Sunday, 28 December 2025

द्रोणाचार्य ने अर्जुन की परीक्षा क्यों ली थी Mahabharat (महाभारत) Scene B R Chopra Pen Bhakti

[संगीत] [संगीत] महाभारत [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [प्रशंसा] [संगीत] अन अर्जुन गुरुदेव मैंने तो तुम्हें अभी इसकी शिक्षा दी ही नहीं शिक्षा तो आप ही ने दी है गुरुदेव परंतु प्रेरणा भैया भीम की से मिली कैसी रुचि जो उन्हें खाने में मिलती है मैंने देखा कि वे अंधकार में बैठे खा रहे हैं और उनका हाथ मुं तक जाने में एक बार भी नहीं चूका मैंने पूछा कि ये संभव कैसे हुआ तो वे बोले कि हाथों में भी आंखें होती हैं अब यदि हाथों में भी आंखें होती हैं तो वे हाथ वाण भी चला सकते हैं इसी का प्रयास करा हूं गुरुदेव यदि मुझसे कोई भूल हुई हो तो क्षमा चाहता हूं गुरुदेव नहीं वत्स नहीं तुमने तो मेरा हृदय ही जीत लिया तुम में एक अच्छे शिश होने के सारे लक्षण क्योंकि यदि सीखने वाला ही उद्यत ना हो तो सिखाने वाला सिखाएगा क्या ज्ञान भी एक बीज है अर्जुन मन की भूमि उपजाऊ होनी चाहिए अर्जुन मैं तुम में एक महान योद्धा होने के सारे लक्षण देख रहा हूं मैं तुम्ह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी अवश्य बनाऊंगा और ब्रह्मास्त्र का वरदान भी दूंगा योद्धा के दो शत्रु होते हैं थकान और निद्रा और उसके दो मित्र भी होते हैं परिश्रम और सावधानी जिस योद्धा ने इन दोनों शत्रुओं पर विजय पा ली और जिसको यह दोनों मित्र मिल गए वो अजय हो जाता है और आज मैं तुम्हें यही आशीर्वाद देता गंगा में स्नान करके सूर्यदेव से नई शक्ति का वरदान मांगता हूं है [प्रशंसा] [प्रशंसा] आ [प्रशंसा] आ तुम अपनी परीक्षा में सफल हुए अर्जुन परीक्षा गुरुदेव अचरज की बात नहीं है ब यह घड़ियाल नहीं [संगीत] था केवल एक यंत्र [संगीत] था लीजिए गुरुदेव गुरुदेव हम लोग सहायता लेने गए थे सहायता लेने गए थे या डर कर भाग गए थे कायर कहीं का मुझे कायर कहता है तुम कायर नहीं हो परंतु तुमने अपनी घमंड की डोरी से अपने वीरता के हाथ पांव बांध रखे हैं वीरों और राजपुत्र को अहंकार शोभा नहीं देता है क्योंकि अहंकार दुर्बलता का प्रतीक है पहले अपने अहंकार पर विजय पाने का प्रयत्न करो राजकुमार दुर्योधन नम्र होना सी क्योंकि नम्रता ही उन्नति का मार्ग महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत महा भार

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