[संगीत] महाभारत युवराज की जय [संगीत] हो तुम सहायता मांगने युधिष्ठिर के पास क्यों गए [संगीत] थे मैं आपका अंगरक्षक हूं आपकी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है मेरा अपमान करके मेरे प्राणों की रक्षा करोगे तुम मुझे पांडवों का आभारी बनाकर मेरे प्राणों की रक्षा करोगे तुम यदि तुम्हारे थान पर कोई और रहा होता तो कुरु वंश के आत्म सम्मान की सौगंध मैंने तुम्हारी गर्दन तोड़ दी होती परंतु तुम एक सैनिक हो और मैं तुम्हें ऐसी ही मृत्यु देना चाहता हूं जो सैनिक को शोभा देती है अपना मन चाहा शस्त्र चुन लो युवराज यदि मैंने वहां जाकर कोई अपराध किया [संगीत] है तो क्षमा चाहता हूं यदि अपने अपराध से पहले यदि बोलोगे तुम तुमने अपराध किया है और मैं तुम्हें तुम्हारे अपराध के लिए क्षमा नहीं करूंगा कायरो की भांति मरना चाहते हो तो ऐसा कहो यदि क्षत्रिय की भांती मरना चाहते हो तो शस्त्र उठाओ उठा शस्त्र यह तो आप अच्छी तरह जानते हैं युवराज कि मैं कायर नहीं हूं [संगीत] जय माता भवानी [संगीत] [संगीत] [संगीत] सावधान आ [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] ह हा [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत] है [संगीत] य क्या पाल मैं जीवित नहीं रहना चाहता क्यों नहीं रहना चाहते हो जीवित तुम क्या तुम यह सोच रहे हो कि मैं लौटकर तुम्हारी सहायता के लिए नहीं आया था यह तो मैं कभी सोच भी नहीं सकता हूं मित्र परंतु इस के कारण जो मेरा पान हुआ है उसके उपरांत तो मुझे जीवित रहने का अधिकार ही नहीं है जानते हो यह मेरी सहायता के लिए मेरी रसिया कटवाने के लिए किसे लेकर आया था भीम और अर्जुन को लेकर आया था मेरे शत्रुओं को लेकर आया था ये इस अपमान के साथ मैं जीवित नहीं रह सकता नहीं रह सकता परंतु अपमान हुआ कहां यदि भीम और अर्जुन ने तुम्हारी सहायता की तो यह उनका कर्तव्य था कर्तव्य अवश्य अपने राजा या युवराज की सहायता करना प्रजा का कर्तव्य तो है ही तो यदि उन दोनों ने तुम्हारी सहायता की तो ऐसा करके उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन किया है इसलिए अपमान का तो प्रश्न ही नहीं उठता और आज तुम मेरी एक बात पूरे ध्यान से सुन लो मित्र आत्महत्या केवल कायर किया करते हैं और तुम कायर नहीं हो महावीर हो तुम महारथ हो तुम आत्महत्या तो पांडव भी नहीं करेंगे क्योंकि वे भी कायर नहीं है इसलिए एक ना एक दिन किसी ना किसी रण भूम में हमारा और उनका सामना अवश्य होगा मैं तो जी ही रहा हूं उस दिन की प्रतीक्षा में क्योंकि उसी दिन द्रोणाचार्य को यह पता चलेगा कि सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर उनका प्रिय शिष्य अर्जुन नहीं है सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है यह सूत पुत्र [संगीत] प्रणाम ता श्री आयुष मान भाव प्रणाम आचार्य आयुष्मान भावा विराज क्या आपके साथ आचार्य के आने का अर्थ यह है तास जी कि विषय बहुत गंभीर है कोई विषय गंभीर नहीं होता महाराज परिस्थिति गंभीर होती है और यदि परिस्थिति यह हो कि गंधर्व की एक टोली हस्तिनापुर के युवराज को बंदी बना ले तो हस्तिनापुर के भविष्य का विषय बहुत गंभीर हो जाता है महाराज पितामह यदि भेड़ों का कोई