य स्थान रिक्त रखने के लिए वचन बद्ध है राजगुरु महोदय जब तक कि महारानी सत्यवती किसी कुमार को जन्म नहीं देती और यह वचन किसने दिया महामंत्री महाराज के सिवाय यह वचन कौन दे सकता है राजगुरु और महाराज को यह वचन देने का अधिकार किसने दिया महामंत्री महाराज को अधिकार देने वाला कौन है राजगुरु क्यों क्या यह भूमि महाराज की है राजन तुम क्याय भूल गए कि तुम निधि पति नहीं प्रतिनिधि हो निधि पति तो केवल ईश्वर है इसलिए यह निर्णय लेने का तुम्हें अधिकार ही नहीं मैं यह जानना चाहता हूं कि युवराज देवव्रत में महाराज ने ऐसा क्या खोट पाया कि वे हस्तिनापुर को एक नूतन युवराज देने के विषय पर विचार कर बैठे यदि देवव्रत में ऐसा कोई अवगुण है भी तो महाराज ने उस राजकुमार में ऐसा कौन सा गुण देख लिया जो अभी तक गर्भ में भी नहीं आया है परंतु क्या प्रजा को राजा से यह प्रश्न करने का अधिकार है राजग प्रजा को राजा से कोई भी प्रश्न करने का अधिकार है महामंत्री यदि आज्ञा हो तो ज्ञान मूर्ति के प्रश्न का उत्तर मैं दूं महाराज नहीं मुझे उत्तर नहीं न्याय चाहिए युवराज कुमार समय की बात मत कीजिए राजगुरु क्योंकि समय केवल साक्षी होता है कर्म की बात कीजिए क्योंकि कर्म स्वयं हमारे अपने होते हैं और हम अपने कर्मों के स्वयं उत्तरदाई भी होते हैं क्या यह सत्य नहीं राजगुरु अवश्य यही सत्य है युवराज कुमार तो फिर आप मेरे कर्मों के लिए महाराज को कैसे उत्तरदाई मान सकते हैं राजगुरु महाराज ने तो दसराज या महारानी को कोई वचन ही नहीं दिया हां यदि वे मुझे अपना कर्तव्य पालन करने से रोकते तब भी वे अन्याय ही कहे जाते उन्होंने तो दसराज से यह कहक कि वह मुझे युवराज बना चुके हैं अपने कर्तव्य का पालन कर लिया था महाराज ने तो दाश से यह भी कहा कि उन्हें य निर्णय बदलने का अधिकार ही नहीं है दास राज को यह वचन मैंने दिया था राजगुरु कि महारानी सत्यवती का जेष्ठ पुत्र ही राज करेगा और यह वचन देकर मैंने अपने कर्तव्य का पालन किया है परंतु तुमने ऐसा क्यों किया युवराज मैंने ऐसा इसलिए किया राजगुरु कि कोई दुखी राजा प्रजा को कभी सुखी नहीं बना सकता और इसका दायित्व किस पर होगा कि महारानी के गर्भ से जन्म लेने वाला कुमार इस राज सिंहासन के योग्य ही होगा यह तो हस्तिनापुर की भाग्य रेखा देखकर आप ही बतलाइए राजगुरु परंतु यदि भीष्म के वचन का कोई मूल्य है तो आज मैं हस्तिनापुर को यह वचन देता हूं कि इस राज सिंहासन पर जो भी विराजमान होगा उसम यह गंगापुत्र देवव्रत अपने पिता श्री की ही छवि देखेगा और आजीवन उसकी सेवा करता रहेगा [संगीत] शांतन भरत वंशी शांतन यह तुमने क्या हो जाने दिया अपने वर्तमान के लिए हस्तिनापुर के भविष्य को दाव पर लगा दिया पिता महाराज पिता महाराज [संगीत] भीष्म [संगीत] भीष्म भीष्म चिंता की यह रेखाएं पिता के माथे पर हैं या राजा के माथे [संगीत] पर दोनों के माथे पर तो पहले मैं पिता से पूछूं या राजा [संगीत] से पहले तुम उस निर्बल व्यक्ति से पूछो [संगीत] जो ना पिता बन सका ना राजा दोनों का मान ना रख [संगीत] सका जिसने पिता और राजा दोनों को ही विवश कर दिया पिता महाराज मैं कैसा पिता हूं पुत्र कि जिसने अपनी प्रेम