गण प्रदेव पृथ्वी पर यदि इसी प्रकार जीवों का जन्म होता रहा तो उनके अंत की कोई व्यवस्था ही नहीं होगी सृष्टि का संतुलन बिगड़ जाएगा प्रभु और प्रभु यदि ऐसा हुआ तो घोर अनिष्ट होगा कृपया करके आप ही कोई समाधान सुझा करर इस समस्या का निदान की प्रभु प्रणाम प्रणाम देवी मृत्यु मृ मृत्यु है आपकी समस्या का समाधान आयु समाप्ति पर होने वाली स्वाभाविक मृत्यु किंतु अभी मेरे द्वारा जीवों की आयु और मृत्यु का विधान निहित होना शेष है और अपने भैरवी स्वरूप में मैं वही करने आई हूं आयु समाप्त होगी तो जीव की मृत्यु हो जाएगी यह तो उचित किंतु हमें यह कैसे ज्ञात होगा कि किस जीव की क्या आयु होगी और उसका अंत कैसे होगा जीवों के जन्म के सा जब उनके जीवन का आरंभ होगा तब ब्रह्मदेव उनकी आयु भी निर्धारित करेंगे प्रत्येक युग में मनुष्यों की आयु और लंबाई भिन्न होगी सतयुग में मनुष्यों की आयु 100 सहस्त्र वर्ष और लंबाई 21 हाथ होगी त्रेतायुग में मनुष्यों की आयु 10 सहस्त्र वर्ष और लंबाई 14 हाथ होगी द्वापर युग में मनुष्य की आयु होगी सहस्त्र वर्ष और लंबाई सात हाथ होगी और कलयुग में मनुष्यों की आयु होगी 100 वर्ष और लंबाई साढ़े तीन हाथ होगी और जैसे जैसे कलयुग आगे बढ़ेगा मनुष्यों की आयु कम होती जाएगी और लंबाई भी कम होती जाएगी और कलयुग के अंत में मनुष्य की आयु के 12 वर्ष रहेगी और लंबाई बहुत छोटी रह जाएगी सामान्य रूप से युग के अनुसार मनुष्यों की यही आयु अवधि रहेगी किंतु प्रत्येक मनुष्य की वास्तविक आयु उसके पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार उसके जन्म के समय निर्धारित होगी जो दीर्घ भी हो सकती है और अल्प भी हो सकती है माता मनुष्यों की मृत्यु के बाद उनका तन मिट जाएगा किंतु आत्मा कहां जाएगी मेरे भुवनेश्वरी स्वरूप में 14 लों की रचना की थी मैंने जिनमें आप सभी का निवास स्वर्ग लोक भी है अब मैं अपने भैरवी स्वरूप में उस विशेष लोक की रचना करूंगी जहां जीवन के उपरांत नव शरीर के नष्ट हो जाने पर आत्माओ का वास [प्रशंसा] [संगीत] होगा [संगीत] के ज के माता के ज के माता ज के ज के माता ज के ज के माता या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण स या देवी सर्वभूतेषु भक्ति रूपेण सस्त ये है वो विशेष लोक धर्म परायण और सदाचारी जीवों की आत्माओं को यहां स्वर्ग लोक के सुखों का अनुभव होगा और जो दुराचारी और धर्म भ्रष्ट जीवों की आत्माएं होंगी यह लोक उनके लिए नर्क के समान होगा आत्माओं को यहां कर्मों का फल भोग कर प्रश्चित और साधना कर शुद्धि प्राप्त होगी प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार मेरे देवी भुवनेश्वरी द्वारा रचित भिन्न लोकों में जाना होगा जो सत्कर्म कर यहां पहुंचेंगे उन्हें यहां के बाद स्वर्ग में स्थान प्राप्त होगा और दुष्कर्म हों की आत्माओं को निम्न लोकों में जाना होगा किंतु जिन जीवों के लिए भक्ति ही सर्वो परी रही मेरी या किसी अन्य ईश्वर की उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी और वह विष्णु लोक ब्रह्म लोक अथवा कैलाश अर्थात दिव्य लोकों में स्थित होंगे अद्भुत माता जीवन और मृत्यु के चक्र को स्थापित करने हेतु प्रकृति के संतुलन को सुचारू रूप से बनाए रखने के लिए आपने अपने माता भैरवी स्वरूप में एक ऐसे लोग का निर्माण किया जहां मृत्यु के उपरांत आत्माओं का निवास [संगीत] हो तुम्हारे मन में एक और प्रश्न उत्पन्न होने का आभास हो रहा है मुझे पूछ गणेश पूछ क्या पूछना है तुम्हें माता सूर्यदेव के प्रश्न का उत्तर जानने के लिए ही मैं भी उत्सुक हूं आत्माओं के लिए एक अन्य लोक का निर्माण तो हो गया किंतु उसको व्यवस्थित रूप से चलाने का दायित्व किसको सौंपा गया [संगीत] माता यह प्रश्न सभी देवताओं के मन में भी रह रह कर उठ रहा था देवी भैरवी संसार में प्रकट हुई किंतु इससे मृत्यु की व्यवस्था पूर्ण नहीं हुई थी उसके लिए एक काल देवता की आवश्यकता थी जो हमारा प्रतिनिधित्व कर इस कार्य का दायित्व संभाले उनकी सहायता के लिए काल के दूध की आवश्यकता थी और जो जीवों की आत्माओं को बंदी बनाए उस पाश की आवश्यकता पाश जीवों की आत्माओं को बंदी बनाने के लिए पाश की आवश्यकता थी और माता काल देवता के पद पर योग्य देवता की नियुक्ति भी तो आवश्यक होगी वो कैसे हुआ माता प्रश्न पूछ रहे हो तो उसका उत्तर पाने का धैर्य भी रखो हमें क्षमा की माता सर्वप्रथम यह प्रश्न सूर्यदेव के मन में भी उत्पन्न हुआ था किंतु उन्हें कहा ज था कि इस प्रश्न का उत्तर उनसे ही जुड़ा हुआ था उत्तर सूर्यदेव से जुड़ा था अर्थात [संगीत] माता देवी भैरवी संसार में प्रकट हुई से मृत्यु की व्यवस्था पूर्ण नहीं हुई थी उसके लिए एक काल देवता की आवश्यकता थी काल देवता के पद पर योगी देवता की नियुक्ति भी तो आवश्यक होगी वो कैसे हुआ माता सर्वप्रथम यह प्रश्न सूर्यदेव के मन में भी उत्पन्न हुआ था सूर्यदेव का विवाह देव शिल्पी विश्वकर्मा की पुत्री देवी संज्ञा से हुआ था जब मैंने आदित्य सूर्य का सृजन किया था तब उनके तेज का उत्पन्न होना आरंभ ही हुआ था तब उनकी एक पुत्री यमी और एक पुत्र यम दो संताने हुई थी कुछ समय के लिए तो सब कुछ कुशल था किंतु समय के साथ सूर्य का तेज बढ़ता गया [संगीत] देवी संज्ञा देवी संज्ञा कहां है आप आइए देवी संज्ञ संज्ञा अब तो पकड़ी जाओगी संभवत आंगन में [संगीत] होंगी इतना प्रचंड तेज इतना तीव्र प्रकाश [संगीत] सूर्यदेव का तेज असहनीय हो रहा है हमारे [संगीत] लिए स्वामी [संगीत] इस तीव्र ताप का यही अर्थ है कि स्वामी निकट [संगीत] [संगीत] है स्वामी मैं मैं वो संज क्या मुझे इतना भी अधिकार नहीं कि मैं अपनी पत्नी का स्पर्श कर सकूं स्वामी ऐसी कोई बात नहीं है मैं तो [संगीत] बस [संगीत] संख्या देवी संज्ञ धैर्य रखिए सब ठीक हो जाएगा स्वामी मुझे समझने का प्रयास कीजिए आपके