Wednesday, 31 December 2025

भरत राजा ने धृतराष्ट्र से न्याय माँगा Mahabharat (महाभारत) Scene BR Chopra Pen Bhakti

[संगीत] महा भारत धर्म रक्षक प्रजा पालक न्याय मूर्ति हस्तिनापुर नरेश चक्रवर्ती महाराज भरत रहे [संगीत] [प्रशंसा] हैं शकुंतला पुत्र भरत हस्तिनापुर नरेश महाराज तराज से न्याय मा माने आया है बैठे रहो पुत्र बैठे रहो तुम वर्तमान हो और वर्तमान को केवल भविष्य के लिए उठना चाहिए यदि तुम उसके लिए नहीं उठोगे तो वह तुम्हें स्वयं उठा देगा मैं तो तुम्हारा अतीत हूं जो वर्तमान के भविष्य के लिए स्थान रिक्त कर चुका है मैं केवल तुम्हें यह बताने के लिए आया हूं पुत्र कि राज्य सभा तुम्हारी उच्चा आकांक्षा का आमोद ग्रह नहीं ये तुम्हारा तपोवन है राजनीति तुम्हारी तपस्या है इसलिए सिंहासन पर बैठे रहो क्योंकि आज तुम्हारा एक पूर्वज तुमसे न्याय मांगने आया है न्याय कि त मैं आपके साथ कैसे अन्याय कर सकता हूं आप तो अतीत है और कोई वर्तमान अपने अतीत के साथ न्याय या अन्याय कैसे कर सकता है तो क्या तुम यह कहना चाहते हो कि वर्तमान होने के नाते तुम अतीत के सामने उत्तरदाई नहीं और जब भविष वर्तमान बनेगा तो तुम अतीत बन चुके तुम्हारे कहने का तात्पर्य क्या यह है कि वर्तमान भूत और भविष्य दोनों ही के आगे उत्तरदाई नहीं और स्वम आप ही अपना स्वामी है यदि ऐसा है तो इसका अभिप्राय यह है कि तुम काल का अर्थ ही नहीं समझते वर्तमान अतीत का उत्तराधिकारी होता है नरेश इसलिए मुझे तुमसे प्रश्न करने का अधिकार है परंतु श्रीव तुम राजा हो और मैं वादी मेरा वाद सुनो और मुझे न्याय दो आज तुम उस सिंहासन पर बैठे हो जिस पर कभी मैं बैठा करता था महाराज मुझ पर बहुत बड़ा अत्याचार हुआ है किसने अत्याचार किया है आप पर स्वयं महाराज ने मैंने तुम कैसे राजा हो कि तुम उन जीवन मूल्यों की सुरक्षा करना तो दूर उनका अपमान कर रहे हो घसीटते फिर रहे हो उ अपनी उचा आकांक्षा की दलदल में तुमने मेरा और अपने इस धरोहर का अपमान किया है तुम कैसे भूल गए धृतराष्ट्र स्वयं मैंने अपने पुत्रों को इस राज मुकुट के योग्य ना पाकर भरद्वाज पुत्र भूमन को राजा बना दिया और तुम अपने अयोग्य पुत्र को राजा बनाने के लिए स्वयं अपने ही अनुज पांडु पुत्र युधिष्ठिर के साथ अन्याय कर रहे हो और ऐसा करते लाज भी आई तुम्ह डूब मरने को भी जीने चाह तुम्हारा हस्तिनापुर नरे मेरा उपालंभ सुनो और यदि हो सके तो मेरे साथ न्याय करो महाराज मेरे एक वंशज ने मुझे और मेरे सिंहासन को अपमानित किया है अपनी धरोहर का वध किया है उसने अपने पुत्र मुह में पड़कर देश प्रेम और राजनीति की मर्यादा को बंद किया है उसने अपने अनुज पांड पुत्रों के साथ कपट किया है उसने अपनी ही भरी सभा में अपनी ही कुल वधु के वस्त्र हरण को अपने मौन द्वारा सहमति दी है हे हस्तिनापुर नरेश हे न्याय के उत्तराधिकारी हे धर्म ध्वज रक्षक मेरे उस उत्तराधिकारी ने मेरे वंश को कलंकित किया है उसे कड़े से कड़ा दंड देकर मेरे साथ न्याय कीजिए महाराज न्याय कीजिए किंतु मैं अपने पुत्र दुर्योधन कोयो ये नहीं मानता मैं स्वर्गीय महाराज विचित्र वीर्य का जेष्ठ पुत्र हूं और दुर्योधन मेरा ज्येष्ठ पुत्र है इस नाते यदि वो योग्य है तो मेरे पश्चात इस सिंहासन पर उसका अधिकार सबसे पहला है और वर्तमान अतीत की परिभाषाएं सुनकर उनके आधार पर कोई निर्णय नहीं ले सकता है आपके युग में योग्यता की परिभाषा कुछ और रही होगी मैं ये नहीं कहता कि अपने युग में आपने जो निर्णय लिया था वो ठीक नहीं था वो तो आप जाने और आपका युग परंतु यह मेरा युग है और मैंने जो निर्णय लिए