तृष्णा में विवश होकर तुम जैसे आदर्श पुत्र के जीवन को एक अनंत मृग तृष्णा में धकेल दिया और कैसा राजा हूं मैं कि एक योग्य युवराज को उसके पद से हटाकर हस्तिनापुर का भविष्य एक ऐसे बालक के हाथ में सौंप दिया जिसका कि अभी जन्म भी नहीं हुआ और जिसके बारे में कोई यह भी नहीं कह सकता कि आगे चलकर वह इस राजगद्दी के योग्य होगा भीय [संगीत] नहीं ऐसा करके मैंने अपने पूर्वजों का घोर अपमान किया है पुत्र गोर अपमान किया है अपने हृदय पर यह बोझ ना डालिए पिता महाराज ना डालिए यदि आपने मुझे वह प्रतिज्ञा करने का आदेश दिया होता तब आपका यूं सोचना ठीक होता परंतु यह प्रतिज्ञा भी मेरी है और इसका परिणाम भी मेरा ही है केवल मेरा पिता महाराज मैंने यह शपथ इसलिए ली पिता महाराज कि सदा पिता ही पुत्र के लिए बलिदान क्यों दे क्या पुत्र का कोई कर्तव्य नहीं होता क्या मेरे लिए आपके आनंद का कोई अर्थ नहीं मेरे लिए आपके हृदय की गद्दी हस्तिनापुर की राजगद्दी से कहीं अधिक मूल्यवान है पिता महाराज फिर भी पुत्र फिर भी क्या पिता महाराज यदि तुम्हारा होने वाला भाई इस राजगद्दी के योग्य न निकला तब क्या होगा पुत्र तो जो वचन मैंने हस्तिनापुर को दिया है वही वचन आज मैं आपको भी देता हूं पिता महाराज के जीवन भर कुरुवंश और हस्तिनापुर के इस राज सिंहासन की सेवा और रक्षा करूंगा और इसके सिवा मेरे जीवन का कोई और लक्ष्य नहीं होगा और जब तक मैं इन्ह देख लू कि कुराज जब च सुरक्षित है और उसे मेरी सेवा की कोई और आवश्यकता नहीं है तब तक मैं जिऊंगा और इस मृत्यु लोक को नहीं त्याग तुम जैसा पुत्र लोक और परलोक दोनों में धन्य है और अब मुझे एक विनती करने की आज्ञा है पिता महाराज कहो पुत्र राजा का यूं अकेला और उदास रहना उचित नहीं है महाराज यदि राजा का मन भटके का तो यह राजनीति भी भटक जाएगी क्योंकि राजनीति तो राजा ही की उंगली थामकर आगे बढ़ती [संगीत] है मेरे अहोभाग्य कि आप मेरे यहां पधारे पर मुझे बुलवा लिया होता जिस कुल में तुम जैसा आदर्श जन्मा हो उस कुल का गुरु होना तो स्वयं बृहस्पति के लिए भी मान की बात है मैं आ गया तो क्या हुआ इस राज भवन में तो सारे देवी देवता आने वाले हैं क्या यह देखने के लिए कि मैंने हस्तिनापुर के प्रति अपने कर्तव्य का पालन किया कि वो भीष्म जिसे संसार अजय कहता है स्वयं अपने पितृ मोह से हार गया अपनी भाग्य रेखा को मिटाने का प्रयत्न ना करो कुमार तुम कर्म योगी हो अपने कर्म किए जाओ पता नहीं वर्तमान तुम्हें किस भविष्य के लिए तैयार कर रहा है अब तो आप भी जा रहे हैं पहले मन उलझता था तो आपके पास चला आया करता था और आपकी सहायता से मन की गांठे खोल लिया करता था पर अब कहां जाऊंगा इसीलिए तो कृपाचार्य को मैं तुम्हारे पास लाया हूं मैं चाहता हूं कि मेरे जाने के पश्चात कुल गुरु का स्थान इन्हें दे दिया जाए वैसे भी ऋषि शरद वान का यह पुत्र मेरे शिष्य के साथ-साथ मेरे पास महाराज की धरोहर भी है महाराज तो अपनी मौन की गुफा में है मैं उस गुफा तक पहुंच नहीं पाता इसलिए अपने पिता श्री के इस धरोहर को तुम संभालो और इस ज्ञानदीप को अपनी सुरक्षा की आड़ दे दो ज्ञानदीप को आड़ की आवश्यकता होती नहीं राजगुरु