[संगीत] महा [संगीत] भारत मैं जानता हूं मा कि हस्तिनापुर चर से सुरक्षित हो गया है और अब मैं अपने शरीर को त्याग सकता मैं वासुदेव की प्र मैं चाहता हूं कि जब मैं इस शरीर को त्याग तो मेरी दृष्टि उनके मुखड़े पर रहे मैं स्वर्ग लोक के लिए पृथ्वी से यही उपहार लेकर जाना चाहता हूं बस यही उपहार लेकर जाना [संगीत] प्रणाम पिता गंगापुत्र सादर [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] प्रणाम मैं जानता था कि तुम अवश्य आओग तुम्हारे दर्शन में स्नेह लेप का गाय किया है जैसे बालू जल को चूस लेती है तुम्हारे दर्शन ने मेरी [संगीत] सारी मेरी दृष्टि और शकाल के खुले हुए आकाश की स्वच्छ यादो की वो डोरी बिल्कुल ची ऐसी सोची है मान हे गिरधर हे गोपाल हे देवकी नन मुझे तो जीते जी गया यही तो मैं [संगीत] चाहता और अब मैं यह चाहता कि आप अपने पत्र को अंतिम शि हे ओमकार तुम्हारे होते शिक्षा देने वाला मैं नहीं पिता मा मेरे पास ज्ञान है किंतु अनुभव नहीं अपना अनुभव देकर इन्ह धन्य कीजिए नक मेरे आंसू पसद मैं हस्तिनापुर नरेश पुत्र चक्रवर्ती महाराज युधिष्ठिर के दर्शन [संगीत] कर पता मा अस्थला पुर नरेश की जय हो और अब मुझे स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान की आज्ञा दो [संगीत] जो नहीं देखना था वो भी और जो देखने के लिए जी रहा था वो भी देख [संगीत] लिया नहीं पिता मा नहीं मैं आपको जाने नहीं दूंगा पिता मा मैं आपको जाले नहीं दूंगा मैं आपको जाले नहीं दूंगा पिता म तूने ऐसे बाण नहीं मारे बद से जिनके घव अरे ये घाव तो मेरे सारे जीवन की कमाई है व सारे जीवन की कमाई देख अब मुझे जाने हट ना कर बत हट ना कर मेरी एक अंतिम सेवा कर देव मेरे माथे पर मेरी मातृभूमि की थोड़ी सी नहीं नहीं नहीं मैं अब कु चले नहीं दूंगा हरे वत्स रो मत रो मत अरे ये तो बड़े हर्ष की घड़ी है तेरा पिता मा आज अपनी मातृभूमि के रण से मुक्त हुआ है हे हे राजन मैं एक पराजित योद्धा भी हूं और एक पराजित [संगीत] उसे ये सखो एक अच्छे योद्धा को एक अच्छे नागरिक को क्या नहीं [संगीत] करर मुसे बार बार व बार बार मेरे सामने गिड़गिड़ा या हे ता श्री हस्तिनापुर के राज सिंहासन की ओर ना देखिए स्वयं हस्ना यदि हस्तिनापुर ही नहीं होगा ये सिंहासन कहां से होगा किंतु अपनी प्रतिज्ञा की मर्यादा में जगड़ा मैं हस्तिनापुर के राज सिंहासन बैठे हस्तिनापुर के राजारा अपने पिता श्री की देश से बड़ा कोई नहीं होता पुत्र कोई भी पिता ना पुत्र ना कोई प्रतिज मेरी प्रतिज्ञा मुझे अपने देश के हितों से दूर करती चली गई और अपनी उस प्रतिज्ञा को फिर भी मैं छाती से लगाए रहा और अपने देश को सर्वनाश के मार की ओ जा अपनी प्रतिज्ञा के प्रति मेरी निष्ठा मुझे देशो के मार्ग पर ले गई है पुत्र देश बाड़ की शैया पर लेट आइए एक देशद्रोही हस्तिनापुर के विभाजन का कारण मैं हूं लक्षा ग्रह का उत्तरदाई दप का वस्त्र हरण करने वाले मेरे यही हाथ है जिन्ह मेरे प्रिय अर्जुन के बाणों ने इस देश की भूमि [संगीत] में हर बाण मुझसे कह रहा है हर का मुझसे कह रहा है इस भूमि को पहचान हे गंगापुत्र देवव्रत अपनी इस भूमि को पहचान अपने पिता की छमी के लिए तूने इस हे पुत्र मैं वो क्षत्रिय हूं जो अपनी प्रतिज्ञा का दास बनक [संगीत] जिया मेरे साथ मेरी मात्र भूमि के अपमान का ये अध्याय भी समाप्त हो [संगीत] जाएगा मेरे इन श्वेत वस्त्रों पर कहीं कहीं मेरे अहम का जिसे