[संगीत] महाभारत मित्र दुर्योधन मैं पूछता हूं मामा शी को इतना आनंद दिलाने की क्या आवश्यकता थी ऐसा लग रहा था कि जैसे वे शुभ समाचार की सदा सही बाट निहा रहे हो कि युधिष्ठिर के राज से यज्ञ का माचा सुनते ही फ नंगे पांव इंद्र पस दौड़ जाए परंतु तुम ये पूछ किससे रहे हो कंधार नरेश तो यहां है नहीं और मैं उनकी ओर से उत्तर नहीं दे सकता क्योंकि मुझे तो सदैव से उनकी सोच टेढ़ी लगती है मामा तो मामा यहां तो पिता श्री का आनंद भी भरी हुई गागर से पानी की भांती छलका पड़ रहा था उनका आनंद बनावटी नहीं था तो क्या मामा श्री का आनंद बनावटी था उनकी झोली में बनावट और हलाहल के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं मित्र यह ग कविता किसके लिए है अंगराज यदि जीना चाहते हो तो बनावट सीखो अंगराज करण बनावट जरा संत वत के उपरांत सारा भारतवर्ष पांडवों से भयभीत है परंतु यह कभी नहीं भूला जाना चाहिए कि शकुनी के तुनीर में अभी भी बहुत सारे अचूक मान है और तुम भांजे दुर्योधन तुम यदि तुम में इतनी भी समझ नहीं तो अपनों से बड़ों की समझ से लाभ उठाओ लाभ यदि पांडवों ने रा यज्ञ कर लिया और तुम यहां मुंह लटकाए बैठे रहे तो सारा देश य कहेगा कि दुर्योधन का हृदय बहुत छोटा है और वैसे भी उन्होंने खांड प्रस्थ को स्वर्ग बनाकर सारे जन समुदाय का हृदय जीत दिया है तो क्या तुम चाहते हो कि वो हस्तिनापुर को भी ट ले मामा श्री हस्तिनापुर कोई खीर की थाली नहीं है मामा श्री कि वे आएंगे और चट जाएंगे काव्य और राजनीति में यही अंतर है अंगराज यही अंतर है राजनीति में उपमा के लिए कोई स्थान नहीं जो है सो है जो नहीं है सो नहीं है मैं तो कहता हूं तुम यदि यह दोष ना होता अंगराज कर्ण तो तुम बड़े उपयोगी व्यक्ति होते तुम बोलते बहुत अधिक हो परंतु सुनते कुछ नहीं बिल्ली की तरह अपने पतल को छिपाए रखना सीखो अंगराज कर्ण और मेरे विचार में यदि तुम्हें वहां आमंत्रित किया गया है तो तुम्हें वहां अवश्य चलना चाहिए और यदि तुम्हारी गांठ में मुस्कान नहीं कर्ण तो मुझसे ले जाओ और जीवन का यह नियम सदा याद रखो कि जलो अवश्य परंतु जिससे जलो उससे अपनी जलन का आभास बिल्कुल ना होने दो यही शकुनी नीति है और यह नीति यदि तुम अपनाओ ग तो रातों को चैन से सो सकोगे महाभारत महाभारत भार महा भार हो महा भार [संगीत]
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