पर आपकी आज्ञा सर आंखों पर मुझे अपना मित्र मानकर सम्मानित कीजिए आचार्य आपकी एक बहन भी तो है आचार्य हां कृप उसका विवाह हो गया किससे द्रोणाचार्य से तब तो द्रोणाचार्य हमारे संबंधी हो गए जो मेरा बालपन लौट आए तो मैं धनुर विद्या उन्हीं से सीखू यह तुम्हारी नम्रता है कुमार नहीं कुलगुरु जिनके पास ब्रह्मास्त्र होता है वह तो आदरणीय होते ही हैं यह तो मेरे लिए गौरव की बात है कि मैं अपना यह जन्म उनके युग में पिता रहा हूं और यह हम सबका सौभाग्य है कि भगवान ने हमें आपके में जीने का अवसर दिया ब्राह्मण हो आशीर्वाद मांग नहीं सकते आशीर्वाद दे तो सकते हो इन्हे आशीर्वाद की क्या आवश्यकता है गुरुदेव यह तो स्वयं ही भगवान के आशीर्वाद स्वरूप हैं मांगो कुमार क्या आशीर्वाद दूं बस यही आशीर्वाद दीजिए कि मैं पिता श्री की उस मौन गुफा में प्रवेश कर सकूं जिसमें कुल गुरु भी ना कर पाए पिता श्री का मौन एक गरुड़ की भांती हस्तिनापुर के कंधे पर बैठा उसके सिर पर चौच मार रहा है ठोर मार रहा है भीष्म ने चित्रांगद को राज सिंहासन पर [संगीत] बिठाया परंतु वो बहुत दिन राज ना कर पाया और अपने ही नाम के गंधर्व के हाथों मारा गया तब भीष्म ने विचित्र वीर को राजगद्दी सौंपी विचित्र वीर्य के सिंहासन पर बैठाने का बड़ा समारोह हुआ [संगीत] महाराज विचित वर की जय महाराज विचित वर की जय महाराज विचित्र वर की जय महाराज विचित्र वर की जय महाराज विचित्र वर की जय प्रणाम माते चिरंजीवी रहो आपने मुझे बुलाया आओ भीष्म मैं तुमसे एक आवश्यक बात करना चाहती हूं ऐसी कौन सी बात है जिसने आपको इतना चिंतित कर दिया माते बैठो भीष्म क्या अब वो समय नहीं आ गया कि विचित्र वीर्य का विवाह हो जाए और वो कुरु वंशावली में अपना योगदान दे मैं भी यही प्रस्ताव लेकर आपके सेवा में आने वाला था माते तुम्हारा क्या प्रस्ताव है सुना है काशी नरेश अपनी तीनों पुत्रियों अंबा अंबिका और अंबालिका का स्वयंबर रचाने जा रहे हैं तो विचित्र वीर्य को वहां ले जाओ ले तो जाऊ माते पर निमंत्रण तो आए निमंत्रण अवश्य आएगा तो ठीक है मैं प्रतीक्षा करता हूं जैसे ही निमंत्रण आएगा मैं विचित्र वरी को लेकर काशी चला जाऊंगा ये गुरु वंश का घोर अपमान है और मैं गुरु वंश का अपमान कभी सहन नहीं कर सकता क्या हुआ भीष्म बहुत क्रोधित दिख रहे हो क्रोधित होने की ही तो बात है माते काशी नरेश अपने तीनों राजकुमारियों का स्वयं कर रहे हैं यह तो अच्छा है काशीराज जी से तो हमारा पुराना संबंध है महाराज भरत की रानी सुनंदा भी तो काशी राजी से ही थी और वैसे भी समय आ गया है कि इस विवाह से हमारी वंशावली को योगदान मिले काशी की तीनों राजकुमारी अंबा अंबिका और अंबालिका तो मेरी समझ में भी थी तो फिर रुकावट क्या है काशी नरेश काशी नरेश अपने इतिहास का वो पन्ना भूल गए हैं जब उनका राजवंश हमारी मित्रता पर गौरव का अनुभव किया करता था और आज उनका यह साहस हो गया कि वह अपनी राजकुमारियों का स्वयंवर करें और उसमें हस्तिनापुर नरेश को आमंत्रित भी ना करें ना निमंत्रित करें तो ना सही गंगापुत्र क्या भारतवर्ष में वही तीन राजकुमारियां है हां माते यदि आज हम इस अपमान का विष पी गए तो सारा भारतवर्ष