[संगीत] महाभारत चिंता क्यों कर रहे हो मित्र यदि अज्ञातवास का बरस समाप्त हो चुका है तो हो जाने दो उसे इसी बरस की भाति अगले बरस तक पांडव भी समाप्त हो जाएंगे मेरी चिंता का कारण अज्ञातवास नहीं है मित्र मेरी चिंता का कारण है गुप्त चरों की असफलता गुप्त चर तो शासन का एक हाथ होते हैं मित्र यदि कुछ पता चला ही नहीं सकते किसी को खोज ही नहीं सकते तो उस राज्य और उस राजा की सुरक्षा तो असंभव हो जाएगी ना शासन अटकल की उंगली पकड़ कर नहीं चल सकता मित्र मैं हस्तिनापुर के होने वाले राजा के नाते आज यह जानना चाहता हूं इस राज्य के पांच शत्रु कहां छिपे हुए हैं और किसने उ आश्रय दे स्वयं अपने जीवन काल के दिन कम कर लिए हैं पांडवों से क्या डरना मित्र नगल और सहदेव तो बालक है और यदि वे योद्धा भी हो तो मेरे 9 भाई उनके लिए बहुत है युधिष्ठिर युधिष्ठिर तो धर्म के व्यूह में फसे हुए हैं बेचारे विवश है अब रहे भीम और अर्जुन तो भीम की मुझे चिंता ही नहीं क्योंकि यह तेरे वर्ष उसने बनवास में बिताए हैं और मैंने यह 1 वर्ष गदा युद्ध के अभ्यास में अब रहा अर्जुन तो वो भला तुम्हारे सामने क्या टिकेगा काका श्री की नीति यह ठीक ही कहती है कि राजा के लिए आवश्यक है कि वह अपने शत्रुओं के साथ अपने मंत्रियों और अपने अंग रक्षकों को देखते रहना चाहिए तो मैं अपने गुप्त चरों का क्या करूं मित्र जो इसका पता नहीं चला सके कि मेरे सबसे बड़े शत्रु कहां छिपे हुए हैं यह चिंता का विषय है मित्र बहुत बड़ी चिंता का विषय है लगता है कोई गंभीर समाचार है तुम्हारे पास समाचार मैं सुनाई देता हूं मूल्यांकन आप लोग कीजिए अभी-अभी पिता श्री को यह सूचना दी गई है कि मत से देश के महारथी कीचक की हत्या हो गई है कीचक की हत्या असंभव असंभव परंतु क्यों कीचक वद की योग्यता केवल छ योद्धा में है कृष्ण के दाऊ बलराम तुम्हारे पिता मा भीष्म तुम्हारे गुरु आचार्य द्रोण स्वयं तुम मैं और भीम तो फिर उसका वद किया किसने भीम बहुत अच्छा प्रश्न किया तुमने बलराम दाव ने उसका वध किया नहीं पितामह आचार्य द्रोण तुमने या मैंने उसे मारा नहीं तो फिर उसे उसी योद्धा ने मारा होगा जिसे खोजने में हमारे गुप्त चर आज तक सफल नहीं हुए मुझे बधाई दो मित्र कि मैंने उनके अज्ञातवास के रहस्य को तोड़ दिया है चलो सेना लेकर चले और मत से देश पर आक्रमण करें क्योंकि मत से नरेश को पांडवों का आश्रय देने का दंड भी देना है उनसे युद्ध करने के लिए तो मैं सदैव ही तैयार रहता हूं किंतु आक्रमण करने के लिए महाराज की आज्ञा तो आवश्यक है और मुझे तो नहीं लगता कि महात्मा विदुर और गंगापुत्र भीष्म उन्हें य आज्ञा देने देंगे यह ना भूलो मित्र कि महात्मा विदुर गुरुवर द्रोण और पिता भीष्म यह सभी राजकीय कोष से वेतन पाते हैं इनमें से कोई भी राजद्रोह का अपराध नहीं करेगा इन लोगों के पास निष्ठा और कर्तव्य का मापदंड ही कुछ और है यह सभी राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानते हैं यह अपने नरेश का विरोध नहीं कर सकते अर्थात निर्णय महाराज के हाथ में है हा और स्वयं महाराज मेरे हाथ में अपने पिताश्री के विषय में इतने विश्वास के साथ कुछ ना कहा करो पुत्र दुर्योधन वोह अपने हाथ के अतिरिक्त किसी और के हाथ में नहीं है तो क्या हमें उनके अज्ञातवास को भंग नहीं करना चाहिए यदि उसे भंग करने का विचार ना होता तो हमने उसकी मांग ही क्यों की होती पुत्र आप कभी तो दो सीधे बोल बोल लिया कीजिए मामा श्री सीधे बोल बोलने वाला सतयुग तो कब का समाप्त हो चुका है अंगराज यह तो टेढ़े बोल