Sunday, 28 December 2025

दुर्योधन ने विदुर को पक्षपात करने से मना किया Mahabharat Best Scene B R Chopra Pen Bhakti

महाभारत काका श्री हस्तिनापुर नरेश के इतिहास से क्षमा मांगने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इतिहास वीरों महावीर का दास होता है यदि आप केवल महामंत्री होते तो पिता श्री के चरणों की सौगंध मैंने आपके शीश को आपकी गर्दन से य उखाड़ कर फेंक दिया होता जैसे को मालिक इसी वाटी कान चाही घास उखाड़ कर फेंक देता है परंतु आप जैसे भी है काका श्री है आप तो उस बिल्ली की भाती है जो उसी को पंजा मारती है जो उसे अपनी गोद में बैठाकर खाना खिलाता है आप ये ना समझ काका श्री कि हमें ये ज्ञान ही नहीं कि आपकी नीति ने सदैव हमारा ही विरोध किया है या तो आप पितामह द्रोणाचार्य कृपाचार्य की भांति चुपचाप अपने स्थान पर बैठ जाइए नहीं तो फिर इस सभा से निकल जाइए यदि तुम मान और अपमान का जानते होते दुर्योधन तो बीच में बोलकर अपने पिता श्री का य अपमान करते यह सभा अभी तक महाराज राष्ट्र की है और यना तुह किसी को निकालने का अधिकार है और ना य इस सभा में किसी को बुलाने का महाराज इस सभा में विनाश का नाग फन काे बैठा हुआ है उसे रिए मत अपने परिवार पर दया कीजिए महाराज दया कीजिए और इस विनाश के नाग को इस सभा से निकल ने का मार्ग दीजिए दूत क्रीड़ा की समाप्ति की घोषणा कीजिए महाराज दूत क्रीड़ा की समाप्ति की घोषणा कीजिए काका श्री दूत का निमंत्रण मैंने भेजा था और उसकी समाप्ति की घोषणा केवल मैं ही कर सकता हूं केवल मैं [संगीत] भ्राता श्री लगाते हैं द्रौपदी को दौ पर लगाते हैं द्रोपदी को द पर बोलो प्रिय युधिष्ठिर उठाओ पासे मामा भाजे मुझे द्रौपदी चाहिए अवश्य भाजी मेरे पास से मेरा आदेश अवश्य मानेंगे भाजे मावा श्री मुझे नौ की आवश्यकता है अवश्य पुत्र दुर्योधन न अवश का हां बस एक बार और मेरे पास [संगीत] हो ना महारानी द्रौपदी भी तुम्हारी दासी पुत्र दुर्योधन द्रौपदी आज से मेरी दासी है युधिष्ठिर [हंसी] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] काका श्री जाइए और जाकर उस द्रौपदी को यहां लेकर आइए आज से आज से वो मेरी दासी है दासी और उसका स्थान राज भवन में नहीं वो मेरी दूसरी दसियों के साथ रहेगी मूर्ख यमराज को आमंत्रित ना कर महामंत्री विदुर तुमने मेरा आदेश ना मानकर अच्छा नहीं किया [संगीत] द्वारपाल आज्ञ युवराज जाओ और जाकर उस द्रौपदी को यहां लेकर आओ जो आज्ञ युवराज [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] महारानी की जय हो आओ द्यूत क्रीड़ा गृह का द्वारपाल आया है और आपके दर्शन की आज्ञा चाहता है उसे द्वार के सामने [संगीत] लाओ महारानी की जय हो बोलो द्वारपाल महारानी जो शब्द लेकर मैं भेजा गया हूं उनको कहते मेरी जीभ डल रही है तुम्हें ऐसे शब्द लेकर किसने भेजा है युवराज दुर्योधन ने तुम्हें देवर जी ने भेजा है और वह भी असभ्य शब्दों के साथ तो व असभ्य शब्द बोलो द्वारपाल तुम तो इस समय युवराज का कंठ हो बोलो द्वारपाल क्या हस्तिनापुर के द्वारपाल अपने महाराज की पुत्रवधू के आदेश का पालन नहीं करते बोलो क्या कलवा है युवराज ने त कीड़ा में महाराज युधिष्ठिर अपना राज मुकुट हार गए हैं महारानी जी क्या महाराज अपना राज्य हार [संगीत] गए लगता है तुम्हें कुछ और कहना है वो भी कह डालो महाराज अपने अपने चारों भाइयों को भी हार गए हैं मां नहीं द्वारपाल तुमसे अवश्य सुनने में कोई भूल ही होगी भाई की गिनती संपत्ति में थोड़ी होती है कि महाराज उन्हे भी हार गए वो तो आपको आपको भी हार गए [संगीत] महाली लगता है तुम्हारे अस श अभी तक समाप्त नहीं हुए रो मत द्वारपाल वो भी कह डालो युवराज ने आपको दूत कया ग्रह में आने का आदेश दिया आदेश क्या मैं उनकी दासी हूं कि वो मुझे आदश देने लगे और य पुत्र तो धर्मराज है अपनी पत्नी को तो कोई अधर्मी भी दाव पर नहीं लगा सकता क्या वो मदीना पीकर खेल रहे थे नहीं बहुरानी उन्होंने मदरा नहीं पी है वह अपने भाइयों को और मुझे जानते बुझते हार गए तो वही लौट जाओ और मुझे हार जाने वाले उस जुवारी से यह पूछो कि वह पहले अपने आप को हारा था या मुझे इस प्रश्न का उत्तर जाने बिना मैं व नहीं चल सकती मेरे प्रश्न का उत्तर लेकर आओ और मुझे ले चलो जो आ गया बहुरानी जो आ [संगीत] गया राजपाट सब हार कर रे भाई चार दास बने दासी [संगीत] बनी पांचाली स नार जुआ बुरा है खेलना करे बुद्धि का ना [संगीत] धर्मराज का धर्म भी बंधा जुए के पास महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत महा रा

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