[संगीत] [संगीत] आ [संगीत] [संगीत] हनुमान वाली भैया सुमेरू में स्वागत है [संगीत] आपका स्वागत करोगे तुम बाली का वाली भैया आप किसी बात से रोट है क्या वाली भैया पहले आपने अपना क्रोध मुझ पर निकाला और फिर सुग्रीव भैया से कुपित होकर यह स्तंभ तोड़ दिया क्या हो गया है आपको क्या चाहते हैं आप वाली भैया शक्ति और सामर्थ्य है मुझ में अधिपति चाहिए समस्त वानरों का किष्किंदा सुमेरू और पंपास का समस्त वन राज्यों का समस्त वनस का इस राज भवन का और सुमेरू के राज सिंहासन का अधि पतव बस वाली भैया इतनी सी बात के लिए इतना क्रोध यह सब जो है सब आपका ही तो है हम सब ने तो पहले ही आपको समस्त वन संघ का अधिपति चुन लि था वाली भैया से अधिक बलवान और कोई है ही नहीं जब वह अपनी तपस्या के पश्चात वरदान प्राप्त करके वापस लौटेंगे उन्हें ही उपाधि मिलनी चाहिए वही महानायक बनने के योग्य हैं माली भैया मैं आपको भैया कहता ही नहीं अपना बड़ा भैया मानता भी [संगीत] हूं जितना अधिकार मेरा इस सिंहासन पर है उतना अधिक आपका भी है वाली भैया जो हमारा है व सब आपका भी तो है यह क्या कह रहा है हनुमान जो आपका है सो हमारा है यदि आपकी इच्छा हो तो आप यह राज सिंहासन भी ले [संगीत] लीजिए मैंने उचित कहा ना पिताश्री [संगीत] सर्वथा तुमने उचित कहा हनुमान ऐसा भी हो सकता है यह तो सोचा ही [संगीत] [संगीत] नहीं वाली भैया यह राज सिंहासन ग्रहण कीजिए अब यह राज सिंहासन आपका है इतनी सरलता से सुमेरो का सिंहासन मुझे दिया जा रहा है कहीं इसमें कोई छल तो नहीं मुझ महानतम वाली से अब कौन छल करने का साहस कर सकता है भला यह तो वाली के भय के कारण हो रहा [संगीत] है ये क्या करने जा रहे हो महातम वाली महानतम वाली भिक्षा में दी हुई राज सिंहासन लेगा स्वयं आखेट करता है सियार जूठन खाते हैं तुम सियार कब से बन गए महानतम वाली िकार है तुम्हारी पड़ता पर तुम्हारे बाहुबल पर िकार है तुम पर महानतम वाली यार जूठन खाते हैं यार भिा यार जूठन िकार है िकार है [संगीत] भिक्षा नहीं चाहिए महानतम वाली को दान दया और भिक्षा यह सब दुर्बल के साधन होते हैं वीरों के नहीं महानतम वाली को दान नहीं तुम सबकी अधीनता चाहिए अब से अभी से सुमेरू राज्य मुझ महानतम वाली के अधीन होगा और जिसे भी यह अधीनता स्वीकार ना हो वो मुझसे युद्ध करने के लिए आमंत्रित है ली भैया हनुमान मुझ महानतम वाली को जो भी चाहिए उसे लेने से कोई नहीं रोक [संगीत] सकता [संगीत] [संगीत] [संगीत] पिता श्री हनुमान से कोई भूल हो गई या फिर हनुमान ने कुछ अनुचित कह दिया च वाली भैया रुष्ट होकर वापस चले गए नहीं हनुमान तुमसे कोई भूल नहीं हुई है हनुमान वाली भैया ही मार्ग से भटक गए राजकुमार सुग्रीव को महाराज वाली का कोई भय नहीं है वाली भैया मैं आपको भैया कहता ही नहीं अपना बड़ा भैया मानता