[संगीत] हम अपनी सोच और संसार की मान्यता के अनुसार अपने विचार बनाते हैं जैसे सत्य कहना धर्म है असत्य कहना पाप सहनशीलता धर्म है और क्रोध करना अधर्म उपकार करना जीवों पर दया करना धर्म है और निष्ठुर होना अधर्म परंतु क्या यही सत्य है क्या कभी-कभी परिस्थितियां इन आवेशों को उल्टा नहीं कर देती करती यदि इस संसार में कुछ धर्म है कुछ पुण्य है कुछ महान है तो परिस्थिति के अनुसार चलना जटा स्मरण है आप सबको वह जिन्होंने रावण पर क्रोध किया था उस पर आक्रमण किया था उस समय जटायु का क्रोध पाप नहीं था धर्म था इसीलिए अंत में उन्हें भगवान राम की गोद मिली और कुछ ऐसे भी होते हैं जो धर्म को सहनशीलता समझकर हर अन्याय को सहते हैं और अंत में वो बाणों की शया पाते यदि कोई पशु या व्यक्ति अकारण आक्रमण करके किसी निर्दोष के प्राण लेने की चेष्टा करें तो उसके रक्षा हेतु उसका वध कर देना पाप नहीं समय की मांग है क्योंकि आक्रमण भी आत्म रक्षण ही है यदि किसी दुष्ट की सहायता करने से सामान्य मनुष्य को कष्ट पहुंचे पीड़ा पहुंचे तो उसे सहायता ना देना ही धर्म है अकारण क्रोध अस्वीकार्य है परंतु यदि क्रोध से कुछ शुभ पाप बाहु भीत हो तो क्रोध और दंड भी धर्म ही [संगीत] है य मेरा अंतिम निर्णय है मैं उन पांडवों को इंद्रप्रस्त नहीं दूंगा तो नहीं दूंगा उचित है दुर्योधन तुम इंद्र प्रस्त रख सकते हो उसकी सेना भी रखलो अस्त्र शस्त्र रख लो लाखों गाय अश्व उसकी प्रजा भी रखलो कोटि कोटि धन संपत्ति जो कुछ भी पांडवों ने अपने परिश्रम से अर्जित किया था वह सब रख लो दुर्योधन परंतु इस अन्याय के प्रतिकार स्वरूप केवल एक कार्य कर प्रतीक के रूप पांचों पांडवों को पांच गांव दे इतना तो दे ही सकते हो दुर्योधन पांचों पांडव व सुख सेवास करें और कुछ नहीं चाहेंगे इस युद्ध को टालने के लिए केवल पांच गांव देना स्वीकार है [संगीत] तुम्ह वासुदेव वासुदेव वासुदेव यदि दुर्योधन पाच गाव दे देता है तो क्या आप वचन देंगे कि पांडव इंद्रप्रस्थ की चाह में आक्रमण की चेष्टा नहीं करेंगे हा गांधार नरेश मैं वचन देता हूं इस स्थिति में पांडवों की ओर से कोई आक्रमण नहीं होगा वह हर परिस्थिति में संतुष्ट रहेंगे क दो दुर्योधन इससे अच्छा प्रस्ताव कोई नहीं होगा महाराज मैं आपसे विनती करता हूं यही अवसर है अंतिम अवसर आप इस प्रस्ताव को स्वीकार करके इसको यही रोक दीजिए ताच का कहना उचित है पुत्र हां कर दो इसी में सबका हित है मित्र मैंने सदा इस युद्ध का पक्ष लिया है मैंने सदा अर्जुन से अपना अधूरा द्वंद पूर्ण करना [संगीत] चाहा मैं अपना अधूरा द्वंद कभी और पूर्ण कर लूंगा इस समय पूरे भारतवर्ष को महा विना से बचाने की आवश्यकता [संगीत] है हां कह दो मित्र तुमने तो एक अनजान का मान रखने के लिए [संगीत] उसे अंगराज बना [संगीत] दिया तो लाखों के प्राणों को बचाने के लिए पांच काव दे दो मित्र देख रहे हैं वासुदेव मेरे मित्र अंगराज मेरे साथ [संगीत] है और आपको तो अच्छे से ज्ञात है कि कण