[संगीत] महाभारत तुम्हारे सेवकों को मुझे यह बता देना चाहिए था दुर्योधन कि वे तुम्हारे सेवक हैं परंतु आपने उनसे यह तो कभी पूछा ही नहीं श्री श्री आप तो हर पड़ाव पर केवल उनसे यही कहते रहे कि आप उनकी सेवा से अति प्रसन्न है और आप जेष्ठ भ्राता श्री से उनकी प्रशंसा करेंगे किंतु मैं मैं तो पांडवों के पक्ष में युद्ध करने के लिए निकला हूं वत्स तो मैं आपको उनके पक्ष में युद्ध करने से कहां रोक रहा हूं श्री श्री आपकी सेवा करना तो मेरा कर्तव्य था मैं तो केवल अपने कर्तव्य का पालन कर रहा हूं किंतु चाहे वह अनजाने में हुआ हो मैंने तुम्हारा अतिथि सत्कार स्वीकार किया है और इसीलिए मैं तुम्हें आशीर्वाद दिए बिना तो जा ही नहीं सकता कुछ मांग लो मैं आपसे क्षमा चाहता हूं श्री श्री परंतु मैं अतिथि सत्कार का व्यापारी नहीं हूं और मैं उस सत्कार का मूल्य भी नहीं ले सकता चाहे वह मूल्य आप अपने आशीर्वाद की मुद्राओं से ही क्यों ना चुकाना चाहते हो तो फिर युद्ध करो क्योंकि मैं तुम्हारे आभार का बोझ लेकर रणभूमि में नहीं उतर सकता मैं आपसे एक बार और क्षमा चाहता हूं श्री श्री आप मेरे अतिथि हैं और मैं आपसे अपने ही शिविर में युद्ध करके अतिथ की मर्यादा का उल्लंघन नहीं कर सकता तब तो तुम्हें मुझसे कुछ मांगना ही पड़ेगा वत्स मांगना ही पड़ेगा अरे प्रिय दुर्योधन य आदेश है आदेश और अपनों से बड़ों का आदेश ना मानना सभ्यता का प्रकटन है समझे अरे अब तो तुम्हें कुछ मांगना ही पड़ेगा ता ना करो भांजे अरे जैसे मैं तुम्हारा मामा हूं वैसे ये भी तुम्हारे मामा श्री है मांग लो मांग लो यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं श्री श्री तो आप अपने आशीर्वाद के रूप में हस्तिनापुर सेना के प्रधान सेनापति बनकर मुझे सम्मानित करें हां महाराज मैं गंगापुत्र भीष्म के होते हुए यह पद स्वीकार नहीं कर सकता युवराज तो फिर आप मेरे सारथी बनकर मुझे सम्मानित कीजिए अर्जुन के सारथी वासुदेव होंगे महारथी शल्य मुझे भी उतने ही उच्च कोटि का सारथी चाहिए तो ऐसा सर्थी पूरे संसार में आपके अतिरिक्त और कौन है उधर से अर्जुन इधर से मैं उधर से वासुदेव इधर से आप और सारा संसार साक्षी इस युद्ध में मुझे गुरु श्रेष्ठ परशुराम की लाज रखनी है महाराज मैं यह नहीं चाहता कि इतिहास यह कह सके कि आचार्य द्रोण का शिष्य अर्जुन धन और विद्या में परशुराम शिष्य करण से श्रेष्ठ है धनुष मेरे पास भी है राजन और धनुष अर्जुन के पास भी है बाण मेरे तुनीर में भी है और बाण उसके तुनीर में भी है संधान में वो भी निपुण है और मैं भी किंतु उसके पास वासुदेव जैसा सारथी है और वैसा सारथी मेरे पास नहीं ठीक है अंगराज ठीक है मैं तुम्हारा सारथी बनूंगा क्योंकि अकेले तुम ही एक ऐसे योद्धा हो जो रण भूमि में अपने शत्रु के घरवाले के हाथ में अपने रथ के घोड़ों की लगाम देने का साहस कर सकता है मैं तुम्हारी विनती को नकार कर तुम्हें अपमानित नहीं कर सकता नहीं कर सकता मद्र नरेश महारती शल्य अंगराज कण के सारथी बनेंगे जी हां कुलगुरु मेरे ही सामने उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार करके करण को सम्मानित किया था उनके सारथी बनने से तो अर्जुन और कर्ण के द्वंद युद्ध की रूपरेखा ही बदल जाएगी वासुदेव कृष्ण के अतिरिक्त उन जैसा सारथी आज संसार में नहीं है और कदाचित कल भी नहीं था मैं तो आप दोनों को यही सुखद समाचार देने आया था और मध नरेश है कहां वे भ्राता श्री युधिष्ठिर से यह कहने गए हैं कि वह हमारे पक्ष में ही युद्ध करेंगे मुझे तो लगता है धीरे-धीरे भ्राता श्री के सारे महारथी टूटकर इधर आ जाएंगे और वे अपने चार अनुज के साथ रणभूमि में खड़े रह जाएंगे प्रणाम मुझे आज्ञा दीजिए प्रणाम आज्ञा चाहता [हंसी] [संगीत] हूं आभार महाभारत महाभारत [संगीत] म महाभारत [संगीत]
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