भी हूं जितना अधिकार मेरा सिंहासन पर है उतना अधिकार आपका भी है जो हमारा है सो आपका भी है यदि आपकी इच्छा हो तो आप यह राज सिंहासन भी ले लीजिए मुझ महानतम वाली को भिक्षा देगा [संगीत] मर्कट नारायण नारायण देव नारायण नारायण इतना क्रोध वो भी इस निर्जीव शीला पर प्रतीत होता है जो पाने गए थे वो मिला नहीं सुमे सुमेरू को अपने अधीन कर लिया है मैंने और अब बहुत शीघ्र ही समस्त वन राज्यों को मैं अपने अधीन कर लूंगा समस्त वन राज्यों को अपने अधीन करना चाहते हैं वाली भैया सुग्रीव भैया मेरे पिताश्री ने मुझे सीख दी थी कि महत्वाकांक्षा ही जीवन में सफलता की प्रथम सीढ़ी है यदि वाली भैया महत्वकांक्षी है तो इसमें अनुचित क्या है महत्वकांक्षी होना अच्छा है हनुमान किंतु अपनी महत्वाकांक्षा पूर्ण करने के लिए अकारण अपनों से बैर ठान लेना अनुचित प्रकार से उन्हें पीड़ा देना सफलता के मार्ग पर नहीं अन्यथा पतन के मार्ग पर ले जाता है अच्छा अच्छा तो तुम उन्हें अपने अधीन करने गए थे फिर तो तुम्हें हनुमान की शक्तियां भी मिल गई होंगी उसकी शक्तियां प्राप्त करना ही तो उद्देश्य था मेरा देवशी परंतु ना जाने क्यों उस मर्कट के समक्ष आते ही मेरा वरदान निष्क्रिय हो जाता है वरदान भी निष्क्रिय हो जाते हैं जब मनुष्य की महत्वाकांक्षा उसकी बुद्धि को भ्रष्ट करके उसे अनुचित दिशा की ओर अग्रसर कर देती है बाली भी पतन के मार्ग पर चल निकला है हां महाराज सुमेरू की भाती ही अन्य राज्यों को भी अधीनता स्वीकार करने के लिए चेतावनी भरा संदेश भेज दिया है वाली भैया ने इस महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए बाली भैया ने पिता श्री को भी बंदी बनाकर रखा है आश्चर्य है देवराज इंद्र का दिया हुआ वरदान निष्क्रिय हो गया यही तो मुझे भी आश्चर्य है कि ऐसा कैसे हो गया था फिर कैसा वरदान अवश्य ही अपूर्ण वरदान दिया है उन्होंने तुम्हें कुछ सीमाओं के साथ इसीलिए हनुमान की शक्ति नहीं मिली [संगीत] तुम्हें किंतु ऐसा कैसे कर सकते हैं देवराज अब इसके पीछे क्या रहस्य है यह तो तुम्हें स्वयं देवराज इंद्र ही बता सकते हैं सीमाओं में बंधा हुआ वरदान अपूर्ण वरदान जैसे एक शिशु को पीड़ा के लिए वस्तु देता है पिता ऐसा ही कुछ तुम्हारे साथ हुआ है नारायण नारायण वो मुझ महानतम वाली के साथ ऐसा परिहास नहीं कर सकते ऐसा कैसे कर सकते हैं वाली भैया वाली भैया ने अपने ही पिताश्री को नहीं नहीं यह सत्य है हनुमान यह तो अनुचित है महाराज रिक्षा बंदी गृह में मुझे शीघ्र ही जाकर उन्हें मुक्त कराना होगा असंभव है यह हनुमान तुम इस प्रकरण से दूर ही रहो हां हनुमान मैं भी तुम्ह इस कार्य के लिए वहा जाने की अनुमति नहीं दे सकती यह आप क्या कह रही है यदि पिताश्री के साथ कभी ऐसा हुआ तो आप मुझे जाने से रोकें मैंने महाराज रक्ष