महाभारत मैंने तो सुना था लोक पंचाल नरेश को खींचते हुए यहां लाकर गुरु चरणों में डालने वाले हैं अनुज भीम अपने भाई पर व्यक के वान मत चलाओ युद्ध में किसी ना किसी को तो हारना ही पड़ता है मैं गुरु दक्षिणा देने में असफल रहा गुरुदेव मुझे क्षमा करें नहीं महत्व प्रयत्न का है सफलता या असफलता का नहीं तुमने अपने प्रयत्न की गुरु दक्षिणा दे दी है और मैंने गुरु दक्षिणा स्वीकार भी कर ली है अब हमारे लिए क्या आदेश है गुरुदेव तुम पांचों भाइयों से भी वही गुरु दक्षिणा मांग रहा हूं यदि ला सको तो द्रुपद को बंदी बनाकर ले आओ जो आज्ञा गुरुदेव किस ध्वज की छाया में जाओगे हस्तिनापुर का ध्वज तो हम ले जा नहीं सकते गुरुदेव कारण क्योंकि हसनापुर का ध्वज इस युद्ध में जा नहीं सकता गुरुदेव उसका कारण कारण यह है गुरुदेव कि आपने हस्तिनापुर से गुरु दक्षिणा नहीं मांगी है इसीलिए इस युद्ध में हस्तिनापुर का ध्वज ले जाने का हम में से किसी को अधिकार ही नहीं है परंतु मुझे अधिकार था और तुमने उस ध्वज का बड़ा मान रखा भीम सेन क्षमा चाहता हूं गुरुदेव मुझे मन में बात रखना नहीं आता तब तो अच्छा ही हुआ कि तुम जेष्ठ कौरव पुत्र नहीं हो परंतु युधिष्ठिर ने ठीक ही कहा है दुर्योधन कि हस्तिनापुर के ध्वज पर ना तो तुम्हारा अधिकार है और ना ही युधिष्ठिर का और युधिष्ठिर ने यह भी ठीक कहा है कि मैंने हस्तिनापुर से गुरु दक्षिणा नहीं मांगी है इसलिए हस्तिनापुर का ध्वज क्यों जाए आपको तो इन्ही लोगों की हर बात ठीक लगती है गुरुदेव परंतु चाहे य जिस ध्वज की छाया में जाए जो युद्ध मैं ना जीत पाया वह युद्ध यह भी कभी नहीं जीत सकते दुर्योधन तुम काल नहीं हो तुम केवल एक राजकुमार हो इसलिए भ के बारे में कुछ नहीं जानते और ना ही तुम आकाश हो की तुम्हारी वाणी आकाशवाणी मानी जाए युद्ध में कौन जीतेगा कौन हारेगा इसका निर्णय रणभूमि में ही हो सकता है विजय [संगीत] हो [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] केवल पांच [प्रशंसा] [प्रशंसा] आमार [प्रशंसा] ज [संगीत] ज [संगीत] [संगीत] सावधान धुप [संगीत] आ मैं आपको आचार्य द्रोण के नाम पर बंदी बनाता हूं [संगीत] क्या आज मैं तुम्हें अपना मित्र कह सकता हूं परंतु तुम तो मेरे इन शिष्यों के बराबर भी नहीं निकले फिर मेरे और तुम्हारे बीच में मित्रता कैसी मैं तो आज भी वही ब्राह्मण हूं फिर भी तुम मेरे मित्र हो तुमने अपना वचन तो नहीं निभाया मैं अवश्य निभाऊंगा मेरा जो कुछ भी है वह तुम्हारा भी है इसलिए तुम्हारा आधा राज तुम्हें लौटा हूं और आधा स्वयं लेता हूं ताकि समानता हो जाए परंतु आज तुम मेरे सामने खड़े हो इसलिए तुम्हें दंड अवश्य दूंगा तुम्हारी गौशाला की जितनी भी गाय हैं वह भी आधी आधी बटग और उस विभाजन के पश्चात तुम्हारे भाग की जो गाय होंगी उनमें से एक गाय मैं अवश्य लूंगा और वह एक गाय लेकर मैं अपनी कृपी के पास जाऊंगा और कहूंगा लो कृपी मैं अपने मित्र द्रुपद की गौशाला से एक गाय ले आया हूं महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत
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