को अंगराज मैंने बनाया उसे वह दिया है मैंने जो जो पांडव नहीं दे पाए ना पांडव ना पितामह और यह मेरा वचन है यदि मेरा मेरा मित्र मुझसे प्राण भी मांगेगा तो वो भी [संगीत] मैं प्रसन्नता से दे [संगीत] दूंगा [संगीत] परंतु परंतु ऐसा सोचना भी मत कि मैं उन पांडवों को कुछ भी देने वाला हूं बचपन से मुझे मुझे यही आभास कराया गया है कि मेरा किसी भी वस्तु में कोई अधिकार नहीं ना अपने पिता के राज्य पर ना ना सिंहासन पर जो भी मिले या तो या तो दे दो या उन उन पांडवों के साथ में बाट लो और और तुम अधिकार की बात करते हो वासुदेव तो तो बताओ मुझे मेरा अधिकार उन उन पांडवों ने मुझे कब दिया कब गुरु का प्रेम महामहिम का वात्सल्य किसी को मिला तो वो उन पांडवों को मुझे नहीं रे पिता के राजा होने पर युवराज पद पर किसी अधिकार था तो वो वो मेरा था परंतु मुझे मुझे नहीं मिला वो मिला उस उस युधिष्ठिर [संगीत] को दुर्योधन की बात तर्क सम्मत है वासुदेव युवराज राजा का पुत्र ही बनता है और यही नीति है आप तो कभी वास्तविक राजा थे ही नहीं महाराज आप तो आज भी हस्तिनापुर के केवल कार्यकारी नरेश आपका राज्य अभिषेक भी नहीं हुआ और रही बात नीति की तो कुल वधु का वस्त्र हरण उसका अपमान कहां की नीति पांडवों को पक्ष लेना बंद करो गले मैंने उस उस द्रौपदी को धर्म पूर्वक द्यूत में जीतकर उसे अपनी दासी बनाया उसका वस्त्र हरण करना मेरा अधिकार था क्योंकि क्योंकि जो दासी अपने स्वामी की आज्ञा का पालन ना करे वो दंड की अधिकार होती है नारी केवल सम्मान की अधिकार है दुर्योधन [संगीत] दूत बनकर आए हो अपना संदेश दे चुके हो अब मेरा निर्णय सुनो मैं उन पांडवों को बाज खा तो क्या एक सुई की नोक बराबर धरा भी नहीं दूंगा मैंने तुम्हारा संदेश भली भाति समझ लिया है युवराज अब वही होगा जो तुम चाहते हो दुर्योधन अब महाविनाश होगा महायुद्ध होगा महाभारत हो हो अनाम साम अधम धम साम प्रणिपात [संगीत] हो [संगीत] रुकिए केशव मित्र एक बार और विचार कर लो मित्र राजा बली की कथा स्मरण है तुम्हे व मायावी वामन उनसे उनसे तीन पग मांगने आया था तीन पग तीन पग भूमि और उस तीन पग में उस वामन ने केवल तीनों लोक नाप लिए बल्कि उस भली का नाश भी कर दिया अरे इस लिया को पाच गांव दे दूंगा तो तो य हस्तिनापुर का अस्तित्व ही मिटा देगा पाखंडी कृष्ण तुम्हारी मीठी मठी बातों का प्रभाव इन पर पड़ सकता है दुर्योधन पर नहीं तो फिर मैं प्रस्थान करता [संगीत] हूं रुको दूत [प्रशंसा] [संगीत] मैंने तुम्हें जाने कि आजा नहीं दी है अभी [संगीत] [प्रशंसा] सब तुम्हारी माया सेबत है कृष्ण आज मैं अपनी प्रजा और अपनी सेना के मन से तेरा भाय उटा दूंगा [संगीत] कृष्ण तुम हस्तिनापुर से बाहर नहीं जाओगे मैं धत राष्ट्र पुत्र दुर्योधन तुम्हें अभी और इसी क्षण बंदे बनाता हूं वासुदेव सैनिको बंदी बना ले [प्रशंसा] को अपने पुत्र को सीमा में रहने का अर्थ सिखाइए महाराज यह अनर्थ करने जा रहा है महामहिम बिल्कुल ठीक कह रहे हैं महाराज