[संगीत] [संगीत] महाभारत यदि यात्री ब्राह्मण हमारा भोजन ग्रहण करें तो उनकी बड़ी कृपा होगी देवी लगता है क्षत्रियों में तुमने अपना जीवन बिताया है क्योंकि तुम ब्राह्मणों की भाषा भूल चुकी हो परंतु हम तुम्हारा निमंत्रण स्वीकार करते [संगीत] हैं क्या तुम भी अपने पुत्रों के साथ कामिले नगरी जा रही हो परंतु कामिले में ऐसा क्या हो रहा है जो अतिथि ने यह प्रश्न किया वहां महाराज द्रुपद की सुपुत्री राजकुमारी द्रौपदी का स्वयंवर हो रहा है सारे भारत वर्ष के राजा महाराजा आज उसी दिशा में जा रहे हैं किंतु पंचाल नरेश की पुत्री इतनी बड़ी कैसे हो सकती है कि उसका स्वयंबर रचाया जाए वो बड़ी विचित्र कन्या है देवी वो कैसे यह कथा बहुत लंबी है भोजन के उपरांत तुम्हें सुनाऊंगा तुम लोगों को पता नहीं परंतु पंचाल नरेश के मन में एक गांठ पड़ी हुई है [संगीत] हां तो मैं यह कह रहा था कि पंचाल नरेश के मन में एक गांठ पड़ी हुई है द्रोपती जन्म भी उसी गांठ का एक भाग है अच्छा तो वह गांठ क्या है आचार्य द्रोण का नाम तो आपने सुना ही होगा उनका नाम भला यहां से लेकर देवलोक तक किसने ना सुना होगा आचार्य द्रोण और महाराज द्रुपद की मित्रता पुरानी थी गुरुकुल के दिनों की उन दिनों की मित्रता की भावना से उत्तेजित होकर महाराज ने आचार्य से कह दिया कि उनके आधे राजपाट पर उनके मित्र द्रोण का अधिकार होगा द्रोण इसको सच मान बैठे और यह भूल गए कि ब्राह्मण को राज पाठ से क्या लेना देना जब द्रुपद राजा बने तो द्रोण वहां जा पहुंचे वो राज्य मांगने तो नहीं गए थे हमने तो ऐसा ही सुना है अहम ब्राह्मण को शोभा नहीं देता यही कारण है कि उसे भिक्षा के मार्ग पर चलना पड़ता है आचार्य द्रोण यह भूल गए उन्होंने राजा से बराबरी करनी चाहि क्षत्रियों में तो अहंकार होता ही है द्रुपद को द्रोण का स्वभाव अच्छा नहीं लगा और उन्होंने उनसे कह भी दिया और द्रोण अपने मन में गांठ बांध वहां से चले गए भाग्य ने इस ब्राह्मण कार्य में उनका पक्ष क्यों लिया यह तो विधाता ही जाने परंतु उन्हें हस्तिनापुर के राजकुमारों के प्रशिक्षण का कार्य मिल गया और शिक्षा समाप्ति के उपरांत उन्होंने अपने शिष्यों से गुरु दक्षिणा के रूप में पंचाल राज को मांग लिया गांधारी पुत्र तो य दक्षिणा नहीं दे सके परंतु कुंती पुत्रों ने दक्षिणा दी और मैं यह अवश्य कहूंगा कि आचार्य द्रोण ने मित्रता की लाज अवश्य रखी उन्होंने द्रुपद से कहा मित्र तुम्हारे पास जो कुछ था उसमें तुमने मुझे आधे का भागीदार नहीं बनाया परंतु मैं यह नहीं कर सकता इसीलिए पंचाल राज्य जो आज मेरा है उसका आधा भाग मैं तुम्हें देता हूं ब्राह्मण तो फिर ब्राह्मण द्रोण जी नीति में चोट खा गए राज में भागीदारी नहीं होती और यही हुआ ध्रुपद का हृदय प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगा अब उनके पास केवल जीवन का एक ही लक्ष्य था के आचार्य द्रोण से अपमान के प्रतिशोध का कोई उपाय सूझ जाए उन्होंने एक ऐसे पुत्र का स्वप्न देखना प्रारंभ किया जो ध्रूण का वध कर सके ऐसा पुत्र हाट में तो मिलता नहीं ऐसा पुत्र तो केवल यज्ञ द्वारा ही मिलता है तो द्रुपद उस ऋषि की खोज में निकल [संगीत] पड़े लक्ष बने प्रतिशोध जब होता नष्ट विवेक पुत्र रूप में भी