सोच बैठेगा कि हस्तिनापुर की खड़क का पानी उतर गया है राजनीति कहती है कि तीनों राजकुमारियों को हस्तिनापुर लाया जाए और सारा भारतवर्ष जान लेकर विचित्र वीर्य चक्रवर्ती धर्म ध्वज रक्षक दुष्यंत पुत्र महाराज भरत का उत्तराधिकारी है तो फिर क्या करना चाहते हो मैं स्वयं भर अवश्य जाऊंगा और तीनों राजकुमारियों को लेकर ही लौटूंगा यदि तुम जा ही रहे हो तो मेरा आशीर्वाद भी सा लेते [संगीत] जाओ भरत वंश संरक्षक शांतनु पुत्र अपराज वीर गंगापुत्र भीष्म पधार रहे [संगीत] हैं लगता है भीष्म प्रतिज्ञा राजकुमारियों की सुंदरता के सागर में डूब गई बढ़ में अपने आप को यवा करने का प्रयास क्यों इन राजकुमारियों का सौंदर्य तो ऋषियों की तपस्या भंग कर दे य तो केवल राजकुमार है और लगता है पिता की मृत्यु की प्रतीक्षा में थे रानी सत्यवती ने अपनी चूड़िया तोड़ी और इन्होंने अपनी प्रतिज्ञा प्रतिज्ञा भी काज की रही होगी सावधान यह सभा केवल अतिथियों के लिए है जानता हूं इसीलिए मैं आपके इस सभागृह में आपके अतिथियों के जवाने काटकर आपका अपमान नहीं करना चाहता इस स्वंबर में मैं हस्तिनापुर नरेश महाराज विचित्र वेरी का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं काशी राजकुमारियां शताब्दियों से कुरुवंश में ब्याह के लिए जाती रही है आज भी यही होगा मैं इन तीनों राजकुमारियों को अपने छोटे भाई विचित्र वरी की रानिया बनाने के लिए ले जा रहा हूं राजकुमारियों का स्वयं भर रचाकर आपने जो हस्तिनापुर का अपमान किया है मैं उसके लिए आपको क्षमा करता हूं परंतु राजकुमारियों को अपना वर चुनने का अधिकार है भीष्म इन राजकुमारियों को य अधिकार नहीं है लराज और यदि है तो मेरे सिवा और कोई स्वयं सभा में बैठने होग नहीं भीष्म अपनी जुबान को लगाम दो मैं केवल घोड़ों को लगा देता हूं और शाल राज तुम यदि मुझसे जीवन दान पाकर ना जी रहे होते तो भरी सभा में इस प्रकार मेरी बात काटने का कड़ा दंड देता तुम्हे मैं इस बरे दरबार में घोषणा करता हूं मैं राजकुमारियों को लेने आया हूं और ले जा रहा हूं [संगीत] [संगीत] क्या कोई भीष्म को रोकना चाहता है रोकना चाहता है भीष्म को राजकुमारियों को जाने की आज्ञा दीजिए काशी नरेश श [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] मुझे इसी बात का डर था महाराज [प्रशंसा] आ [संगीत] [संगीत] भी सारथी रत घुमाओ शाल्व राज हां मैं शाल्व परंतु यह मार्ग तो शाल नहीं जाता तुम योद्धा नहीं हो भीष्म तुम एक मायावी अभिचार हो तुमने काशी राज्यसभा में अपनी वीरता का प्रदर्शन नहीं किया बल्कि अपनी माया का चाल फेंका था अब मेरे बाणों का चाल देखो सावधान तुम एक महान योद्धा हो लराज और मेरी तुमसे कोई लड़ाई भी नहीं आज वो जीवन मैं कैसे ले लूं जो मैंने ही तुम्हें दान में दिया था इसलिए लौट जाओ मैं यहां वापस जाने के लिए नहीं आया हूं भीष्म बल्कि तुम्हें जीवन दान देने के लिए आया हूं क्षमा चाहो तो लौट जाओ हस्तिनापुर या धनुस संभालो सावधान इस घाव के लिए भी मैं तुम्हें क्षमा करता हूं शाल वराज अब भी समय है लौट जाओ मैं यहां लौट जाने के लिए नहीं आया हूं भीष्म [प्रशंसा] [प्रशंसा] [प्रशंसा] मेरे पास बाणों