प्रचंड तेज को सहने में मुझे बहुत कठिनाई होती है तो आप मुझसे क्या अपेक्षा करती है देवी संज्ञा मैं सूर्यदेव हूं अपने तेज और अपनी ऊर्जा संसार को जीवन प्रदान करता हूं किंतु मेरी पत्नी मेरे उसी तेज और मेरे उसी ऊर्जा के कारण मेरे निकट आने में असमर्थ है और यदि ऐसा ही है तो क्या मैं यहां से कहीं चला जाओ अथवा आप सदा के लिए अपने पिता के निवास लौटना चाहती हैं किंतु स्मरण रहे आप सूर्यलोक की स्वामिनी है आपके दायित्व है आपका पुत्र है जो शीघ्र अपने तप के लिए प्रस्थान करने वाला है और यदि आप भी यहां से चली गई तो मैं एकाकी कैसे रहूंगा नहीं आप आप कहीं नहीं जा सकती समाधान भी आप ही को ढूंढना होगा क्योंकि क्योंकि समस्या आपकी है मेरी नहीं आपका पति हूं मैं और आपका सानिध्य प्राप्त करना मेरा अधिकार हैरे मां [संगीत] मां मैं आपको इस प्रकार दुखी होते हुए नहीं देख सकता और आपको इस अवस्था में देख के तो मैं तपस्या के लिए कदापि नहीं जा सकता [संगीत] मां पुत्र तपस्या के लिए तुम्हारा जाना अत्यंत मह तुम धर्म परायण हो और तब तुम्हारा धर्म है इसलिए तुम्हारा तब के लिए जाना उचित है तुम तुम मेरी चिंता त्याग दो और तुम तपस्या के लिए अवश्य जाओ मैं यहां कुशल रहूंगी उचित है मां प्रणाम मां मैं आपका आदेश नहीं टाल सकता इसीलिए अवश्य जाऊंगा मैं किंतु अपना तप संपन्न कर शीघ्र ही लौटूंगा [संगीत] मैं क्या करूं मां जैसे जैसे स्वामी का तेज बढ़ता जा रहा है मैं उनके निकट जाने में यहां तक कि उन्हें देख पाने में भी असमर्थ किंतु मैं अर्थांग नहीं हूं उनकी मुझ पर अधिकार है उनका मुझे कोई उपाय सुझाए माता मेरा मार्ग दर्शन कीजिए मैं करू तो क्या करूं मैं करू तो क्या करू [संगीत] मां और आपको इस अवस्था में देख के तो मैं तपस्या के लिए कदा भी नहीं जा सकता मां तुम धर्म परायण हो और तब तुम्हारा धर्म है [संगीत] तपस्या खोर तब करूंगी मैं और मेरा तप मुझे मेरे स्वामी के तेज को सहने की शक्ति देगा हां मां मैं तब करूंगी किंतु स्मरण रहे आपका पुत्र है जो शीघ्र अपने तप के लिए प्रस्थान करने वाला है और यदि आप भी यहां से चली गई तो मैं एकाकी कैसे रहूंगा किंतु किंतु मैं अपने तब के लिए यहां से कैसे जाऊं स्वामी मुझे कभी कहीं जाने की अनुमति नहीं देंगे और उनके निकट रहते हुए मैं अपना तब भी नहीं कर पाऊंगी क्या करूं मैं मैं करू तो क्या [संगीत] करूं मां मां इस दुविधा से मुझे मुक्ति दिलाए मां कोई उपाय सुझाए कोई उपाय सुझाए कोई उपाय सुझाए कोई उपाय सुझाए कोई उपाय सुझाए मां कोई उपाय सुझाए मेरी प्रति छाया मेरी प्रति छाया मां उस रात ी देवी संजा को यह आभास हुआ कि वह अपने तप के लिए तभी जा सकेंगी जब वह अपने किसी प्रतिरूप को छोड़कर जाएंगी और उनका प्रतिरूप उनकी प्रति छाया के सिवाय और कौन हो सकता [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] था हां यही उचित है मां का भी यही संकेत