को अपने पिता समान माना है और उन्हें बंदी गृह में रखा जाए नहीं उन्हें बंधन मुक्त कराना हनुमान का कर्तव्य है मां मुझे जाना ही होगा हां पुत्र हनुमान महाराज रिरा सदैव हमारे दुख एवं सुख में हमारे साथ ही रहे हैं खड़े रहे हैं आज तुम्हें उनकी सहायता के लिए अवश्य जाना चाहिए तुम उनका संकट हर सकते हो हनुमान किंतु अब यह सहज नहीं है महाराज आपके बंदी ग्रह से निकलने के पश्चात बाली भैया ने कारागृह की सुरक्षा व्यवस्था और भी कड़ी कर दी है अब तो वहां से कोई पंछी भी नहीं आ जा सकता परिणाम चाहे जो कुछ भी हो मुझे महाराज रक्ष को मुक्त कराने के लिए जाना ही होगा प्रणाम पिता श्री प्रणाम [संगीत] मां देव राजेंद्र आप अपने अंश के साथ ऐसा परिहास नहीं कर सकते वर्षों तप किया है मैंने उस वरदान को प्राप्त करने के लिए परंतु अब इसी समय जाकर मैं उनका आवाहन करूंगा और उन्हें आना ही होगा अन्यथा बाली अपने प्राणों का त्याग कर देगा नारायण [संगीत] नारायण वाली भैया ने अपने पिताश्री को बंदी बनाकर कदाचित उचित नहीं किया किंतु अब यह पुत्र अपने पिता तुल्य महाराज रिक्षा जी की मुक्ति करा कर ही रहेगा राजेंद्र वरदान के नाम पर आपने मेरे साथ परिहास किया है नहीं चाहिए मुझे ऐसा जीवन और परना ऐसा अपूर्ण वरदान मैं स्वयं का नाश करने जा रहा हूं रुक जाओ वाली ऐसा मत करो निकल आओ बाहर उस अग्नि से नहीं मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगा अभ इस अग्नी को रोक लेता हूं मैं नहीं सौगंध है आपको धर्म की आप मेरी इच्छा के विरुद्ध जाकर य अगनि को नहीं बुझा सकते पुत्र ऐसा मत करो क्यों ना करू मैं ऐसा आपकी कृपा से जन्म हुआ है मेरा वर्षो तप किया है मैंने और क्या प्राप्त हुआ मुझे उस तप से एक आधा अपूर्ण सा वरदान सबकी आधी शक्तियां मिल जाती है मुझे परंतु उस हनुमान की आदि शक्तियां मुझे क्यों प्राप्त नहीं हुई निरर्थक है यह वरदान पाली तुमने जो वरदान मांगा था मैंने वही वरदान दिया तुम किंतु सीमित कर दिया आपने उसको उस मर्कट हनुमान की आधि शक्तियां मुझ में समाहित नहीं हुई तुम्हें सामने वाले की शक्तियां तभी प्राप्त होगी जब वो शत्रुता के भाव से तुम्हारे सामने आएगा यदि हनुमान के हृदय में तुम्हारे लिए शत्रुता का भाव होता तो तुम्हें उसकी शक्ति अवश्य प्राप्त होती हट छोड़ दो वाली मैं इस तरह तुम्हें तड़पता नहीं देख सकता नहीं यदि तुम कहो तो मैं तुम्हें एक और वरदान दे सकता हूं हनुमान यहां रुक जाओ वहीं प्रतीत होता है य महाराज रिक्षा जी के लिए आया है महाराज बाली का आदेश है उनके पिता रिक्षा जी से कोई नहीं मिल सकता मैं उनसे मिलने नहीं उन्हें बंदी गृह से मुक्त कराने आया हूं नहीं ऐसा नहीं कर सकते तुम नहीं भीतर नहीं जाने देंगे हम तुम्हें
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