गल्ला किसी सोए हुए सिं को पल भर के लिए विवश कर भी ले तब भी सिंह सिंह ही रहता है क्या तुम सभ्यता का पहला अध्याय भी भूल गए हो वत्स कि बड़ों की सेवा में आते हैं तो पहले उन्हें प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लेते हैं क्षमा चाहता हूं प्रणाम पिता माह प्रणाम गुरुवर प्रणाम पिता श्री यह बड़ा अच्छा हुआ कि तुम आ गए पुत्र अभी अभी ता श्री और आचार्य तुम्हारे ही विषय में बात कर रहे थे महाराज मैं हस्तिनापुर के विषय में बात कर रहा था यदि मुझे अपने वत्स दुर्योधन के विषय में बात करनी होती तो मैंने अपने पुत्र धृतराष्ट्र को अपने कक्ष में बुलवा लिया होता मैं महाराज के पास युवराज के विषय में बात करने आया हूं मुझे भी यही सूचना मिली थी पितामह इसीलिए मैं स्वयं आ गया सूचना मिली थी सूचना युवराज को अपने और परायो के विषय में सूचना तो रखनी ही चाहिए ना पिता मा आप मुझ बड़े हैं इसलिए आप मेरे विषय में चिंतित रहते हैं और मैं आपसे छोटा हूं इसलिए मैं भी आपके विषय में चिंतित रहता हूं कृपया मुझे बताइए कि अब मैंने क्या किया है युवराज का गंधर्व के हाथ पड़ जाना राष्ट्र के लिए शुभ समाचार नहीं है और यह तो और भी चिंता की स्थिति है कि युवराज के परम मित्र अंगराज कण भी उनको छोड़कर भाग गए थे सूर्य की सौगंध यदि यह महाराज का कक्ष ना रहा होता और आप आचार्य ना होते तो मुझ पर भागने का आरोप लगाने के उपरांत आप एक और सांस लेने तक के लिए भी जीवित नहीं रहते अंगराज कण तुम अपनी सीमाओं का उल्लंघन मत करो यह मत भूलो कि तुम आचार्य द्रोण से बात कर रहे हो असहाय पांडु पुत्रों से नहीं मैं तुम्हारे एक एक शब्द का उत्तर अपने बाणों से दे सकता हूं क्रोधित ना होय आचार्य व अपने क्रोध की अग्नि पर अपनी लज्जा का पानी डालना सीखो अंगराज करण यही वीर पुरुष की पहचान है तुम भागे थे या नहीं भागे थे यह केवल तुम जानते हो किंतु अब यह इतिहास है जब गंधर्व ने दुर्योधन को विवश बनाया था तो वहां से तुम और दुशासन दोनों ही जा चुके थे यह कहां की वीरता है कहां की मित्रता है यह और तुम भी यह ना भूलो दुर्योधन यदि भी और अर्जुन वहा आ गए होते तो हस्तिनापुर के युवराज पद का स्थान रिक्त हो गया होता अर्जुन के तो नीर और भीम की गदा का आभार मानो वच और जाकर अपने भाइयों को मना कर वापस ले आओ इसी में तुम्हारी और हस्त नापुर की भलाई है व अंगराज कण निसंदेह वीर है परंतु अर्जुन फिर भी अर्जुन है हस्तिनापुर की छाती उसके बाणों को नहीं झेल सकती वत्स नहीं झेल सकती हस्तिनापुर की छाती और द्रोण शिष्य अर्जुन के वर्णों के बीच यह परशुराम शिष्य करण खड़ा होगा आदरणीय गंगापुत्र भीष्म तुमने अभी अर्जुन के बाणों का स्वाद नहीं चखा अंगराज आप आचार्य हैं आपको अहंकार शोभा नहीं देता परंतु यदि आप प्रदर्शनी चाहते हैं तो मैं महाराज के चरणों में राज मुकुट का ढेर लगा सकता हूं और इसके लिए मुझे दिव्यास्त्र की आवश्यकता भी नहीं है वीर युद्ध करते हैं आचार्य तपस्या नहीं करते [संगीत] प्रणाम आग ना बुझती द्वेश की बरसे मेघ महान भीष्म द्रोण दोनों [प्रशंसा] थके दे पाए नहीं ज्ञान महाभारत महा भारत महाभारत महाभारत [संगीत]
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