है यही करूंगी मैं अपनी इस छाया को यहां स्थित [संगीत] [संगीत] करूंगी [संगीत] मैं देव शिल्पी विश्वकर्मा की पुत्री सूर्यदेव की पत्नी देवी संज्ञा तुम्हें सजीव होने का आदेश देती हूं [संगीत] [संगीत] [संगीत] तुम छाया हो मेरी प्रति [संगीत] छाया [संगीत] और देवी संज्ञ अपनी छाया को सूर्य लोक में छोड़कर पृथ्वी पर तप करने के लिए चली गई [संगीत] स्वामी मुझे पुकारने का क्या लाभ देवी संज्ञा क्योंकि यदि मैं मुड़कर आपकी ओर देखूंगा तो आप अपने नेत्र नीचे कर लेंगी जो कहना है वहीं से कहिए मैं सुन रहा [संगीत] हूं [संगीत] स्वामी आपको पूजा का प्रसाद दिए बिना मैं आपको कैसे जाने देती देवी संज्ञा क्या क्या यह सत्य है क्या मेरा तेज आपको प्रभावित नहीं कर रहा य यह कैसे संभव किया आपने बस स्वामी अब और प्रश्न नहीं आप निश्चिंत होकर अपनी यात्रा पर जाइए क्योंकि अब सब कुछ कुशल है उचित है [संगीत] देवी मैं देवी संज्ञा नहीं छाया हूं सूर्यदेव मैं आपकी पत्नी नहीं मात्र उनकी प्रति छाया हूं मैंने देवी संज्ञा को वचन दिया है कि मैं आपकी देखभाल करूंगी और किसी को भी यह ज्ञात नहीं होने दूंगी कि वह सहज आपका सानिध्य प्राप्त करने के लिए यहां से बहुत दूर तपस्या करने गई है सूर्यदेव जब माता संज्ञा तपस्या करने सूर्यलोक से चली गई तो क्या आपको कभी उनकी अनुपस्थिति का आभास नहीं हुआ क्या ऐसा कभी प्रतीत नहीं हुआ कि छाया मां संज्ञा मां तो है ही नहीं प्रथम पूज्य गणेश जी देवी छाया देवी संज्ञा की प्रतिरूप थी सभी प्रकार से वह उनके समान थी और मैं भी अपनी पत्नी का साथ पुनः पाकर अत्यंत प्रसन्न था और जब भी मैंने उनके के भीतर आए हुए परिवर्तन का रहस्य जानने का प्रयास किया तो सदा उन्होंने उस प्रश्न को टाल दिया तब तनिक शंका अवश्य होती थी मुझे तो क्या आप कभी सत्य ज्ञात कर सके सूर्यदेव हां गणेश जी यह सत्य कैसे जाना आपने सूर्यदेव बताइए ना गणेश तुम पुनः वो प्रश्न पूछ रहे हो जिसका उत्तर देने का समय अभी नहीं आया है क्षमा कीजिए माता मैं तो बस उत्सुकता वश पूछ रहा था धैर्य गणेश धैर्य तुम्हारी उत्सुकता अवश्य शांत होगी तो सुनो सूर्यदेव के पूर्व किसी अन्य को यह ज्ञात हो गया था कि देवी छाया उनकी पत्नी देवी संज्ञा नहीं है अब तुम्हारे मन में उत्पन्न होने वाले प्रश्न का उत्तर देने के लिए मैं एक प्रश्न पूछती हूं तुमसे उचित है माता उस का विचार करो गणेश जब देवी पार्वती में परिवर्तन आने प्रारंभ हुए थे तो सर्व प्रथम उसका आभास किसे हुआ था महादेव को कुमार कार्तिके को या [संगीत] तुम्हे मुझे माता मैं आपका संकेत समझ गया माता तो सूर्यलोक में जो घटित हो रहा था उस परिवर्तन का सत्य सूर्यदेव से भी पूर्व मां संज्ञा के पुत्र को ज्ञात [संगीत] हुआ देवी छाया यम से अपना सत्य नहीं छिपा सकी क्योंकि मां के आचल की ममता मां की ममता भरी दृष्टि और उनमें आया हुआ परिवर्तन संतान के नेत्रों से छिपाया