की कमी नहीं है शाल राज पर दिया हुआ जीवन में वापस लेना नहीं चाहता इसलिए एक बार फिर क्षमा करता हूं सारथी हस्तिना पर चलो [संगीत] [संगीत] बड़ी कुर जी लौट आए राज माता अच्छा और दीपक कीलो जैसी तीन राजकुमारियां भी साथ लाए हैं इतनी सुंदर पुत्र वधु पाने पर हार्दिक बधाई माद एक मां का प्यार भरा स्वागत यह अंबा है ये अंबिका और ये अंबालिका और ये इनकी दासी क्या एक विनती कर सकती हूं राजमाता केवल मां कहो अंबा परंतु मेरी विनती तो राजमाता से है आज्ञा है परमवीर गंगापुत्र भीष्म के आने से पहले ही मैं मन ही मन शाल्व नरेश को अपना पति मान चुकी थी राजमाता तो तुमने मुझे यह बात बताई क्यों नहीं राजकुमारी भय गंगापुत्र आपका भय तब तो विचित्र वरी का विवाह अंबा से नहीं हो सकता माते तुमने ठीक कहा भीष्म तुम निश्चिंत रहो राजकुमारी तुम्हें आदर के साथ शाल भिजवाने का प्रबंध किया जाएगा मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है अंबा [प्रशंसा] राजमाता राजकुमारी को अंदर आने दिया [संगीत] जाए हस्ना नरेश की जय हो मैं न्याय मांगने आई हूं महाराज तुम्हें न्याय अवश्य मिलेगा राजकुमारी महाराज गंगापुत्र भीष्म ने सारे राजाओं महाराजाओं और राजकुमारों को हराकर मुझे जीत लिया था परंतु मैं शर्व नरेश को पहले ही अपना पति स्वीकार कर चुकी थी इसीलिए आपकी आज्ञा के अनुसार मुझे शाल नरेश के पास भेज दिया गया परंतु शाल नरेश ने दान में मिली हुई अंबा को स्वीकार करने से साफ इंकार कर दिया हस्तिनापुर की सेनाएं राजकुमारी के अपमान का बदला लेने के लिए शीघ्र ही शाल की ओर प्रस्थान करेंगी पर शाल नरेश ने क्या किया है महाराज जो हस्तिनापुर की सेना उधर प्रस्थान करेंगी मैं अपमानित हुई हूं गंगापुत्र भीष्म के कारण य आप क्या कह रही है राजकुमारी राधा भीष्म तो किसी का अपमान कर ही नहीं सकते मैं किसी और के विषय में बात नहीं कर रही हूं महाराज मैं अपने विषय में बात कर रही हूं अपमान मेरा हुआ है इसलिए मैं ही बता सकती हूं कि मेरा अपमान किसने किया है मेरा अपमान किया है गंगापुत्र भीष्म ने यह मुझे शाल नरेश के पास भेजते और ना ही मेरा इतना बड़ा अपमान होता इसलिए गंगापुत्र भीष्म को आदेश हो कि ये अपने क्षत्रीय धर्म का पालन करते हुए मुझे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें महाराज की जय हो परंतु मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूं महाराज मैं विवाह कर ही नहीं सकता विवाह नहीं कर सकते तो काशी से यहां लाए क्यों मैंने तो काशी दरबार में यह घोषणा कर दी थी कि मैं केवल हस्तिनापुर का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं मेरा हरण ऐसे समय में किया गया था महाराज जब मेरे हाथ में वरमाला थी मेरी बहनों ने आपको स्वीकार किया परंतु मैं आपको स्वीकार नहीं करती अब मैं वह माला गंगापुत्र भीष्म के गले में डालना चाहती हूं यह संभव नहीं है देवी क्यों संभव नहीं है क्योंकि मैंने ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की है घायल नागिन घायल शेरनी और अपमानित स्त्री से डरना सीखो गंगापुत्र तुम वचन बद्ध हो इसलिए मेरे अपमान के घाव पर मान का फाया नहीं लगा