[संगीत] यह अग्नि की लपट तो मुझे भीतर जाने ही नहीं दे रही है कुछ तो करना होगा यह वायु की गति इतनी तीव्र कैसे हो गई मैं उस अबोध बालक के साथ कुछ अनर्थ नहीं होने दूंगी मुझे आगे जाना ही होगा [संगीत] यह क्या ऋषिवर तो अग्नि के मध्य में है इस प्रकार तो नहीं जा पाऊंगा इस अग्नि के भीतर पहले तो इन अग्नि के लपटों को ही शांत करना होगा फूंग से ही बुझेगी [संगीत] अग्नि [संगीत] [संगीत] ये हनुमान क्या कर रहे हैं ये तो घोर अनर्थ कर बैठेंगे धि शौर्य का हो यदि संगम हर कठिनाई बनती सुगम हनुमत ने युक्ति से बुझाया अग्नि का आवेश मिटाया ये गाथा महाबली हनुमत की रच कर लीला राम भगत की जय जय जय रघुनंदन राम जय जय जय महाबली हनुमान कहीं ऐसा तो नहीं मैंने ऋषिवर के तप में वेगना उत्पन्न कर दिया हो ये गाथा महाबली हनुमत की रुच कर लीला राम भगत की जय जय जय रघुनंदन राम जय जय जय महाबली हनुमान ऋषि दृष्टि ने सत्य दिखाया हनुमत का दवी रूप दर्शाया दिव्य कवच कुंडल से सज्जित इंद्र की माला से मंडित यक्ष राज कड़ा करता धारण यह बालक है असाधारण देव छवि का प्रभाव हुआ ऋषि मुख से कोप मिटा ये गाथा महाबली हनुमत की रुच कर लीला राम भगत की जय जय जय रघुनंदन राम जय जय जय महा दिव्य कुल कवच की यक्ष का कंगन हनुमान दिव्य बालक [संगीत] हनुमान प्रणाम ऋषिवर रुकिए अरे इनके वस्त्रों ने तो अग्नि पकड़ ली है [संगीत] है रुकिए ऋषिवर ऋषिवर यह हनुमान है इसे ज्ञात नहीं था कि आप तप में लीन है कृपया करके इसे तप में विघ्न डालने के लिए श्राप ना दे अबोध पालक है [संगीत] शांता मेरा तब तो पूर्ण हो ही चुका था किंतु गहन ध्यान में लीन होने के कारण मैं सुप्त अवस्था में चला गया ब तो अच्छा हुआ कि हनुमान समय पर आकर मुझे सुप्त अवस्था से बाहर निकाल लिया अच्छा हुआ अन्यथा मैं तो भयभीत ही हो गई थी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं मैं इन्हें कोई श्राप नहीं देने वाला परंतु मैं इन्हें वो भी नहीं दे सकता जिसके लिए यहां पर आए हैं और हनुमान मुझे ज्ञात है तू मेरे पास शिक्षा प्राप्त करने के लिए आए हो तुम मुझे अपना गुरु बनाना चाहते हो हां ऋषिवर मुझे अपना शिष्य बना लीजिए ना अपने चरणों में मुझे स्थान दे [संगीत] दीजिए हनुमान मुझे मेरे तपस्या का अगला चरण पूर्ण करना है और तुम्हारे समान मेरे पास भी मात्र सूर्यास्त का ही समय है इसलिए मैं तुम्हें अपना शिष्य नहीं बना सकता [संगीत] सूर्यास से पूर्व हनुमान को उसके गुरु मिल जाएंगे ना हनुमान के भाग्य में जिन गुरुदेव का जुड़ाव लिखा होगा हनुमान के साथ वो अवश्य उसे मिल जाएंगे मुझे हनुमान को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे मैं इनसे अंतर मन से जुड़ी हुई हूं मेरा मन तो कहता है स्वामी कि आप इन्हें गुरु दीक्षा दे [संगीत] दीजिए [संगीत] हनुमान के साथ तुम्हारे जुड़ाव का आभास है मुझे शांत परंतु मैं असमर्थ हूं हनुमान को गुरु दीक्षा देने में मुझे अपनी आगे की तपस्या पूर्ण करने के लिए अस्ताचल पर्वत जाना है किंतु स्वामी हनुमान सुमेरू से यहां तक आया है आपके पास ज्ञान