बोलने वाला युग है यदि जीना चाहते हो तो यह कला भी सीख लो कि कहो कुछ और और अर्थ निकले कुछ [संगीत] और गंगा पुत्र भीष्म भी सत्य बोलते हैं आचार्य गुरु द्रोण भी सत्य बोलते हैं और कुल गुरु कृपाचार्य भी सत्य बोलते हैं परंतु यह सब के सब अपने होठों को सीए हुए क्यों बैठे हैं अंगराज बोलो क्यों बैठे हैं सत्य तो अब केवल ऋषियों और मह ऋषियों का रूचि कर्म बनकर रह गया है करने योग्य वही है जिसमें तुम्हारा लाभ हो और तुम्हारा लाभ पुत्र दुर्योधन के लाभ की छाया है तुम एक महान योद्धा हो अंगराज तो अपनी वीरता को संभाल कर रखो और जब आवश्यकता होगी तो मैं स्वयं तुमसे यह कहूंगा कि हे अंगराज कर्ण उठाओ अपना धनुष और चढ़ाओ प्रत्यंचा म देश पर तो आक्रमण करना ही पड़ेगा वे पांचों वीर पुरुष उस राज्य पर आक्रमण होता नहीं देख सकते जिसने उन्हें आश्रय दिया है वे अज्ञातवास तोड़कर अवश्य सामने आएंगे और लड़ेंगे भी और यदि वे जीत भी गए तो उन्हें 12 वर्ष के लिए वनवास को जाना ही पड़ेगा तो ठीक है मामा श्री मैं जाकर पिता श्री से आक्रमण की आज्ञा ले लेता हूं तुम इतने उतावले क्यों रहते हो भांजे यदि उस दासी पुत्र विदुर या गंगा पुत्र भीष्म को तनिक भी यह भनक पड़ गई कि तुम पांडवों के अज्ञातवास को भंग करने के लिए बत से देश पर आक्रमण करना चाहते हो तो वह कुछ ना कुछ करके महाराज को यह आक्रमण करने की आज्ञा देने से रोक देंगे तो मैं पिता श्री की आज्ञा के ही आक्रमण कर देता हूं नहीं ऐसी भूल कभी ना करना भांजे कभी ना करना ऐसी भूल तुम तो युवराज हो महाराज के विरुद्ध तो कुछ कर ही नहीं सकते इसलिए महाराज से जाकर अर्ध सत्य बोलो उनसे कहो के कीचक वत के उपरांत मत देश अनाथ हो गया है और उसकी सीमाए किसी छोटी सी की भांती हस्तिनापुर के विशाल राज्य के सागर में मिलने के लिए व्याकुल है गंगापुत्र भीष्म भी इसका विरोध नहीं कर पाएंगे भांजे नहीं कर पाएंगे इसका विरोध गंगापुत्र भीष्म [संगीत] भी किंतु मत्स देश से तो हमारे मैत्री संबंध है दुर्योधन जबी तो हम उसे आश्रय देना चाहते हैं पिता मा सूचना मिली है कि त्रिगत देश का राजा सु शर्मा मत्स देश पर आक्रमण करने के लिए निकलने ही वाला है यदि उसके आक्रमण करने से पहले मत्स देश हस्तिनापुर से मिल चुका हो तो सु शर्मा उसकी ओर देखने का साहस तक नहीं कर पाएगा दुर्योधन यह तो ठीक कह रहा है ता मैं धरोहर में पाई हुई सीमाओं से संतुष्ट कैसे हो जाऊं पिता मा और क्या यह क्षत्रिय धर्म की मांग नहीं है क्षत्रिय धर्म की तो और भी कहीं मांगे हैं पुत्र अर्थात आप यह निर्णय ले चुके हैं पितामह कि आप दुर्योधन के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगे क्या मैं लाक्षागृह स्वीकार कर लेता पुत्र क्या मैं द्यूत क्रीड़ा स्वीकार कर लेता पुत्र क्या मैं कुल वधु का वस्त्र हरण स्वीकार कर लेता पुत्र तक विचार तो करो कि तुम प्रस्ताव तो लाते हो तो कैसे कैसे लाते हो दूत क्रीड़ा के उपरांत मैंने सोना त्याग दिया है यदि पूर्वजों ने सपनों में आकर मुझे प्रश्न करना आरंभ कर दिया तो मैं क्या करूंगा मैं क्या जवाब दूंगा उन्हें परंतु यदि तुम म देश को जी नहीं चाहते हो तो चलो पुत्र मैं तो हस्तिनापुर के ध्वज का ध्रुव हूं जहां जहां ध्वज जाएगा वहां वहां तो मुझे जाना ही पड़ेगा वहां वहां मुझे जाना ही पड़ेगा भीष्म पितामह सोचते सोच कापते आप नाश निमंत्रण दे रहा दुर्योधन का पाप महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत महा रा [संगीत]
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