हैं वो मेरे और मेरे युग के बीच में [संगीत] है इसलिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूं मैं आपके सामने उत्तरदाई नहीं हूं और यदि हूं तो यह बतलाइए कि आप यह दुखड़ा यह परिवाद य उपाल लेकर अपने वंश स्वर्गीय शांतनु के पास क्यों नहीं गए जिन्होंने श्री मोह में पड़कर अपने पुत्र देवव्रत के सभी अधिकार छीनकर अपने उस पुत्र को दे दिए थे जिसका अभी जन्म भी निश्चित नहीं था झूठ मत बोलो धृतराष्ट्र झूठ मत बोलो महाराज बनकर पूछो मेरे पुत्र से कि अभी अभी तुमने मुझ पर जो आरोप लगाया है वो कितना निराधार [संगीत] है के वियोग में भले ही अपने प्राण त्याग देता परंतु अपने पुत्र और हस्तिनापुर के साथ इतना बड़ा अन्याय कभी ना करता किंतु तुमने तुमने तो जीती मक्खी निकली है धृतराष्ट्र अरे इस अपराध के लिए तुम्हें भरत वंश और भारतवर्ष कभी क्षमा नहीं करेगा तुम अपने पुत्र के साथ मेरे पुत्र की तुलना कर रहे हो अपनी प्रतिज्ञा की की डोरी में बंधी हुई श्वेत आत्मा को इस महान योद्धा महान तपस्वी महान राजनीतिज्ञ को तुम अपने निहित स्वार्थ के क्रीड़ा कृह में केंद की तरह उछाल रहे हो तुमने इसकी व्यवस्था को अपनी ढाल बना लिया है धृतराष्ट्र किंतु तुम उस दिन क्या करोगे जिस दिन की ढाल टूट जाएगी तुम केवल नेत्रहीन हो पुत्र बुद्धिहीन नहीं हो को तुम भली भाती जानते हो कि तुम क्या कर रहे हो पर आज हस्तिना पर में जो हो रहा है उसका उत्तरदायित्व केवल तुम पर है मैं हस्तिनापुर और अपने पुत्र भीष्म के अपमान पर तुम्हें कभी क्षमा नहीं करूंगा कभी नहीं मैं क्या करूं दुर्योधन मेरे ही व्यक्तित्व का प्रक्षेपण है दुर्योधन मेरा ही प्रक्षेपण है दुर्योधन मेरे व्यक्तित्व का प्रक्षेपण है दुर्योधन मेरा प्रक्षेपण है दुधन मेरा प्रक्षेपण [संगीत] है अरे अरे पुत्र क्या कोई स्वप्न देख रहे [संगीत] थे पता नहीं पता नहीं वो सपना था या सत्य किंतु जो कुछ भी था बहुत भयानक था व कह रहे थे नहीं नहीं वह मांग कर रहे थे व आदेश दे रहे थे कि मैं दुर्योधन को किसी सड़े हुए अंग की भाति काट के फेंक द मैं कौन मेरे पूर्वज कधी क्या मैंने वास्तव में ही अपने अनुज पुत्रों के साथ कोई अन्याय किया है मैंने उन्हें अपना आधा राज्य दे दिया वे उस राज्य को दत क्रीड़ा में हार गए तो मैं क्या [संगीत] कर जो राजा अपना राज अपने अनुज अपनी रानी को दत में हार जा वो राजा बनने योग्य ही नहीं है वे हारे नहीं थे आर पुत्र कपट द्वारा हराए गए थे मान लिया परंतु फिर भी अपनी संपत्ति अपना मुकुट अपने अनुज अपनी रानी को स्वयं युधिष्ठिर ही ने तो दाव पर लगाया था अब उस परिणाम का दंड मेरा दुर्योधन क्यों भुगते इसका दंड दुर्योधन इसलिए भुगते ग रे पुत्र कि उसका संकल्प कुलीन और शुभ नहीं था तो क्या पांडु पुत्रों का कोई दोष नहीं था अवश्य था और अपने इस दोष के दंड को वे भुगत रहे हैं आर्यपुत्र यदि आप सचमुच दुर्योधन की रक्षा ही करना चाहते हैं तो प्रिय पांडवों को वापस बुलवा लीजिए उन्हें आशीर्वाद दीजिए और उनसे कहिए कि वे इंद्र प्रस्थ की और प्रस्थान करें यह संभव नहीं है गांधारी अब यह संभव नहीं है क्योंकि यदि मैंने ऐसा किया तो दुर्योधन कहेगा कि उनका अज्ञातवास टूट गया है और इसके फल स्वरूप व 12 बरस का वनवास फिर ले आप राजा और पिता होने के नाते उसे आदेश दे सकते हैं परंतु ये नेत्रहीन धृतराष्ट्र उन्हें खोजने कहां जाए किसे पता है कि अपने अज्ञातवास का यह वर्ष वे कहां और कैसे बिता रहे हैं महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत m

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