की याचना लेकर शांता हनुमान दिव्य शक्तियों से संपन्न बालक हनुमान को ज्ञान देने का सामर्थ्य तो महा ज्ञान में भी कदाच ही [संगीत] हो फिर भी हनुमान मुझे लगता है कि सप्त ऋषि गण मान जाए तो अवश्य व सब मिलकर तुम्हें ज्ञान दे सकते हैं सप्त ऋषि गण मैं उन्हें पहले भी स्वर्ग लोक में मिल चुका हूं तो क्या आप सूर्यास्त से पूर्व मुझे उन तक पहुंचना होगा स्वामी आप तो सर्व समर्थ हैं आप सप्त ऋषि गणों का आवाहन करके उन्हें यहां बुला लीजिए हनुमान की इतनी सहायता तो कर दीजिए अवश्य शांता संसार के कल्याण के लिए हनुमान की दीक्षा पू होनी ही [संगीत] चाहिए हे संसार के नियंता सपत ऋषि गण प्रकट हो सूर्य देव तो अस्ताचल की ओर बढ़ चले [संगीत] हैं धीरज धरो हनुमान ऋषिवर तुम तुम्हारे कल्याण के लिए अवश्य कुछ करेंगे प्रणाम सप्त ऋषि गणों कल्याण हो हनुमान कीर्तिमान भव प्रणाम सप्त ऋषि गणों प्रणाम [संगीत] ऋषिवर ये तो पांच ऋषि ही है हनुमान जिन्हे आप ढूंढ रहे हैं ना ऋषिवर अत्री और ऋषिवर पुलह वे तपस्या में लीन है इसलिए नहीं आ सके क्षमा करें ऋषि गणों मैंने आप सभी का आव्हान इसलिए किया कि आप सब मिलकर हनुमान को शिक्षा प्रदान करें ऋषि व श्री यदि हम सातों ऋषि मिलकर हनुमान को दीक्षा देते तो यह दीक्षा संभव हो जाती परंतु अन्य दे ऋषियों के लिए यह संभव नहीं ऋषिवर तो क्या मैं बिना गुरु के ही रह जाऊंगा पिताश्री कहते हैं बिना गुरु के जीवन अपूर्ण रहता है अब तो सूर्यास्त की बेला भी निकट आ रही है ऋषिवर श्रृंगी जब आपने और ऋषिवर मतंग ने समता प्रकट कर दी है तो इसके पीछे अवश्य ही कोई रहस्य रहा होगा अवश्य ही हनुमान के भाग्य में कुछ विशेष लिखा होगा ऋषिव यह कारण तो नहीं हुआ है तो आप ही बताइए ऋषिवर क्या हो सकता है इसका कारण आप तो यह जान ही गए हैं कि हनुमान रुद्रांश अतः उनके लिए योग्य गुरु तो वही हो सकते हैं जिनके पास त्रिदेव का संपूर्ण ज्ञान हो और ऐसे विपुल ज्ञान का कोष तो मात्र उन्हीं के पास है जो अपनी सहस्त्र सहस्त्र रश्मि हों से संपूर्ण संसार को प्रकाशित करते हैं सबको अपनी ऊर्जा से जीवन देने वाले सूर्यदेव ही समस्त ज्ञान के भंडार [संगीत] हैं सूर्यदेव ही हो सकते हैं हनुमान के गुरुदेव अतः इसके लिए हनुमान को सूर्यलोक जाना होगा पंच ऋषियों ने किया विमर्श हनुमत है रुद्र के अंश जिनम निहित त्रिदेव का ज्ञान उनसे पाए शिक्षा हनुमान सूर्य करते संसार प्रकाशित सबका जीवन उन पर आश्रित एक वही इतने गुणवान उनके शिष्य बने हनुमान सूर्यलोक मैं वहां पहले भी जा चुका [संगीत] हूं किंतु सूर्य तो अस्त होने ही वाला है यदि सूर्यास्त होने से पूर्व गुरुदेव की स्वीकृति नहीं मिली तो मां भी दुखी हो जाएंगी और पिताश्री को भी कष्ट होगा और मैं उनसे भी नहीं मिल पाऊंगा जिनसे मुझे मिलना है [संगीत] मुझे शीघ्र जाने की अनुमति दें पुत्र हनुमान तुम एक लोक से दूसरे लोक की यात्रा पर जाने वाले हो इसलिए तुम्हें अपने माता-पिता की अनुमति एवं आशीर्वाद अवश्य लेना चाहिए हां हनुमान अपने बड़ों का आशीर्वाद लेने से बड़े-बड़े कार्य संपन्न हो जाते हैं