सकते तो आज इसी कुरु राज दरबार में हस्तिनापुर नरेश को साक्षी मानते हुए मैं भी प्रतिज्ञाबद्ध होती हूं गंगापुत्र भीष्म मैं तुम्हें अपने अपमान के लिए कभी क्षमा नहीं करूंगी चाहे इसके लिए मुझे जन पर जन क्यों ना लेने पड़े तुम्हारी मृत्यु का कारण बनकर मैं अपने इस अपमान का बदला अवश्य लूंगी [संगीत] क्रुद्ध सर पणी बन गई सुंदर उपवन बेल दोष किसी का क्या भला भाग्य खिला [संगीत] खेल आओ गंगापुत्र प्रणाम माते यहां आओ मेरे पास बैठो अब बताओ तुम्हारे विद्यालय और शास्त्रास कैसे हैं आप उन्हीं से पूछ ले माते गुरु राजकुमारों की जय मैं विदुर की मां हूं प्रणाम माते प्रणाम माते माते माते माते आओ तरा माताओं को प्रणाम धृतराष्ट्र यह माता सत्यवती है चिरंजीवी रा माता अंबिके आयशमान भव माता अंबाल के आयुमान बाबा आओ यहां मेराजो पांडू आओ आओ पांड दादी मां को प्रणाम मां को प्रणाम चिरंजी माते आयुमान और आओ मेरे साथ य मेराज आओ विदर चरण आयु आय आओ [संगीत] विदर क्षमा कीजिए ता गुरु मेरा स्थान यहां नहीं वहां [संगीत] है [प्रशंसा] प्रणाम हां कहो गंगापुत्र माते मैंने जो कुछ ऋषि भार्गव से सीखा था वो पांडु को सिखा दिया है आज संपूर्ण भारतवर्ष में कोई भी ऐसा नहीं जो पांडु के बाणों का सामना कर सके गुरु वशिष्ठ और बृहस्पति देव से मुझे श्रेष्ठ सिद्धांत और राजनीति का जो ज्ञान मिला था वह मुझसे विदुर ने ले लिया है य इस युग का परम विद्वान और तिवान है और इसका नाम सदा आदर के साथ लिया जाता रहेगा और मेरा धृतराष्ट्र गंगापुत्र धृतराष्ट्र कुर वंश का जेष्ठ पुत्र है माद यह बड़ा बलवान है पाषाण को चुटकी से मसल सकता है ज्ञान में यह पांडु और विदुर का साझीदार है पांडू और विदुर इसकी दो आंखें इसलिए मैं निसंदेह कह सकता हूं कि अब वो समय आ गया है जब हस्तिनापुर का राजमुकुट धृतराष्ट्र के सिर की शोभा बने तुम्हारी जो इच्छा तुम्हारी जो आज्ञा गंगा आज्ञा हो तो मैं कुछ निवेदन करूं तागुरु आज्ञा है आप ही द्वारा शास्त्र नीति का जो ज्ञान मिला है उसी के आधार पर कुछ कहने का साहस कर रहा ऐसा कोई भी व्यक्ति राज सिंहासन पर नहीं बैठ सकता जो शारीरिक दृष्टिकोण से संपूर्ण ना जेष्ठ ता दत राष्ट्र अपनी नेत्र हीनता के कारण राज सिंहासन के योग्य नहीं है राज सिहासन के योग्य तो पांडु है केवल पांडु नहीं विद मैं अपने बड़े भाई के सामने राज सिंहासन पर नहीं बैठूंगा प्रिय भाई यदि मैं स्वयं तुम्हारा हाथ थामकर तुम्हें राज सिंहासन तक ले जाऊं और तुम्हें व स्थान ग्रहण करने का आदेश दू तब विदुर ठीक कह रहा ता जी जो व्यक्ति स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता है वो राज्य की क्या रक्षा करेगा हस्तिनापुर की राजगद्दी के योग्य तो केवल एक ही व [संगीत] मेरा भाई पांडव तुम भी तो कुछ बोलो गंगापुत्र यह निर्णय तो आप ही लेंगी माते मैं तो कुरुवंश और हस्तिनापुर राज सिंहासन से बंधा हुआ हूं जो इस राज सिंहासन पर बैठेगा उसकी सेवा और रक्षा करना मेरा धर्म है कौन बैठेगा यह निर्णय आप ही लीजिए मा [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हस्तिनापुर नरेश पांडू की जय हो ओ भूर भुव स्व ओ रेण [प्रशंसा] भव की महाराज