महाभारत इस प्रश्न का उत्तर तो आपको कभी ना कभी स्वयं को देना ही पड़ेगा रे पुत्र कि आपने अपनी पुत्र वधु द्रौपदी और कुरुवंश का इतना बड़ा अपमान कैसे हो जाने दिया जब तक आप स्वयं अपने आप को इस प्रश्न का उत्तर नहीं द तब तक नींद आपकी आंखों से दूर भागती रहेगी आरे पुत्र कदाचित उन क्षणों के लिए मेरी आत्मा भी नेत्रहीन हो गई थी [संगीत] गांधारी या मैं कदाच दुर्योधन से डर गया था आज पहली बार अपनी नेत हीनता पर मैं एक प्रकार का आनंद अनुभव कर रहा हूं कि मैं तो अपनी पुत्र वधु को देख ही नहीं सकता यदि देख सकता होता तो कैसे देखता उसकी उन आंखों में जिनम मेरे लिए घृणा के अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं सकता [संगीत] कौन महाराज की जय हो श्री गंगा पुत्र भीष्म और युवराज दुर्योधन पधार रहे हैं ता श्री दुर्योधन के साथ क्यों आ रहे हैं कंधारी यह तो वे स्वयं ही बताएंगे आर्यपुत्र [संगीत] [प्रशंसा] प्रणाम ता श्री आयुष्मान भवा प्रणाम ता श्री सौभाग्यवती भवा राजिए किंतु आपने स्वयं यहां आने का कष्ट क्यों किया था श्री मुझे बुलवा लिया होता मैं अपने पुत्र धृतराष्ट्र के य नहीं आया हूं मैं अपने महाराज के यहां आया हूं तुम्हें जो कुछ कहना है कह दो दुर्योधन पिता श्री जिस तरह दो बाग एक वन में नहीं रह सकते उसी तरह कुरु और पांडव भी एक ही क्षेत्र में नहीं रह सकते यह तुम क्या कह रहे हो पुत्र वह तुम्हारे भाई है मानव इतिहास में हम पहले ऐसे भाई नहीं है माता श्री जो इकट्ठे नहीं रह सकते और वे चाहे तो मेरे साथ रह भी ले परंतु मैं उनके साथ नहीं रह सकता पिता श्री ने राज्य का विभाजन करके भी देख लिया और उस विभाजन ने मेरे हृदय की अग्नि को ठंडा नहीं किया बल्कि और भड़का दिया है माता श्री और भड़का दिया है और अब जब दीप में मैंने व सब कुछ जीत लिया था जो मैं चाहता था तो पिता श्री ने मेरे साथ अन्याय करके उन्ह सब कुछ लौटा दिया यह मैं कभी सहन नहीं कर सकता माता श्री ता श्री आप ही इसे समझाइए यह जानता ही नहीं कि यह क्या कह रहा है पिता इस बीच में नहीं बोलेंगे माता [संगीत] श्री कृपया आप मेरी बात ध्यान से सुनिए मेरे पास केवल दो विकल्प है या तो मैं इंद्र प्रस्थ पर आक्रमण करके उसे जीत लू या उसे जीतने के लिए युद्ध करता हुआ रणभूमि में मारा जाऊ या फिर [संगीत] चौसर का खेल एक बार और हो जाए यदि वे जीते तो 12 बरस का बनवास और 13 बरस का ज्ञात वास मैं स्वीकार करूंगा और यदि मैं जीता तो वे 12 बरस का बनवास और 13 वरस का अज्ञातवास स्वीकार करेंगे और यदि उस अज्ञातवास में पहचान लिए जाए तो फिर से 12 बरस का बनवास और 1 बरस का ज्ञात वास वे स्वीकार करेंगे किंतु पुत्र आप मेरी बात समझने का प्रयत्न क्यों नहीं कर रही माता श्री मुझे सोते जागते उठते बैठते चारों और अर्जुन ही अर्जुन दिखाई देता है मुझे अक्षर से घणा हो गई है क्योंकि यह अर्जुन के नाम का पहला अक्षर है और यह संसार हम दोनों के लिए बहुत छोटा है पिता श्री और हम दोनों संसार में नहीं रह सकते नहीं रह सकते क्या कोई तीसरा विकल्प नहीं पुत्र है माता श्री तीसरा विकल्प ही है मैं आत्महत्या कर लूं और यह विकल्प मैंने आप लोगों को इसलिए नहीं बताया क्योंकि कदाचित आप इस विकल्प को स्वीकार नहीं करते तो पिता श्री या तो आप मुझे युद्ध की आज्ञा दीजिए या दत की ी मेरे लिए तो दोनों ही विकल्प स्वीकारी है मैं युद्ध की आज्ञा तो नहीं दे सकता महाराज मैं अपने पुत्र को आत्महत्या करने की आज्ञा भी तो नहीं दे सकता नाता श्री क्या महाराज को पुत्र मोह ने इतना वव कर दिया है कि वह राजनीति और राज धर्म के सारे अध्याय भूल गए हैं आप यह बात केवल इसलिए कह पाए हैं ता श्री कि आपको पुत्र मोह का अनुभव ही नहीं है पेड़ अपने फल के लिए जीता है और पिता केवल अपने पुत्र के लिए मैं इस समय पिता के पास नहीं आया हूं अपने राजा के पास आया हूं यदि दो ही विकल्प सामने हो युद्ध और दध तो राजा को युद्ध का चुनाव करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय का धर्म यही है पुत्र दुर्योधन तुम गायर नहीं हो महावीर हो और मैं तुम्हारे साथ हूं और आचार्य द्रोण अंगराज कण और आचार्य पुत्र अश्वथामा भी तुम्हारे साथ है भूल जाओ दूत को और बजाओ शंख युद्ध का नहीं नहीं मैं युद्ध की आज्ञा नहीं दूंगा पुत्र दुर्योधन बस एक दाम और लगेगा मुझे वतन दो की बस एक गाव और लगेगा आर पुत्र भरत वंश के विनाश को आमंत्रित ना कीजिए पांडु पुत्रों और अपने पुत्रों के बीच हमने जो सेतु बनाया है उसे ना तोड़िए क्योंकि उस सेतु के नीचे अंधकार का अ सागर है यदि यह भरत वंश अपने सर्वनाश के मार्ग पर चल पड़ा है गांधारी तो हमारे रोके य यात्रा नहीं रुकेगी [संगीत] कदाचित इस वंश के भाग्य में यही लिखा [संगीत] है अपने पुत्र मोह के लिए विधाता को उत्तरदाई ना ठहराए महाराज यदि भरत वंश सर्वनाश के मार्ग पर चल पड़ा है तो उसने अपनी यात्रा विधाता के नहीं आपके नेतृत्व में शुरू की है महाराज आपके नेतृत्व में [संगीत] आभार आभार महाभारत महाभारत हो महाभारत
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