Wednesday, 7 January 2026

हिरणायक्ष और इंद्रदेव के बीच हुआ घमासान युद्ध Sankat Mochan Mahabali Hanuman 342 Pen Bhakti

[संगीत] तो क्या माता शीष कट जाने से असुर राहु की मृत्यु हो गई राहु तो प्रभु के हाथ से अमृत पी चुका था ना राहु की मृत्यु नहीं हुई थी हनुमान अमृत पीने के कारण उसका धड़ एवं शीष दोनों ही जीवित रहे तब उसके धड़ को केतु और शीष को राहु नाम दिया गया और उस दिन से राहु ने चंद्रदेव एवं सूर्यदेव से वैर ठान लिया एवं अपना प्रतिशोध लेने के लिए वे चंद्रदेव एवं सूर्यदेव को निश्चित समय पर ग्रस्त हैं जिसे संसार सूर्य ग्रहण एवं चंद्र ग्रहण कहता है अब समझा हनुमान सूर्य ग्रहण एवं चंद्र ग्रहण का रहस्य माता फिर क्या हुआ फिर तो असुरों को ज्ञात हो ही गया होगा इस ल के बारे में वह बिना अमृत लिए कैसे माने माता व अमृत लिए बिना कैसे मानते परिणाम यह हुआ कि देवताओं और असुरों में युद्ध प्रारंभ हो गया क्योंकि देवता अमृत पान करके पुष्ट एवं अमर हो चुके थे देवी लक्ष्मी और प्रभु श्री नारायण के आशीर्वाद की शक्ति भी उनके साथ थी देवताओं ने सहज ही असुरों को परास्त कर दिया तो यह कथा थी प्रभु श्री नारायण के कुर्म अवतार की एवं इसी कथा में प्रभु नारायण जी ने देवी मोहिनी का रूप धारण करके असुरों से अमृत की रक्षा की तो हनुमान अब यह बताओ कि इस कथा से इस कथा से हनुमान को क्या सीख प्राप्त हुई मैंने इससे यह सीखा कि यदि दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो प्रभु नारायण के कोर्म अवतार की ही भाति अपने पृष्ठ पर मंदराचल पर्वत को रखकर उसे मतवा करर हम समुद्र से अमृत निकलवा सकते हैं ल से किए गए कार्य का दुष्परिणाम उसे भोगना ही पड़ता है माता जैसे उस राहु ने भोगा था हम सत्य कथन है हनुमान किंतु माता प्रभु श्री हरि के देवी मोहिनी के अवतार के बारे में सोचकर हनुमान अत्यंत उतावला हो रहा है यह बाल सुलभ उतावलापन है हनुमान आओ मेरे साथ प्रभु मोहिनी के अवतार की स्तुति गाओ तुम्हारा मन शांत हो जाएगा अवश्य माता यह बा कथा महाबली हनुमत की रुच कर लीला राम भगत की जय जय जय रघुनंदन राम जय जय जय महाबली हनुमान मोहिनी रूपाल अवतार जग पे किए विष्णु उपकार अमृत राक्षस से ले लीन हो और देवगण को दे दी हो संकट बेला जब ह आए तब हु नारायण उराए हनुमत सुमिरे बारंबार जय जय जय श्री हरि जयकार ये गांधा महाबली हनुमत की रुच कर लीला राम भगत की जय जय जय रघुनंदन राम जय जय जय महाबल हनुमान [संगीत] हनुमान अब तुम्हारा मन शांत हो गया ना हनुमान हां माता तो तुम अब प्रभु श्री नारायण के अगले अवतार के बारे में जानने के लिए प्रस्तुत हो हां माता शीघ्र बताइए ना प्रभु श्री नारायण ने तृतीय अवतार कौन सा धारण किया और उनके तृतीय अवतार की कथा क्या थी प्रभु श्री नारायण का तृतीय