[संगीत] [संगीत] प्रणाम प्रणाम विष्णुदेव कल्याण हमारी र हम सब की रक्षा कीजिए प्रभु मैं ऋषि दुर्वासा आपको श्राप देता हूं इस ष्टता के दंड स्वरूप आप श्री हीन हो [संगीत] जाएंगे मुझे आपकी चिंता का कारण ज्ञात है परंतु इसका निदान स्वयं श्री लक्ष्मी जी के देवलोक में पुनरागमन से ही संभव है तभी आप अपने संपूर्ण ऐश्वर्य वैभव और शक्तियों को प्राप्त करेंगे परंतु यह कैसे संभव होगा हमारा मार्गदर्शन कीजिए प्रभु देव राजेंद्र इसका एकमात्र उपाय है ीर सागर का मंथन जिससे आप अनेक दिव्य एवं बहुमूल्य निधियों के साथ अमृत भी प्राप्त करेंगे आप अमरत्व के भागी होंगे हे प्रभु आपके आदेश का पालन हम सभी देवताओं के लिए परम कर्तव्य है देवलोक पर छाय संकटों के बादलों से उसे मुक्ति दिलाने के लिए हम हर संभव प्रयास करने के लिए तत्पर है परंतु प्रभु शीर सागर का मंथन कैसे होगा क्षीर सागर का मंथन इतना सहज नहीं है देवराजन उसके लिए आप देवताओं की उपस्थिति पर्याप्त नहीं इसमें असुरों और दैत्यों का सहयोग भी [संगीत] चाहिए परंतु माता असुरों का सहयोग यो तो और भी भयंकर है उससे तो सब शुभ कार्य अशुभ बन जाते हैं और व तो देवताओं के चिर शत्रु हैं वो देवताओं की सहायता क्यों करते भला ऐसे ही अनेक प्रश्न भी देवताओं के हृदय में भी थे वह भी प्रभु वचनों से चकित थे परंतु प्रभु का आदेश था इस कार्य सिद्धि के लिए असुरों की सहायता अनिवार्य थी इसीलिए देवताओं ने असुरों से संधि कर ली और सागर मंथन से प्राप्त होने वाली निधियों का बंटवारा करने का प्रण भी लिया तो माता क्या असुरों ने देवताओं के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया हां पुत्र असुर सागर मंथन के लिए प्रस्तुत तो हो गए परंतु उन्होंने पूर्व में ही देवताओं से अमृत हरने की योजना गठित कर ली [संगीत] थी इसका अर्थ है माता उन्होंने अपने आसुरी स्वभाव के अनुसार उस महामंथन में भाग लेने के पूर्व ही महा षड्यंत्र भी रच लिया था पुत्र शत्रु मित्र और सहभागी को तो कोई भी छल सकता है परंतु कण कण में व्याप्त सर्वव्यापी सर्व ज्ञाता प्रभु को लने की सामर्थ्य भला किसमें है प्रभु को असुरों के इस योजना का ज्ञान था परंतु प्रभु की सभी लीलाओं में कोई गुण अर्थ एवं उद्देश्य निहित होता है जिसका रहस्य उचित समय पर ही उजागर होता है परंतु दुग्ध के समान उज्जवल विशाल चीर सागर का दोहन कैसे हो यह विचार कर अति विशाल मंदराचल पर्वत को भी आमंत्रित किया गया कि वह इस मंथन में मथनी बने और नागराज वासु की डोर बने जिससे सागर मंथन संभव [संगीत] हो परंतु माता नागराज वासुकी के शीष की ओर से उन्हें पकड़ना तो [संगीत] [संगीत] संकटमोचक के शीर्ष की ओर स्थित होने से मंथन प्रक्रिया में नागराज के मुख से प्रवाहित भीषण विष देवताओं को आहात कर देता परंतु उन्हें ज्ञात था कि सरल आग्रह से असुर नागराज के मुख की ओर रहने के लिए कदा भी सहमत नहीं होंगे माता इस संकट का समाधान कैसे किया देवताओं ने शीघ्र बताइए माता क्या हुआ प्रभु विष्णु जी के सुझाव पर देवताओं ने असुरों से कहा कि श्रेष्ठता के अनुसार उन्हें नागराज के मुख की ओर रहने का अधिकार है असुरों ने इसे अपना अपमान माना और हट करने लगे कि यदि यह उन्हें यह अधिकार नहीं मिला तो वे सागर मंथन में भाग नहीं लेंगे यही तो देवता चाहते थे देखा हमारी विजय हुई डागरा वासुकी का मुख हमारी ओर ही आया इसीलिए कहते हैं शक्ति के साथ बुद्धि का होना आवश्यक होता है क्योंकि बुद्धि बल पर सदैव भारी पड़ती है परंतु माता यह सब नियत होने के पश्चात क्या हुआ फिर वो दृश्य उत्पन्न हुआ जिसका शब्दों में वर्णन असंभव है देवताओं और असुरों ने मिलकर शीर सागर का मंथन प्रारंभ किया महातम बली की जय महातम बली की जय महानतम बली [संगीत] की हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि नारायण हरि मंथन आरंभ करो [प्रशंसा] और हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण ह हरि ओम नारायण हरि रायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओ [संगीत] [संगीत] फली [संगीत] लगा और बन लगा सागर मंतन के लिए ये किस पर्वत का चुनाव किया है देवताओं ने कोई और सल परवत लाना चाहिए था जो जल में भी स्थिरता से रह पाता दिव्य मंत्रा चल पर्वत की सामर्थ्य पर संदेह