Saturday, 27 December 2025

दुर्योधन इतना क्रोधित क्यों था Mahabharat Best Scene B R Chopra Pen Bhakti

[संगीत] महाभारत आ [संगीत] क्रोध कोई वस्त्र नहीं है कि उतार कर तास ताजियों पर फेंका जाए क्रोध तो उसी पर उतारा जाता है जो क्रोध का कारण हो मुझे बताओ बात क्या है क्या बताऊ मित्र एक नागिन मुझे डस कर उलट गई है जिसका विष मेरी नसों में रिस रहा है ये तुम क्या कह रहे हो मित्र कैसी नागिन कैसा विष मैं अपमान की अग्नि में जल रहा हूं मित्र और यह जलन मुझसे सही नहीं जा रही है यह अग्नि मेरे भीतर भक रही है और यदि यह अग्नि मुझे भस्म नहीं कर सकी तो इससे बचने के लिए मैं स्वयं अग्नि कुंड में कूद पड़ूंगा अपमान का यह कलंक मेरे माथे पर किसी वृक्ष की भांती उगाया है जो हर एक क्षण के साथ बढ़ता ही जा रहा है और मुझे इससे बचाव का कोई मार्ग दिखाई नहीं दे रहा यदि यह अपमान कोई वृक्ष है तो तुम्हारा यह मित्र उसे जड़ से काटने की शक्ति रखता है और यदि ये अपमान अग्नि का कोई सागर है तो तुम्हारा यह मित्र अपने वाण की वर्षा करके उस अग्नि के सागर को ठंडा कर देगा और यदि मुझे तुम्हारी मित्रता पर गर्व है करण मैं जानता हूं यदि आवश्यकता पड़ेगी तो तुम मेरा जीवन काल बढ़ाने के लिए स्वयं अपना जीवन दे दोगे यदि मेरे सामने मेरी मृत्यु खड़ी होगी तो तुम मेरे स्थान पर मरने के लिए भी तैयार हो जाओगे परंतु नहीं यह अपमान का क्षेत्र है और यदि अपमान का बदला स्वयं ना लिया जाए तो घाव भरने की जगह घ और गहरा हो जाता है मेरी तो समझ में नहीं आ रहा है कि पृथ्वी पर ऐसा कौन है जो तुम्हारा अपमान करने का साहस कर सके महावीर महारथी सर्वश्रेष्ठ गदाधर दुर्योधन का अपमान तो स्वयं इंद्र भी नहीं कर सकते मेरा अपमान किया उस पांच पतियों वाली द्रौपदी ने और मैं उससे अपने अपमान का बदला अवश्य लेकर रहूंगा और मैं उससे तुम्हारे अपमान का बदला भी लेकर रहूंगा मित्र उसका व वाण मेरे हृदय में अटका हुआ है जो उसने अपने स्वयंवर में तुम्हारी ओर चलाया था उसने मेरा अपमान नहीं किया था उसने तो मुझे बस राज्यसभा में मेरा अपना स्थान याद दिलाया था तुम्हारी कृपा से अंगराज होने के पश्चात भी सूत पुत्र तो मैं हूं ही और तब तक सूत पुत्र ही रहूंगा जब तक स्वयं मेरी माता आगे बढ़कर मुझसे मेरा परिचन करवा दे जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक तुम्हारा यह मित्र एक डूबा हुआ सूर्य है और एक डूबा हुआ सूर्य ही रहेगा अपने अंधेरे की गुफा का बंदी इसलिए मेरे मान अपमान की बात ना निकालो परंतु द्रौपदी उसे तो तुम्हारे अपमान का दंड अवश्य ही मिलना चाहिए मुझे आदेश दो कि मैं तुम्हारे घव पर लगाने के लिए इंद्र प्रस्त का भस्म ले आऊ और यदि स्वयं बदला लेना चाहते हो तो सेना लेकर चलो और इंद्र प्रस्थ की ईट से ईट बजा दो अरे तुम यह दिन रात रणभूमि में ना खड़े रहा करो अंगराज योद्धा होने का य अर्थ नहीं है कि ना दिन देखो ना रात बस धनुष परवान चढ़ाए खड़े रहो तो फिर अपमान का बदला कैसे लिया जाता है माम श्री बुद्धि से बुद्धि से बढ़कर ना कोई शस्त्र होता है अंगराज और ना ही कोई अस्त्र अरे मैं तो यह कहूंगा कि जीजा श्री के अनुज पुत्रों ने राजस्वी यज्ञ कर ही लिया है अब हस्तिनापुर को भी तो चाहिए कि उनके सम्मान में एक समारोह आयोजित करें जब समारोह होगा तो चौसर तो जमेगी ही सम्राट युधिष्ठिर से मैं एक बार हार ही चुका हूं तो क्या मुझे एक अवसर और नहीं मिलना चाहिए मैं तुम्हें वचन देता हूं प्रिय दुर्योधन के अब की बार जुए में यदि मैंने सम्राट युधिष्ठिर को कंगाल ना बना दिया तो वनवास ले लूंगा अरे इंद्रप्रस्थ में मैं कारण ही नहीं हारा था इसी हार से तो तुम्हारी जीत का मार्ग निकलेगा मुझे आ गया दो मित्र तुम्हें तो चले ही जाना चाहिए अंगराज क्योंकि यह समझदारी की बातें हैं जो तुम्हारी समझ में नहीं आएंगी मेरे शब्दकोश में षड्यंत्र का अर्थ समझदारी नहीं है प्रणाम तुम्हारा यह मित्र है बड़ा मूर्ख अरे मैं तो इसे इसलिए झेल हूं पुत्र कि तुम्हारे प्रति इसकी निष्ठा पर मुझे अटल विश्वास है हां राजनीति में ऐसे मूर्खों का अपना ही एक महत्व और स्थान होता है जब चाहो इन्हें वाण बनाकर किसी की ओर चला दो या फिर चासर की गोटी बनाकर पिटवा डालो तो मैं यह कह रहा था पुत्र कि मेरी इंद्रप्रस्थ वाली हार से ही तुम्हारी जीत का मा मार्ग निकलने वाला है और तुम यह भी देख लोगे कि यह मेरे पासे केवल पा से नहीं है यह मेरी सेना है जिन्होंने हारना तो कभी सीखा ही नहीं नहीं मामा श्री वे इतने मूर्ख नहीं है वे चौसर खेलने कभी नहीं आएंगे आएंगे भांजे वे अवश्य आएंगे क्योंकि कोई भी क्षत्रिय युद्ध और जुए के आमंत्रण को तो अस्वीकार कर ही नहीं सकता यह तो क्षत्रिय मर्यादा है भांजे और पांडव तो मर्यादा भंग कर ही नहीं सकते और फिर यह आमंत्रण तो जेष्ठ पिता श्री की ओर से जाएगा ना पांडव यहीं से इंद्र प्रस्थ लेकर गए थे भांजे पांडव यहीं पर इंद्र प्रस्त देकर जाएंगे और द्रौपदी मेरे अपमान का क्या होगा मामा श्री उसका भी उपाय सोच लिया जाएगा पर तो पिता श्री उनकी अनुमति मिलना बहुत कठिन है तब तो तुम अपने पिता श्री के पुत्र मोह को जानते ही नहीं भांजे अरे तुम कुछ चाहो और वो तुम्हें ना दे ये तो कभी हो ही नहीं सकता और यह भी ना भूलो के उनके हृदय में भी इंद्रप्रस्थ का चोर कहीं ना कहीं अवश्य बैठा है वे इंद्रप्रस्थ गए अवश्य थे परंतु वहां से प्रसन्न नहीं लौटे हैं सम्राट युधिष्ठिर ने उनसे उनका एक स्वप्न झपट लिया है वह तो सदैव यही चाहते थे कि तुम्हारा राज सु यज्ञ हो तो क्या वो मान जाएंगे कह के देख लो पुत्र हां हाथ कंगन को आरसी क्या हां तुम चिंता ना करो दुर्योधन महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत

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