महाभारत महाराज यही से गए सरोवर में प्रणाम [संगीत] [संगीत] महाराज [संगीत] मैं विजय के इस पल में एक अनूठे आनंद के साथ साथ एक निर्दय उदासी का अनुभव भी कर रहा हूं यह भला कौन सोच सकता था कि जिस शक्तिशाली सेना में पिता मा भीष्म गुरु और द्रोणाचार्य कुल गुरु कृपाचार्य गुरु पुत्र अश्वथामा महावीर जेष्ठ प्रता कण कृतवर्मा गंधा नरेश मद्र नरेश और स्वयं अनुज दुर्योधन जैसे महावीर थे उस सेना का अंत इस सरोवर के किनारे यूं अकेला और असहाय खड़ा दिखाई देगा नहीं बड़े भैया नहीं जब तक दुर्योधन जीवित है तब तक आप विजय से उतनी ही दूर है जितनी दूर इस युद्ध के आरंभ के दिन थे इसलिए अपने हृदय को पिघलने ना दीजिए बड़े भैया और उन वीरों को याद करके अपनी आंखों में आंसू भी ना आने दीजिए जो इस रणभूमि में वीर गति को प्राप्त हुए हैं विजय अंतिम लक्ष्य नहीं है बड़े भैया अंतिम लक्ष्य है एक स्वस्थ उज्जवल और नवीन समाज की स्थापना और यही धर्म है हे नरेश अपने कर्म का हाथ पकड़कर धर्म की उस चर्म सीमा की ओर बढ़ वहां तक पहुंचना महत्वपूर्ण नहीं है बड़े भैया महत्व है यात्रा की दिशा का यदि दिशा ठीक है तो कोई ना कोई पीढ़ी धर्म की उस चर्म रेखा तक अवश्य पहुंच ही जाएगी पांडव उस झील के तट पर क्या कर रहे हैं कुलगुरु कदाच दुर्योधन उसी सरोवर में छिपा हुआ है दुर्योधन जैसे महावीर के लिए छिपने जैसे हीन शब्द का प्रयोग ना करें मामा श्री वह भयभीत होकर छिप नहीं सकता क्योंकि जो वीर होते हैं वह मृत्यु के साथ आंख में चोली नहीं खेलते वे दो पग आगे बढ़कर मृत्यु के हाथों वरमाला स्वीकार करते हैं और यह युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है वहां पांच पांडव है तो हम चार भी यहां है यदि दुर्योधन उस सरोवर में है तब तो निसंदेह हम उसकी सहायता के लिए चलना चाहिए नहीं ऐसा करके हम उसके आत्म सम्मान को घायल नहीं कर सकते और वह भी एक ऐसी घड़ी में जब वह अपने जीवन का अंतिम युद्ध करने जा रहा है हे कृतवर्मा दुर्योधन जैसे योद्धा हर युग में जन्म नहीं लेते हां यदि पांडव ने काता दिखलाई और वे सब के सब उस पर टूट पड़े तो हम अवश्य अपने राजा अपने प्रधान सेनापति की सहायता के लिए युद्ध की चिता में कूद पड़ेंगे अश्वथामा ठीक कह र है कमा यही रुक कर दुर्योधन जानता है कि हम तीनों जीवित है यदि उसे हमारी सहायता की आवश्यकता होगी तो अवश्य पुकारेगा हे मधुसूदन दुर्योधन ने अपनी माया से सरोवर के चल को स्थिर कर दिया है आख तक ने ठीक ही कहा था व यही विश्राम कर रहा है महादेव की सौगंध यदि आज उसकी सहायता के लिए स्वयं इंद्र भी अपना व लेकर आ जाए तो मैं उन्हे भी देख लूंगा अरे अरे बड़े भैया इंद्र ने आपका क्या बिगाड़ा है उन्होंने तो इस धर्म युद्ध में आपकी सहायता ही की है यदि अंगराज कण से उनका कवच और कुंडल वह भिक्षा में मांगकर ना ले गए होते तो अंगराज करण का वाधा संभव था और यदि अंगराज करण वीर गति को प्राप्त ना हुए होते बड़े भैया तो आज यह क्षण भी ना आया होता कि घायल थका हुआ अकेला असहाय दुर्योधन सरोवर में बैठा आपकी प्रतीक्षा कर रहा है दुर्योधन को गिराए बड़े भैया इस दुर्योधन को गिराए जो अन्याय अधर्म और अंधकार के दुर्ग की सबसे बड़ी और दृढ़ और विशाल दीवार है हे अनुज [संगीत] दुर्योधन तुम ने शांति के सारे द्वार बंद किए थे तुम्हारे ही कारण पितावा की सया पर है तुम्हारे ही कारण परशुराम शिष्य द्रोण का स्थान रिक्त है तुम्हारे ही कारण जेष्ठ माता श्री के 9 पुत्र वीर गति को प्राप्त हो चुके हैं तो तुम वीरों की भाति इस युद्ध का अंतिम स्वागत करने के लिए आगे क्यों नहीं बढ़ते यह ना सोचो कि हम पानी के उस बुलबुले को तोड़ नहीं सकते जिसके भीतर तुम अपने आप को सुरक्षित समझ रहे हो हे महारथी या तो पराजय स्वीकार करो या सरोवर से निकल कर युद्ध करो हे दुर्योधन तुमने भरत वंश में जन्म लिया है मृत्यु से भागकर उसका अपमान ना करो यदि राज्य चाहिए तब भी सरोवर से निकलकर या तो युद्ध करो या अपने इस जेष्ठ भता से राज्य मांग लो जेष्ठ भ्राता के सामने हाथ फैलाने से अपमान नहीं होता अनुज अधिकार सिद्ध होता है हे