और इसीलिए भी आवश्यक है हनुमान कि हर माता-पिता को य पूर्ण अधिकार है कि उसकी संतान पुत्र हो या पुत्री कहां है कहां जाने वाली है इसके बारे में संपूर्ण जानकारी उन्हें होनी ही चाहिए अब शीघ्र जाओ पुत्र सूर्यास्त के पूर्व तुम्हें यह सब कार्य करने हैं आप सबके चरणों में मेरा नमन कल्याण [संगीत] हो [संगीत] देवी ज्ञान के निर्मल सरिता का [संगीत] स्रोत योग्य गुरु ही होते हैं किंतु उस रो तक पहुंचना सहज नहीं होता सत्य है स्वामी इतनी कठिनाइयों के पश्चात हनुमान को भी उस की दिशा का ज्ञान हो ही गया किंतु अब सूर्यदेव कैसे बनेंगे हनुमान के [संगीत] गुरु सूर्यास्त होने में अब अधिक समय नहीं बचा ना जाने क्या हुआ होगा हनुमान को उसके गुरुदेव मिले भी होंगे या [संगीत] नहीं वो देखो अंजना हमारा पुत्र हनुमान आ रहा है [प्रशंसा] क्या हुआ पुत्र गुरुदेव मिले मां अभी तो मात्र उनके बारे में ज्ञात ही हुआ है उनके पास जाना अभी शेष है तो शीघ्र जाओ पुत्र सूर्यास्त होने में कुछ ही समय शेष है मां मुझे सूर्यलोक जाना है क्या सूर्यलोक हां मां ऋषिवर श्रृंगी और पूज्य सप्त ऋषि गणों ने कहा कि सूर्यदेव ही मेरे गुरु बन सकते हैं और इसीलिए मैं आप दोनों से अनुमति लेने आया हूं आप दोनों की अनुमति और आशीर्वाद के बिना मैं कैसे सूर्यलोक जा सकता हूं नहीं सूर्यलोक नहीं मैं तुम्हें सूर्यलोक नहीं जाने दूंगी यह क्या कह रही हो अंजना हनुमान के योग गुरु पाने का योग मात्र सूर्यास्त तक ही है सूर्यलोक जितना दूर है उतनी ही कठिन वहां की यात्रा मैं इसे इतनी दूर नहीं भेजूंगी इसके पूर्व भी जब भी ये सूर्यलोक गया है इस पर घोर संकट आया है अंजना कुछ नहीं होगा हनुमान को हनुमान को जाने दो तुम्हारा यह मोह कहीं हमारे पुत्र का भविष्य ना बिगाड़ दे क्या हुआ पुत्री मां बड़ी कठिनाइयों के पश्चात मुझे मेरे पुत्र का साथ मिला है इसे पुन स्वयं से दूर भेज दू वो भी ऐसे लोक में जहां कभी मेरा इससे मिलने के लिए मन व्याकुल हो तो मैं वहां जा भी ना सकू [संगीत] पुत्री मैं तुम्हारे मो को समझ सकती हूं किंतु इतना समझ लो कि संतान के अच्छे भविष्य के लिए माता-पिता को भी धैर्य की परीक्षा देनी पड़ती [संगीत] है क्या तुम चाहती हो कि हनुमान बिना गुरु के रह जाए बिना गुरु के जीवन अपूर्ण रह जाता है महारानी जी मोह छोड़ दो अंजना हनुमान को जाने दो सूर्यास्त होने वाला है मैं से सूर्यलोक नहीं जाने दू मां की ममता होती ही ऐसी है द्वारकाधीश किंतु संतान का भविष्य सर्वोपरि होता है माता-पिता के लिए उनका यह नैतिक कर्तव्य है कि उचित समय पर संतान की योग्यता और क्षमता को ध्यान में रखकर उसके लिए योग्य गुरु को और उनसे संतान को समुचित शिक्षा दीक्षा प्राप्त करने की व्यवस्था [संगीत] करें और हां अपने मोह को कभी भी संतान के भविष्य में बाधा ना बनने दे गुरु के ज्ञान के बिना मनुष्य अपूर्ण रह जाता है मैं इसे इतनी दूर नहीं जाने दे सकती पृथ्वी पर कहीं भी इसे शिक्षा लेनी होती तो मैं भेज देती किंतु सूर्यलोक नहीं
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