अवतार था वराह अवतार जो उन्हें सतयुग में ही धारण करना पड़ा बराह अवतार यह प्रभु नारायण का बड़ा ही भयानक अवतार हुआ होगा ना माता हां हनुमान भयानक हिंसक शुकर जिसकी दाढ से निकले हुए दं शत्रु के लिए काल के समान होते हैं शीघ्र बताइए ना माता फिर क्या हुआ था प्रभु को ऐसा अवतार क्यों लेना पड़ा इस कथा का सूत्रपात तब हुआ जब चार बाल ऋषि भगवान विष्णु से मिलने वैकुंठ के द्वार पहुंचे चार बाल ऋषि अर्थात वह बालक थे माता हनुमान यह चार बाल ऋषि ब्रह्मा जी के चार मानस पुत्र हैं जिनका नाम है सनक सनन सतान एवं सनत कुमार इनकी आयु तो अधिक है किंतु यह िक ऋषि अपने तपो बल से बाल रूप में ही रहते हैं यह चारों ऋषि वैकुंठ के द्वार पर पहुंचे वैकुंठ में सात द्वारों को पार करने के पश्चात ही प्रभु नारायण से भेंट होती है वे चारों ऋषि वैकुंठ के छह द्वार पार करके जब सप्तम द्वार पर [संगीत] पहुंचे [संगीत] रुक जाइए बाल ऋषियों आप बिना अनुमति के भीतर नहीं जा सकते देखिए हम चारों संदक ऋषि है मैं सनक यह सनातन यह सनन और यह सनत कुमार हम प्रभु हरि से मिलने आए हैं कृपया हमें भीतर जाने दें प्रतीत होता है कि आप चारों मालक भूल से इस ओर चले आए हैं यह कोई क्रीड़ा स्थल नहीं वैकुंठ है हमें ज्ञात है कि यह वैकुंठ है और आप दोनों वैकुंठ के द्वारपाल जय और विजय है देखिए हमें प्रभु श्री हरि के दर्शन कर लेने दीजिए यह समय प्रभु के विश्राम का है हम उनके विश्राम के समय में कोई विपदा नहीं डाल सकते यदि आपको प्रभु से से भेंट करनी है तो आपको प्रतीक्षा करनी होगी उचित है तो हम यही उनकी प्रतीक्षा कर लेते हैं प्रभु के विश्राम करने की बात सुनकर चारों बाल ऋषि वैकुंठ के द्वार पर ही बैठकर ध्यान लीन हो गए दिन व्यतीत हो रहे थे किंतु वे उसी प्रकार प्रतीक्षा में बैठे रहे नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वास ये तो पाल हट पर अड़ गए हैं ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते [संगीत] वासुदेवाय ये चारों तो जाने का नाम ही नहीं ले रहे नम आप बहुत दिनों से यहीं बैठे हुए हैं यह कोई विश्राम स्थल या तप स्थल नहीं है अतः आप चारों यह बाल हट छोड़कर जहां से आए थे वहीं लौट जाइए और ईश्वर की इच्छा हुई तो आपकी भेंट उनसे हो ही जाएगी किंतु इस तरह आप यहां बैठकर अपना समय नष्ट ना करें और वैसे भी आपकी आयु अभी तप या प्रभु दर्शन की नहीं क्रीड़ा करने की है देखिए हम बड़े मनोयोग से प्रभु दर्शन को आए हैं हमें उनसे मात्र एक बार भेंट कर लेने दीजिए हमारे दर्शन मात्र से उनके विश्राम में यदान भी नहीं आएगा यदि उन्हें हमारे प्या बारे में ज्ञात होगा तो वे हमसे भेट करने से भी मना नहीं करेंगे और बस आप एक बार उनसे हमारे आगमन की सूचना तो दीजिए फिर वही बाल स्वभाव की चपलता मैंने कहा