पांडू की जय महाराज पांडू की जय [संगीत] सत्य वती की साधना भीष्म वृति का त्याग जागे जिनके जतन [प्रशंसा] से भरत वंश के भाग [संगीत] धुरंधर भीष्म का शिष्य धनुर्धर वीर उदित हुआ फिर [संगीत] चंद्रमा अंधकार कोची तुम्हारे हस्तिनापुर के क्या समाचार है पुत्र सारा ब्रह्मांड पांडु के चक्रवर्ती होने की प्रतीक्षा कर रहा मा तुम्हें अपनी मां की प्रतीक्षा से ज्यादा ब्रह्मांड की प्रतीक्षा की चिंता है जय और पराजय के सिवाय भी सोचने योग्य प्रश्न है पुत्र मैं समझा नहीं माते राजा क्या केवल चक्रवर्ती होने के लिए जन्म लेता है भीष्म जीवन की कुछ और भी तो मांगे होती है मनुष्य को केवल राजा ही होकर नहीं रह जाना चाहिए वंश रेखा की ओर भी तो उसका कोई दायित्व होना मैंने इस विषय पर सोचा है माते राष्ट्र जेष्ठ पुत्र है पहले तो उसका विवाह होना चाहिए परंतु उसकी अर्धांगिनी ऐसी होनी चाहिए जिसके पास ऐसी आंखें हो जिन्ह देखने के लिए आंखें खोलने की आवश्यकता ना हो कोई है ध्यान में हां मेरे ध्यान में शंकर भक्ति नहीं गंधार कुमारी गंधारी आई है तो धार जाओ गंगापुत्र मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है जाओ आज्ञा माते [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] भरत वंश संरक्षक शांतनु पुत्र अपराज वीर गंगापुत्र भीष्म पधार रहे हैं स्वागतम गंगापुत्र भीष्म स्वागतम पुत्र इन्हें प्रणाम करो इनके चरण स्पर्श करना गंगा स्नान के समान है प्रणाम चिरंजीवी रहो बत मेरा पुत्र शकुनी आइए [संगीत] पधारिए आसन ग्रहण कीजिए गंगापुत्र [संगीत] यह गांधारी अनार का रस है गंगापुत्र गंगाजल के अतिरिक्त ऐसी मिठास कहीं और संभव [संगीत] नहीं मीठा है परंतु इससे अधिक मिठास भी संभव है गांधार [संगीत] नरेश आप बुरा ना मानिए गांधार नरेश मेरे लिए अनार के रस से कहीं अधिक मिठास आपकी उस हा में होगी जो यदि आपने मेरी प्रार्थना सुनकर की पहेलिया ना बुझाए गंगापुत्र मैं कुर राजकुमार धृतराष्ट्र के लिए राजकुमारी गांधारी का हाथ मांगने आया हूं नश मेरी बहन का हाथ आपने पांडू के लिए क्यों नहीं मांगा गंगापुत्र उसके लिए व अंधाई क्यों सोचा शनी क्षमा चाहता हूं पिता श्री आप मेरी चंद्रमुखी पुत्री को हस्तिनापुर के चंद्रवंश में ले जाने के लिए आए हैं परंतु गंगापुत्र आपका ध्यान इस ओर तो जाना चाहिए था कि राजकुमार धृतराष्ट्र नेत्रहीन है उनके जीवन में गंधार देश का य चंद्रमा निकला तो क्या और ना निकला तो क्या उनका जीवन तो सदैव अंधकार में ही बधा रहेगा ऐसा ना कहिए पिता श्री परंपरा अनुसार वरमाला मेरे हाथों में है यह निर्णय लेना मेरा अधिकार है कि मेरा विवाह किससे होगा क्या आप मुझसे मेरा वह अधिकार भी छीन लेना चाहते हैं [संगीत] गंधारी मैं अपने पिता गंधार नरेश अपने भाई राजकुमार शकुनी तात श्री भीष्म और शंकर भगवान को साक्षी मानकर राजकुमार धृत राष्ट्र को अपना वर चुनती हूं गांधारी पुत्री अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है पिताश्री गुरु राजकुमार धृत राष्ट्र को अपना पति मानना गौरव की बात है सौभाग्य की बात है सौभाग्य की बात इसलिए है कि यदि मेरा सौंदर्य चला भी जाए तब भी मेरे लिए जीवन में