महाभारत हे केशव मैं नहीं चाहती कि आप शांति दूत बनकर हस्तिनापुर जाए और व दुराचारी दुर्य दुष्ट दुशासन और व विशेलाइज शांति मिले तो मुझे अपना अपमान स्वीकार है हां यदि इस सौदे के लिए मुझे पांडवों के आत्म सम्मान से मूल्य चुकाना पड़े तो वह शांति मैं नहीं लूंगा मैं तुम्हें यह वचन देता हूं जब तक मेरे यह केश खुले हुए हैं केशव क्या तब तक संपूर्ण शांति संभव है क्या मेरे यह खुले हुए केश अपमान के ध्वज की भाति सदैव ही कुंती पुत्रों के स्वाभिमान की शितिज पर लहराते नहीं रहेंगे जिसे आप शांति कह रहे हैं केशव कहीं वो आत्म समर्पण तो नहीं वे दुष्ट शांति नहीं दंड के अधिकारी है तनिक याद कीजिए केशव तनक याद कीजिए 13 वर्ष पहले की द्रौपदी हवन कुंड से उत्पन्न होने वाली य द्रोपदी महाराजा द्रुपद की की पुत्री द्रोपदी महावीर दृष्ट दुन की बहन द्र पदी पांच महारा की पत्नी दप पांच महार की माता रपति इन्हीं कि से पकड़ के खींची जाती हुई कैसे उस कुरु राज सभा में लाई गई थी जिसम सिंहासन पर भारतवंशियों की परंपरा के उत्तराधिकारी जेष्ठ पिताश्री महाराजा धीराज तरा विराजमान थे वो सभा गुरुओ और उनके शुभ चिंतकों से भरी हुई थी परंतु आपके अतिरिक्त गुरु मर्यादा की रक्षा करने के लिए कोई नहीं बढ़ा हे वासुदेव मैं ना तो उनसे आशीर्वाद लेने को तैयार हूं और ना ही उन्ह आशीर्वाद देने को क्या मैं नहीं जानता कृष्ण मैं यह सब जानता हूं सब जानता हूं तुम्हारे यह खुले हुए केश में देख रहा उनमें भरी हुई कुरु राज सभा की धूल मैं देख रहा हूं और उस धूल की दुर्गन भी मुझ तक आ रही है फिर भी कृष्ण शांति फिर शांति है मैं तो केवल यह कह रही हूं केशव कि शांति की बात करते समय आप यह ना भूल जाइएगा कि दुशासन के मेले हाथों ने मुझे छुआ था दुर्योधन ने भरे सभागृह में मुझे देखकर अपनी जंघा पीटी थी और उस सूत पुत्र कण ने मुझे गुरु की कुल वधु द्रौपदी को गुरुराज सभा में वेश था हे देवकी नंदन हे नंदलाल मैं नहीं चाहती कि उसी राज सभा में उन्ही लोगों के पास हमारी ओर से कोई शांति दत बन कर जाए यदि धर्मराज दिर सर्वश्रेष्ठ गदाधर भीम गांडीव धरी अर्जुन मरती नकुल और मारती सहदेव शांति चाहते हो तो वह अवश्य अपने स्वाभिमान से मूल्य चुका दे और शांति ले ले मेरे इन खुले हुए केशों के लिए मेरे बुढे पिता दुशासन के ति का लहू लाएंगे मेरा जवान भाई कण की जीभ काटेगा और मेरे पांच महारथ पुत्र दुर्योधन की जंगा दौड़ेंगे रो मत कृष्ण रो मत रोना तो दूसरी कुरु नारियों का भाग्य बन चुका है हे याज्ञ सेनी यूं रोना तुम्हारी आ को शोभा नहीं देता तुम्हारी इन आंखों से तो भारतवर्ष के भविष्य के सूर्य को उदय होना है याज्ञ सेनी मत रो बहना द्रोपदी [संगीत] जीवन है [संगीत] संग्राम धीरज धर मन शा कर पूर्ण होंगे सब काम पूर्ण होंगे सब [संगीत] काम सत असत सर्वत्र है अबला सबला हो नारायण पूरक मने पांचाली जब रो पांचाली जबरो आभार माभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत [संगीत]
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