दुर्योधन जन से कोई क्षत्रिय नहीं होता क्षत्रिय तो केवल वो है जो अपने कर्म द्वारा यह सिद्ध कर सके कि वो क्षत्रिय है हे युर तुम यह ना समझो कि मैं अनजाने पिता के पांच पुत्रों के भय के कारण य आकर छिप गया हूं तुम भाइयों ने इस रणभूमि में अपनी काता का ही प्रदर्शन किया है तुमने पिता भीष्म को कपट से ल तुमने आजार द्रोण को ल से मारा तुमने मेरे भाई की छाती का लहू पीकर यह सिद्ध किया कि तुम तो मानव जाति के हो ही नहीं और तुमने मेरे मित्र करण को कपड़ से मारा हे पांडवों तुम तो वीर कहलाने के योग्य नहीं हो अरे कायरो तुम तो माता कुंती की को कान हो तुम सब के प्रति घणा की ताप से मेरा अंग अंग जल रहा है और इसी अग्नि को ठंडा करने के लिए मैं जल में उतर आया था हे कौते अब यह युद्ध केवल युद्ध के लिए होगा यदि मैं वीर गति को प्राप्त हुआ तब तो तुम्हारी विजय हो ही जाएगी किंतु यदि मैं विजय हुआ तब भी मुझे हस्तिनापुर का सिंहासन नहीं चाहिए अब मैं हस्तिनापुर का सिंहासन लेकर क्या करूंगा जो मुझे सिंहासन पर बैठा देखकर प्रसन्न होते वे सब तो जा चुके हैं मेरे सारे भाई मेरा मित्र राधे मेरे मामा श्री सबके सब जा चुके हैं अब मुझे यह राज्य नहीं चाहिए युधिष्ठिर मैं इसे जीतने के उपरांत भी तुम्ह दे दूंगा किंतु मैं तुम पांचों भाइयों से युद्ध अवश्य करूंगा युधिस्टर क्योंकि यह सिद्ध करना मेरा परम कर्तव्य है के सर्वश्रेष्ठ वीर मैं हूं तुम नहीं दन यह तुम नहीं बोल रहे हो दुर्योधन य तुम्हारी पराजय बोल रही है जो राज्य तुम हम देने की बात कर रहे हो वो ना कभी तुम्हारा था ना तुम्हारा है तुम अब भोगी थे हमने अपना राज तुमसे छीन लिया है तुम्हारे पास देने के लिए अपने प्राणों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है दुर्योधन कुछ नहीं है अपनी जीवों में गाठ डाल अर्जुन मुझे अकेला ना समझ मैं स्वयं नारायणी सेना से कहीं अधिक एक सशक्त सेना [संगीत] तुम लोग तो सचमुच कायर हो तुम सब के सब अस्त्र शस्त्र से लेस हो और मैं निहत्था हूं घायल हूं और थका हुआ हूं अपने 99 भाइयों के शव उठा चुका हूं राधे जैसे मित्र का दाह संस्कार कर चुका हूं गुरु द्रोण का शव उठा चुका हूं मामा श्री शकुनी का शव उठा चुका हूं इतने आदरणीय और प्रिय शव उठाकर मेरे कंधे टूट चुके हैं परंतु है वासुदेव अपने महारथियों से कहो कि मैं भयभीत नहीं हूं मेरा अभिमन्यु भी अकेला था दुर्योधन मेरा अभिमन्यु भी निहत्था था मेरा अभिमन्यु भी ल था मेरा अभिम भी थका हुआ था हा परंतु युद्ध के आरंभ में नहीं वार्तालाप में समय नष्ट कीजिए श्री मुझे यह बताइए क्या आप सब कायर से एक साथ युद्ध करेंगे या अलग अलग हे अनुज मैं यह जानकर अति प्रसन्न हुआ कि तुम कैर नहीं हो हे अनुज तुम सचमुच दुर्योधन हो हे कुरष रमण तुम हम पांचों से एक साथ भी युद्ध कर सकते हो किंतु मैं ऐसा नहीं होने दूंगा तुम हम पांचों में से किसी एक को चुन लो और मैं तुम्हें वचन देता हूं कि यदि तुमने उसे परास्त कर दिया तो मैं पराजय स्वीकार कर लूंगा हे अनुज तुम अपने लिए शस्त्र भी चुन लो और प्रतिद्वंदी भी हे जेष्ठ भ्राता श्री आप वास्तव में उतने अकुशल नहीं जितना मैं समझा करता था मैं गदा युद्ध करूंगा किस से मारना तो मुझे तुम पांचों भाइयों को ही है जो पहले मरना चाहे वो सामने आ [संगीत] जाए कोई वचन देने से पहले सोच लेना चाहिए था आप में से कोई भी दुर्योधन को गदा युद्ध में हरा नहीं सकता मजले भैया भी नहीं अपने हाथ में आई हुई विजय पुरस्कार की भाति दुर्योधन को दे दी अब तो मैंने वचन दे दिया है वासुदेव महादेव भी यही करते हैं और उनके वरदान को संभालने के लिए क्याक करना पड़ता है यह कोई नहीं जानता किंतु मैं महादेव नहीं हूं वासुदेव मैं इस दुर्योधन को मार मार के वीर गति की प्राप्ति के मार्ग की ओर भेज दूंगा यदि अकेले युद्ध करने का साहस ना हो रहा हो भ्राता श्री तो पांचों आ जाइए और यदि जी चाहे तो अर्जुन के सारथी यशोदा नंदन को भी ले आइए आ जाओ हट जा अनुज महा भारत महा भारत महाभारत महाभारत हो महा भार
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