कोई उथल पुथल नहीं होगी क्योंकि गुरु राजकुमार धृतराष्ट्र मुझे मेरे शारीरिक सौंदर के आधार पर स्वीकार नहीं कर रहे हैं ता [संगीत] आप बड़े भाग्यवान है राजन कि आपके आमंत्रण पर भारतवर्ष का पूरा सभ्य समाज आपको बधाई देने और आपके राज्याभिषेक में सम्मिलित होने के लिए यहां एकत्रित हुआ है मैंने अपनी लंबी जीवन यात्रा में ऋषियों का ऐसा समूह कभी नहीं देखा इनके य उपस्थिति ही इस बात को सिद्ध करती है कि इस राज्य में और इस राज्यसभा में सदाय ही ईश्वरी कृपा की वर्षा होती रहेगी राजन आपके सारे सगे संबंधी भी यहां आए हुए हैं तो आदरणीय अतिथियों का सत्कार कीजिए अलग अलग उनकी पूजा कीजिए जो आा परंतु पहले किसकी पूजा करूं पितामह जो सर्वश्रेष्ठ हो तो पहले महर्षि व्यास की पूजा करूं या आपकी ना ही महर्षि की और ना ही मेरी आज आप धर्म के प्रतिबिंब है राजन आपकी आंखों को तो यह देख लेना चाहिए था कि इस सभा में ही नहीं पूरे त्रिलोक में यदुवंश शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण के अतिरिक्त किसी और की अग्र पूजा हो ही नहीं सकती और मैं यह इसलिए नहीं कह रहा हूं कि यह मुझे प्रिय है यह मैं इसलिए भी नहीं कह रहा हूं कि मैं इनका भक्त हूं क्या आप यह नहीं देख रहे कि भारतवर्ष के इन जगमगाते मुगट के बीच में य ऐसे प्रतीत हो रहे हैं मानो तारों के झुरमुट में चंद्रमा और जब चंद्रमा के दर्शन हो रहे हो तो तारों की ओर कौन देख है जैसे अंधकार की चुंडरी ओड़कर सोई हुई धरती सूर्य के शुभागमन से जाग उठती है और वायु हीन स्थान वायु का स्पर्श होते ही जीवित हो उठता है और सांस लेने लगता है वैसे ही देवकी नंदन के इस राज्यसभा में होने से यह राज्यसभा जग बगा भी रही है और सांस भी ले रही है तो क्या इनके यहां होते हुए स्वयं महर्षि व्यास अग्र पूजा के लिए आगे बढ़ सकते हैं कभी नहीं कभी नहीं यह यहां है और इनके होते हुए कोई और पूजनीय हो ही नहीं सकता यदि किसी को कोई आपत्ति हो तो अवश्य बोल सकता है [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] अपना स्थान ग्रहण कीजिए देवकी नंदन आइए [संगीत] इतनी जगमगाहट [संगीत] दीप माला प्रणाम ता श्री आइए गंध अरे य मेरे लिए उठके मुझे लज्जित ना कीजिए ता श्रीराज अरे ता आप विराज नहीं आप विराज नहीं ताजी आप बराज बराज मैं बहन गंधारी के यहां से लौट रहा था कि आपके भवन की जगमगाहट देखकर आश्चर्य में पड़ गया आज तो दीपावली की रात भी नहीं है ता श्री अंधेरे से जी उप चुका था गंधार नरेश तो सोचा कि जी भर कर प्रकाश को देख लू आज और फिर दीप कों का जीवन काल भी क्या क्या पता किधर से पवन का एक झकोरा आ जाए और यह सारे के सारे दिए बुझ जाए और यह भवन फिर से अंधकार उड़कर बैठ जाए किंतु जब तक यह दिए जल रहे हैं कितने अच्छे लग रहे हैं ना गंधार नरेश अनगिनत दिए होंगे नाता मैंने बाहर के दिए तो गिने नहीं गंधार नरेश परंतु मेरे कक्ष में 105 दिए चल रहे हैं मेरे हृदय में 105 दिए चल रहे हैं और मेरा हृदय यह चाहता है गंधार नरेश कि ही इस रात का कभी अंत हो य दिए कभी मुझे महाभारत महाभारत महाभारत [संगीत] महाभारत महाभारत m
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