ना आप उनसे नहीं मिल सकते और वैसे भी बालकों के लिए उनके पास समय नहीं है यदि आप कहे तो हम आपके लिए उत्तम भोजन की व्यवस्था कर दें यदि वो भी कम हो तो क्रीड़ा के लिए आपको दिव्य खिलौने मंगवा कर दे दें अपमान कर रहे हैं आप हम ऋषियों का बस बस बहुत हुआ ऋषि महाराज जहां से आए हैं वहीं लौट जाइए बस बहुत कर लिया आपने हमारा [संगीत] अपमान जय विजय प्रभु के द्वारपाल तो बन गए हैं आप किंतु प्रतीत होता है कि आपने अपने ज्ञान के द्वार बंद कर रखे हैं अन्यथा वैकुंट के वासी होकर हम ऋषि का इस प्रकार अपमान नहीं करते आप आप दोनों भगवान के निकट रहने के योग्य कदा भी नहीं है हम ऋषियों का परिहास करके आप दोनों ने अपनी आसुरी वृत्ति का परिचय दिया है हम तुम्हें शाप देते हैं अपनी इसी आसुरी वृत्ति के साथ तुम दोनों पृथ्वी पर जन्म लोगे और जन्म मृत्यु के बंधन में बंधे रहोगे यसा क्या हो गया प्रभु प्रणाम प्रभु सनकादिक ऋषि मेरे लोक में आप ऋषियों का स्वागत है प्रणाम सं काद कृष आपका यहां आना सुखद है मेरे द्वारपालों के अभद्र व्यवहार के लिए मैं आप सबसे क्षमा का प्रार्थी हूं [संगीत] ष प्रभु क्षमा मांगकर हमें लज्जत ना करें इन द्वारपालों ने जो किया अज्ञानता वश किया प्रभु हमसे बहुत बड़ी भूल हो गई हम ऋषिवर की तेजस्विता को नहीं पहचान पाए प्रभु हमने बालक समझकर इनसे अभद्रता की जिसके फल स्वरूप हम इनके श्राप के भागी हो गए हैं इनके श्राप के फल स्वरूप हमें पृथ्वी लोक पर जन्म लेना पड़ेगा प्रभु हम आपसे दूर नहीं जाना चाहते प्रभु हे बाल ऋषियों हम हमारी भूल के लिए आपसे क्षमा मांगते हैं कृपया अपना श्राप वापस ले लीजिए जय विजय यह विधि का विधान है श्राप हो या वरदान हम उसे वापस नहीं ले सकते अतः हम ऐसा करने में असमर्थ है यह सत्य है जय विजय कि सनत कुमारों के द्वारा दिया गया श्राप वापस नहीं हो सकता तुम दोनों को पृथ्वी पर जन्म लेना ही होगा किंतु हम तुम्हें इसके लिए विकल्प अवश्य दे सकते हैं या तो तुम सात जन्मों के लिए मेरे महा भक्त बनकर पृथ्वी पर जन्म लो या फिर तीन जन्मों के लिए मेरे घोर शत्रु बनकर पृथ्वी पर जन्म लो उसके पश्चात तुम वापस वैकुंठ में मेरे दर पाल बनकर सदा मेरे साथ रह पाओगे किंतु अब यह तुम पर है कि तुम कौन सा विकल्प चुनते [संगीत] हो प्रभु हम सात जन्मों की लंबी अवधि के लिए आपसे दूर रहने का सोच भी नहीं सकते अत तीन जन्मों की सीमित अवधि तक भले ही हमें आपका घोर शत्रु बनकर रहना पड़े हमें यही विकल्प स् प्रभु हां प्रभु तीन जन्मों के पश्चात तो हमें आपके पवित्र चरणों की सेवा करने का अवसर प्राप्त होगा तथास्तु माता वैकुंठ के द्वारपाल जय विजय किस प्रकार उन तीन जन्मों में श्री हरिनारायण प्रभु विष्णु जी के शत्रु बने कौन थे वह प्रभु के तीन शत्रु बताती हूं तुम्हारा मन