पश्चाताप का कोई आंसू नहीं सकता इसलिए हे पुत्र तुम भी कभी ऐसी प्रतिज्ञा ना करना जो कटार बनकर तुम्ह काट कर अपने देश से अलग कर दे और यदि तुमने ऐसी भूल की ना पुत्र तुम्हारा अंत भी बा किसी ऐसी क्योंकि जब जब कोई देवव्रत देश के हितों का मार्ग रोक कर खड़ा होगा तब तब उसे बाणों की शैया पर लिने के लिए कोई ना कोई अर्जुन अवश्य सा यही तो राजनीति का पुत्र देश के हितों से बढ़कर तो राजा का हित और कोई हो ही नहीं [संगीत] सता यदि तुम दिखाई तुम्हारा ऐसा कोई त है तो समझ लो कि तुम भीराज धर्म से [संगीत] भटक देश राजा के लिए नहीं होता राजा देश के लिए है और वो राजा कभी अपने देश के लिए शुभ नहीं होता जो अपने देश के आर्थिक और सामाजिक रोगों के लिए अपने अतीत को उत्तरदाई ठहरा करर सं यदि अतीत ने तुम्हें एक निर्बल आर्थिक और सामाजिक ढांचा दिया है तो उसे सुधारो उसे बदलो क्योंकि अतीत तो यूं भी वर्तमान की कसौटी पर कभी खड़ [संगीत] नहीं क्योंकि यदि अ स्वस्थ और उसमें देश को प्रगति के मार्ग की ओर ले जाने की शक्ति होती तो फिर परिवर्तन ही और एक बात और अच्छी तरह से किसी समाज की कुशलता की सही कसौटी यही है कि वहां नारी जाति का मान होता है या उसका अपमान कि देश की सीमा माता के वस्त्र की र उसकी सदैव रक्षा करना स रक्षा कर इन्ह धर्म और राज धर्म के विषय में भी कुछ बताइए पिता [संगीत] म धर्म विधियों या औपचारिकताओं का अधीन नहीं है धर्म अपने कर्तव्यों और दूसरों के अधिकारों के संतुलन कर इसलिए धर्म का राज धर्म भी यही है किंतु राजा का दायित्व नागरिक के दायित्व से कहीं अधिक यदि कोई परिस्थिति देश के विभाजन की मांग कर रही तो कुरुक्षेत्र में आ जाओ किंतु देश का विभाजन कभी ना होने दो क्या माता कुंती को काटकर आपस में बाट सकते यदि नहीं तो फिर मातृभूमि का विभाजन कैसे संभव हो सकता है मैं यह बात कर इसीलिए ये सब कह रहा हू युद्ध को टालने के लिए मैंने अपने देश का विभाजन त स्वीकार कर लिया किंतु तुम यह कभी ना करना मस्टर तुम ये कभी ना करना अब मैं थक गया हूं वास वैसे भी अब मुझे कुछ और नहीं कहना पुत्र अर्जुन अब तो मेरे माथे पर मेरे देश की मिट्टी का तिलक लगा दो यह सौभाग्य मुझे प्राप्त करने दीजिए जी तो मेरा भी यही चाहता था देव की न और मैं तुम्ह आदेश तो नहीं दे सकता था ना [संगीत] [प्रशंसा] बस सब जाने की आ क्या दो [संगीत] वासद हे मातृभूमि अब मुझे अपने माता श्री के पास जाने की आग क्या दीजिए हे आकाश मेरे देश को धूप छाव वर्षा की कभी कमी ना रहे उसके वृक्ष सदा फलों से लते रहे उसके कमल खिले रहे उसकी नव मल्लिकाएं अपनी सुगंध के बिछोना पर बैठी रहे उसके जलाशय स्वस्थ और जीवित रहे उसकी राजनीति के सूर्य को कभी ग्रहण ना लगे कभी ग्रहण ना [संगीत] लगे [संगीत] [संगीत] नहीं [संगीत] धन्य है वे आख जो नश्वर के अनश्वर होने का दृश्य [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] देख [संगीत] महाभारत सायु सातन [संगीत] हो महाभारत सायु न हो अन्याय की कोई कोई महाभारत सायु हो अन्याय की कोई पा चलो हम होले उसके साथ करे जो कृष्ण के जै के जैसी कर्म है गीता का उ महाभारत है सं संश कर्म है गीता का उपदेश महाभारत है शांति सं शांति संदेश कर्म है कर्म है गीता का उपदेश महा भारत है भारत शति सं शांति संदेश महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत
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