वासुदेव कृष्ण के हस्तिनापुर के संबंधी नहीं इस समय वे एक शांतिदूत है और इस बात का स्मरण रहे महाराज एक शांति दूत के साथ इस तरह का व्यवहार उचित नहीं है अचार ठीक कह रहे हैं पुत्र ऐसा अनर्थ मत करो रावण ने भी यही मूर्ता की थी उसने भी दूध का अपमान किया था और उसकी सोने की लंका जलकर पसमा हो गई मि रावण मूर्ख था जो सामान्य रस्सी से हनुमान को बांधने चला था परंतु मैंने मैंने इस विशेष दूत के लिए विशेष धातु की श्रंखला बनवाई है [संगीत] [संगीत] कोई कुछ नहीं कहेगा [संगीत] मेरा आप सबसे निवेदन है कि मेरे और दुर्योधन के मध्य में ना आए और साक्षी बने इस क्षण के इसे भान नहीं कि यह क्या कर रहा है जिसके जन्म के पश्चात जिसे बंदी ग्रह की बेड़िया ना बांध सकी सैनिकों का पहरा ना रोक पाया आज तुम उसे बांधने चले हो [संगीत] दुर्योधन सामर्थ्य है तुम में तो बढ़ो आगे हो सके तो साधो मुझे दुर्योधन अपने इन श्रृंखलाओं में बांधने का प्रयास [संगीत] करो हो सके तो साधो मुझे दुर्योधन अपने इन श्रृंखलाओं में बांधने का प्रयास [संगीत] करो उठो उस ने [संगीत] को [संगीत] [संगीत] तुम्हें लगता है कि यह धातु त श्रृंखला मुझे बांधने के लिए पर्याप्त है [संगीत] दुर्योधन श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी नाथ नारायण [प्रशंसा] [संगीत] वासुदेवाय श्री कृष्णा गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा श्री कृष्ण गोविंद हरे हे नाथ नारायण [संगीत] वासुदेवा जब तक अनंत आकाश को बांधने में सक्षम श्रंखला तुम्हारे पास ना हो तब तक ऐसी मूर्खता पुनः करने का प्रयत्न मत करना दुर्योधन ये ये ये य छल य माया यही है ना तुम्हारे अस्त्र छल परंतु मुझे तुमसे या तुम्हारे इस माया से डर नहीं लगता हर लूंगा मैं तुम्हारे और उन पांडवों के प्राण स्मरण रखना के इस महायुद्ध में अंत करेगा तुम्हारा और उन पांडवों का यह दुर्योधन जो स्वयं मृत्यु के शिखर से गिरने वाला हो उसे अपने अंत की चिंता करनी चाहिए मूर्ख दुर्योधन जिस सत्य को जिस भविष्य को मैं टालना चाहता था उसे आज तुमने स्वयं आमंत्रण दे दिया और सत्य यह कि इस महायुद्ध के अंत में तुम्हारा तुम्हारे पापों और तुम्हारे पाप में भागीदार रहे प्रत्येक का अंत होगा यह युद्ध मेरे राज्य में मेरे ही सभा में आके मुझे धमकी देता है तुम्हारा राज्य तुम्हारी सभा इस राजसभा के समक्ष कितना सा आकार है तुम्हारा दुर्योधन और हस्तिनापुर के समक्ष कितनी सी है यह सभा और इस पृथ्वी के सामने कित नासा है हस्तिना पर और इस ब्रह्मांड में क्या स्थान रखती है यह पृथ्वी यदि मनुष्य का अभिमान और दम उसके आकार से अधिक बड़ा हो जाए तो वही मनुष्य को स्वयं अपने बोझ से मार डालता है और तुम्हारे अंत का कारण भी यही अभिमान होगा दुर्योधन और तुम्हारा अंत भी तुम्हारे इसी अभिमान से होगा दुर्योधन [संगीत] धर्मस्या ले भवती भारता धर्मस्या नम सेम हम यना [संगीत] नाता
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