द्रुपद शस्त्र मांगता एक शस्त्र मांगता एक [संगीत] प्रणाम ऋषिवर ऋषिवर ने आशीर्वाद नहीं दिया नहीं क्योंकि जो आशीर्वाद तुम मांग रहे हो वह आशीर्वाद मैं दे नहीं सकता मैं तो केवल एक पुत्र का आशीर्वाद मांग रहा हूं गुरुदेव किंतु तुम यह पुत्र चाहते क्यों हो राजन पुत्र के रूप में तुम शस्त्र चाहते हो जिससे ब्रह्म हत्या कर सको तुम आशीर्वाद नहीं एक शाप मांग रहे हो और मैं तुम्हें शाप कैसे दूं ऋषिवर जैसा कि आप जानते ही हैं कि द्रोण ने मुझे अपमानित किया है मैं उसी नरक की आग में चल रहा हूं तुमने अपने लिए स्वयं ही यह नरक मोल लिया है राजन मत जलो इस नरक में निकल जाओ इस नरक से जीवन बड़ा अनमोल होता है केवल प्रतिशोध इसका अंतिम लक्षण नहीं हो सकता फिर भी आप ब्राह्मण है आशीर्वाद देना आपका कर्तव्य है हां तो आशीर्वाद के रूप में मैं तुम्हें एक नाम बताता हूं मेरे ज्येष्ठ भ्राता याज के पास जाओ उन्हें पवित्रता और अपवित्र का बहुत विवेक नहीं है उनका द्वार खटखटा हो बड़ी कृपा की ऋषिवर प्रणाम प्रणाम ऋषिवर यहां कैसे आए राजन मैं एक पुत्र कामे यज्ञ करना चाता हूं ऋषिवर ताकि द्रोण का संहार करने वाला पुत्र पा सक इसके लिए मैं आपकी कोई भी सेवा करने को उद्यत हूं एक अरबो गाय तक देने को तैयार हूं तुम्हें यहां का मार्ग अवश्य प्याज ने दिखाया होगा जी ऋषिवर उसके विचार में मैं हर अशुद्ध कार्य कर लेता हूं परंतु क्या अशुद्ध है क्या शुद्ध इसका निर्णय कौन लेगा क्या उ प्याज यदि तुम्हारे भाग्य में द्रोण संघार पुत्र है तो वह पुत्र तुम्ह अवश्य प्राप्त होगा किंतु तुम्हारा भाग्य मैंने नहीं लिखा है विधाता ने लिखा है ना क्या विधाता कोई अशुद्ध कार्य कर सकता है यदि हां तो मैं कोई अशुद्ध कार्य क्यों नहीं कर पाया यदि नहीं तो तुम्हारे भाग्य और द्रोणाचार्य के दुर्भाग्य की सहायता करना अनिष्ट कर्म कैसे हो जाएगा मैं यज्ञ अवश्य करूंगा ओ तुमास गर्भ जणा साहा यथा वायरे यथा समुद्र ते वामम दसमा अनास स्वाहा ओम पजाम ओ दे ओम स्वाहा ओम प्रजा देहि ओम प्रजा देहि ओम स्वाहा महारानी को बुलाइए जो आजा ऋषि स्वाहा स्वाहा महारानी को बुलाइए प्रणाम महाराज महारानी स्नान कर रही है श्वर महारानी स्नान कर रही है महूत किसी महारानी के स्नान के लिए नहीं ठहर सकता [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] दि [संगीत] और इस प्रकार ञ की अग्नि शिखा से दृष्ट दमन और द्रौपदी का जन्म हुआ और अब उसी द्रोपदी का स्वयं होने जा रहा है जो युवती रूप में ही जन्मी थी मैं तो कहता हूं देवी कि अपने पुत्रों को लेकर तुम भी जाओ इतना दान मिलेगा कि कई पीढ़ियों तक भिक्षा की आवश्यकता नहीं होगी राजकुमारी तो अत्यंत सुंदर होगी राजकुमारी कोई खाने की वस्तु थोड़ी ना मझले भैया वो स्वयंवर तो देखने योग्य होगा माता श्री अवश्य होगा अनुज ऐसा स्वयंबर तो आज से पहले ना कभी हुआ है ना आज के पश्चात कभी होगा सारे भारतवर्ष के राजा महाराज आएंगे और द्वारिका के यादव भी आएंगे अच्छा तब तो हमें उनके दर्शन के लिए अवश्य चलना चाहिए माता श्री हां पुत्र परंतु मैं तो द्रौपदी के दर्शन भी करना चाह महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत
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