उचित नहीं है बल [प्रशंसा] लगा क्योंकि हमने इसीर सागर के अ जल में उन्ह स्थित करने के लिए कोई ठोस आधार नहीं दिया हमारा शम और समय वर्थ करने से पूर्व सोच विचार करना चाहिए था देवता पर दोष हमारा ही है इन देवों पर विश्वास करकर हमने घोर भूल की है ह नारायण ह हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण हरिय हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण ह हरि ओम नारायण हरि ये मंदराचल पर्वत तो खीर सागर में सता जा रहा है हरि ओम नारायण हरि [संगीत] नाराय माता यह तो घोर अनर्थ का संकेत था परंतु माता प्रभु विष्णु जी की इसमें क्या भूमिका थी उन्होंने कोर्म अवतार क्यों धारण किया हनुमान मंथन प्रारंभ होने पर विशाल मेरु पर्वत शीर सागर के अतल जल में समाने लगा तब प्रभु विष्णु जी ने कुर्म रूप लेकर उस पर्वत को अपनी पीठ पर टिका करर सागर मन थन को संभव बनाया उस समय देवताओं की सहायता के लिए स्वयं प्रभु विष्णु जी ने कुर्म अवतार धारण किया ना हां पुत्र मंत्रा चल पर्वत के साथ समस्त देवता भी जल में खींचे जा रहे थे उन पर घोर संकट छाया था तब उन्होंने एक स्वर में भगवान विष्णु की स्तुति आरंभ कर प्रभु का आवाहन किया अ ज माया निर्वाण सुवा महानुभवा नमो नमस्ते अ ज निर्वाण सुवा महानुभवा नमो नमस्ते रू [संगीत] शयो योग सलो प यजन आत ई मध्य आत यंत आसी माम तंत्रे र जगस मध्यम परमा यमा शयाम निर्मा विश्वम नु प्रविट प युक्ता मन [संगीत] था मनुष [संगीत] अय ना समन सना [संगीत] सर्वे [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] प्रणाम प्रभु नारायण प्रणाम प्रभु [संगीत] नारायण अत्यंत विचित्र बात है ये कच्छप पंछियों की भाती आकाश में विचरण कर रहा है परंतु देवता इसे देखकर इतने प्रसन्न क्यों हो रहे [संगीत] हैं देखो इस पर्वत की बाती इन देवताओं की पुन बल प्राप्ति की आशाए भी डूब रही है [संगीत] मूर्ख है ये देवता और उससे भी मूर्खता पूर्ण है इनकी ये योजना [संगीत] है हे चराचर जगत के स्वामी दिव्य कुर्म स्वरूप प्रभु नारायण मंदराचल पर्वत को जलमग्न होने से रोकिए हम समस्त देवता आपसे विनती करते हैं मंदर रसातल डूबत जाई देव असुर सब जल में समाई सूर तब हरि अरज लगाए कुर्म रूप धरी विष्णु आए भीम काय किए जब आकारा पाए मंदर चल आधारा जब ह जगत पर संकट आवे तब ह भगवंता ही बचावे चलो यहां से य हमें कोई सफलता प्राप्त नहीं होगी [संगीत] चलो [संगीत] चलो अ ओम श्री हरि नारायण ओम श्री हरि नारायण जय जय श्री प्रभु हरि नारायण श्री नारायण ओ श्री हरि [संगीत] नारायण ओम श्री हरि नारायण ओम श्री हरि नारायण जय जय श्री प्रभु हरिनारायण श्रीनारायण श्री हरिनारायण ओम नमो भगवते महाक माय नमः कितना अद्भुत दृश्य हुआ होगा ना तब मां स्वयं प्रभु विष्णु जी ने कुर्म अवतार धारण किया और मंदराचल पर्वत को अपनी पीठ पर टिका करर उन्हें डूबने से बचा लिया फिर क्या सागर मंथन सफलता पूर्वक पूर्ण हो पाया प्रभु विष्णु जी जब स्वयं सहायक हो तो कार्य सिद्ध होने से कौन रोक सकता है पुत्र मंदराचल पर्वत प्रभु का अवलंब पाकर स्थिर हो गया और मथनी के रूप में सागर मंथन का सर्वोत्तम साधन बने अच्छा माता तब तो सागर मंथन प्रारंभ होने के कुछ ही समय उपरांत अमृत भी प्राप्त हो गया होगा ना पुत्र हनुमान यह मंथन हमारे जीवन के विभिन्न पड़ाव में हमारे अंतर्मन में होने वाले मंथन के समान था अंतर्मन अर्थात हमारा मन हमारे मन में भी मंथन होता है माता हां पुत्र नागराज वासु की रूपी हमारी इच्छाएं सागर मंथन के देवताओं और दानवों के समान है हमारे मन में बसी अच्छाइयों और बुराइयों के बीच झूलती रहती है और मन की गहराई में छुपे अनेक विचारों और भावनाओं को ऊपर ले आती है सर्वप्रथम उत्पन्न अशुभ विचारों को त्यागने से हमारे मन में अमृत रूपी पवित्र विचार शेष रहते हैं जो हमें जीवन में आत्मिक शांति और परम संतोष देते हैं इसका अर्थ है सागर मंथन में सर्वप्रथम अशुभ एवं हानिकारक वस्तुएं प्रकट हुई हां इतनी भयंकर वस्तु पुत्र जो समस्त संसार का विनाश कर सकती [संगीत] है हरि ओम नारायण हरि हरि ओम नारायण [संगीत] हरि [संगीत] [संगीत] कठिन परिश्रम और प्रयत्न करने वाले को ही सच्ची सफलता प्राप्त होती है
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