नहीं जा [संगीत] [संगीत] सकता समय बीतता गया सूर्यदेव और देवी छाया का सुख जीवन आगे बढ़ता रहा उन्हें एक पुत्र शनि की भी प्राप्ति हुई सब कुशल था किंतु अब देवी संजा के पुत्र यम अपना तप समाप्त कर वहां लौटने वाले थे सूर्यदेव के व पुत्र जिनके अस्तित्व से ही देवी छाया अनभिज्ञ [संगीत] थी मां कितनी आनंदित है अर्थात यहां सब कुशल है मैं मां को चकित कर दूंगा [संगीत] स्वामी यहां तो कोई भी नहीं है प्रणाम मां यह कौन है यहां कैसे आया क्यों आया कौन हो तुम और मुझे स्पर्श करने का साहस तुमने कैसे किया मां ने मुझे पहचाना नहीं और मां भयभीत भी है मुझसे स्वामी यह जो भी है किंतु मेरी मां कदा भी नहीं है स्वामी स्वामी स्वामी देखि वहां प कोई है वहां वो कोई है वहा [संगीत] पय अब समझा मैं अचानक अपने पुत्र को देखकर आप फूले नहीं समा रही पुत्र और अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं है आपके पास है ना कौन है यह और यहां मां के स्थान पर क्यों है देवी संजा अब यहां स्तब्ध खड़ी रहेंगी इतने समय बाद लौटा है आपका पुत्र क्या उसके लिए उत्तम भोजन का प्रबंध नहीं करेंगी जी स्वामी उचित [संगीत] है पिताश्री यह मेरी मां नहीं है यह मेरी मां नहीं है पिताश्री यह कैसा अनुचित कथन है हमका यह क्या दृष्ट कर रहे हो तुम यह तुम्हारी मां नहीं है यह कहने का क्या अर्थ है तुम्हारा [संगीत] स्वामी सूर्यदेव आप अपने पुत्र पर क्रोध मत कीजिए वो सत्य कह रहा है कह रहा है वो सत्य कह रहा है मैं मैं उसकी मां नहीं मैं देवी संज्ञा नहीं मैं छाया हूं आपकी पत्नी देवी संज्ञा की प्रति छाया आपकी पत्नी देवी संज्ञा की प्रति छाया आपकी पत्नी देवी संज्ञा की प्रति छाया देवी संज्ञा की छाया मेरी पत्नी की छाया मैं देव शिल्पी विश्वकर्मा की पुत्री सूर्यदेव की पत्नी देवी संज्ञा तुम्हें सजीव होने का आदेश देती [संगीत] हूं तो अंतत इस प्रकार सूर्यदेव को सत्य ज्ञात हो ही गया हा देवी छाया ने अपना सत्य विस्तार से सूर्यदेव को बताया और उन्हे आभास हो गया कि अपने अत्यधिक तेज के कारण वह अपनी पत्नी देवी संज्ञा का सानिध्य प्राप्त नहीं कर सकते इसीलिए इस समस्या का निदान पाने के लिए वह अपनी पत्नी देवी संज्ञा के पिता देव शिल्पी विश्वकर्मा के पास गए मैं अपना तेज घटा नहीं सकता और मेरे तेज के कारण आपकी पुत्री और मेरी पत्नी संज्ञा मेरे निकट नहीं आ सकती इसीलिए वह छाया को मेरे पास छोड़कर मुझसे दूर चली गई है तप करने अब आप ही इस समस्या का कोई निदान सुझाए ससुर शी बताइए मुझे बताइए मुझे कि की मैं कि मैं क्या करूं क्या करू मैं क्या करू अबना आयात [संगीत] अयंती माता यह तो और भी विकट परि स्थि उत्पन्न हो गई थी तो विश्वकर्मा जी ने क्या सुझाव [संगीत] दिया महा सत्य तो सत्य है उजागर हो ही जाता है इसलिए हमें सदैव सत्य के मार्ग का ही चुन
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