शांत हो जाएगा माता शीघ्र बताइए ना हनुमान जाने के लिए बहुत अधीर हो रहा है कि श्रापित होने के उपरांत उन तीन जन्मों में जय विजय ने कौन से कौन से रूप लिए हनुमान जानने के लिए बहुत अधीर हो रहा है कि श्रापित होने के उपरांत उन तीन जन्मों में जय विजय ने कौन सेकन से रूप लिए पुत्र उनके तो दो जन्म हो भी चुके हैं उनका तृतीय जन्म आगामी युग अर्थात द्वापर युग में शिशुपाल और दंत वक्र के रूप में होना निश्चित है और इस त्रेता युग में असुर सम्राट रावण और उनके भाई कुंभकरण के रूप में उन्होंने जन्म ले लिया है अच्छा माता तो अपने प्रथम जन्म में वह कौन थे श्रापित होने के पश्चात सतयुग के मध्य में ही उनको गर्भ में धारण कर उनको जन्म देने वाली माता थी ऋषि कश्यप की पत्नी दती ने जय विजय के रूप में श्री नारायण के शत्रु हिरण्य कश्यप और हिरण्याक्ष को जन्म दिया धैर्य रखो प्रिय धैर्य रखो आयु के साथ-साथ उनकी आसुरी वृत्तियों में भी वृद्धि होने लगी हिरण्य कश्यप और हिरण्याक्ष ने अत्यंत क्रूर असुरों का रूप ले लिया अर्थात वो निर्दोष जीवों को कष्ट देने लगे माता हां पुत्र अपने इसी स्वभाव के कारण उनका व्यवहार जगत पालक प्रभु विष्णु जी के प्रति शत्रुता पूर्ण था छोटा भाई हिरण्याक्ष तो सदैव उपद्रव करने के लिए आतुर रहता था धर्म परायण और सत्य निष्ठ व्यक्तियों को सताना किसी का भी वध कर देना जैसे क्रीड़ा कर रहा हो अकारण युद्ध के लिए सदैव तत्पर रहना से दुष्कर्म थे [संगीत] उसके डरो मुझसे सर्वशक्तिमान हिरन हूं [संगीत] मैं या [संगीत] अ [संगीत] [हंसी] क्या पृथ्वी लोक पर कोई योग्य योद्धा नहीं है जो सर्वशक्तिमान है रक्ष के साथ युद्ध कर सके परंतु एक उत्तम विचार आया है मेरी बुद्धि में कि इंद्रदेव से युद्ध करके उनकी शक्ति की परीक्षा लूं मैं इंद्रदेव बाहर निकलिए मैं सर्वशक्तिमान हिरण्याक्ष आपको युद्ध की चुनौती देता हूं देखते हैं मेरे समक्ष आप कितने अधिक समय तक सुरक्षित रह पाते हैं उतनूर इंद्रलोक पहुंच कर देवराज इंद्र को चुनौती देने का दुस्साहस कैसे किया तुमने चुनौती तो प्रारंभ मात्र है इंद्रदेव मैं अपनी शक्ति से आपको धूल दसरत कर दूंगा यदि आप में शक्ति और साहस है तो युद्ध करिए मुझसे सर्वशक्तिमान हिरण्याक्ष के समक्ष कुछ अवधि तक को टिक कर [संगीत] दिखाइए स्वयं को संभालिए देवराज इद्र युद्ध कौशल और बल में इससे कहीं अधिक श्रेष्ठता की अपेक्षा की थी इस सर्वशक्तिमान हिरण्याक्ष [संगीत] ने [संगीत] डरो मुझसे मैं सर्वशक्तिमान हिरण्याक्ष हू [संगीत] [हंसी] पराजय स्वीकार करते हैं इंद्रदेव या प्राण घाती प्रहार करू आप पर डरो मुझसे डरो मुझसे सर्वशक्तिमान शक्तिमान शमान न मैं मैं शक्ति का अभिमान पतन का कारण बनता [संगीत] है

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