[संगीत] महाभारत अनुज पुत्र युधिष्ठिर के दूत को उपस्थित किया जाए जोा महाराज [संगीत] महाराज की जय हो राजन आप दीर्घायु हो आपकी प्रजा सुखी और सुरक्षित रहे हे राजन पंचाल का यह राज पुरोहित आपकी सेवा में आपके अनुज पुत्र इंद्र प्रस्थ के सम्राट युधिष्ठिर का प्रणाम और संदेश लाया है यहां से लौटकर प्रिय अनुज पुत्र युधिष्ठिर को मेरा आशीर्वाद दीजिएगा और अब यह बताइए कि आप ऐसा कौन सा संदेश लेकर आए हैं जिसे प्रिय युधिष्ठिर स्वयं ही आकर हमसे नहीं कह सकता था उन्होंने आपके चरण स्पर्श के लिए आने की आज्ञा ही मांगी है नरेश और कहवा है के पण के अनुसार 12 वर्षों का वनवास और एक वर्ष का ज्ञात वास वे पूरा कर चुके हैं अब यदि उनके ज्येष्ठ पिता श्री आज्ञा दे तो आकर वे आशीर्वाद के साथ अपना राज मुकुट भी ले जाए कैसा राज मुकुट पुरोहित उनके अज्ञातवास को स्वयं मैंने विराट में भंग कर दिया था और उसी के आनंद में युद्ध हार गया था जाकर उनसे कह दो पन के अनुसार उन्हे हमारे कहे बिना ही बाढ बरस के बनवास को स्वीकार कर लेना चाहिए था पांडवों को दूध भेजते लाज तक नहीं आई मेरे लिए क्या आज्ञा है [संगीत] राजन मुझे विचार करने दीजिए कि मैं अपने प्रिय अनुज पुत्र युधिष्ठिर के लिए अपने आशीर्वाद के अतिरिक्त और क्या भेजूं अज्ञातवास के विषय में कुछ उलझने कुछ गणित शास्त्री यह कहते हैं कि विराट युद्ध से पहले अज्ञातवास समाप्त हो गया और कुछ गणित शास्त्री यह कहते हैं कि समाप्त नहीं हुआ था गंगापुत्र भीष्म और कुलगुरु कृपाचार्य क्या कहते हैं तुम होते कौन है प्रश्न करने वाले तुम केवल दूत हो और प्रश्न करना दूत की मर्यादा नहीं है जो आयु और ज्ञान दोनों ही में तुमसे बड़ा हो उसे तुम कहकर संबोधित करना भरत वंश के छोटों की मर्यादा नहीं है पुत्र दुर्योधन किसी दूत का अपमान करना किसी युवराज को शोभा नहीं देता और कोई जब पिता से कुछ कह रहा हो तो पुत्र का बीच में बोल पड़ना पुत्र की असभ्य सिद्ध करता है इसलिए स्थान ग्रहण करो अपना [संगीत] सभ्यता धरोहर में नहीं मिलती गंगापुत्र आप बड़े भाग्यशाली है राज पुरोहित कि आप एक ब्राह्मण भी है और दूत भी यदि ना होते तो युवराज दुर्योधन का यूं अपमान करने पर दंड पाते जाइए और जाकर सम्राट युधिष्ठिर से कहिए कि वह अभी 12 बरस के वनवास पर चला जाए उसके समाप्ति के पश्चात देखा जाएगा यह बड़े आश्चर्य का विषय है राजन कि आपकी राजसभा में केवल आप ही नहीं बोलते शेष सभी लोगों को बोलने का अधिकार है मैं इंद्रप्रस्थ नरेश युधिष्ठिर की ओर से यह वचन देता हूं कि यदि गंगापुत्र भीष्म आचार्य द्रोण कृपाचार्य महात्मा विदुर इनमें से कोई एक भी यह कह दे कि विराट युद्ध में अर्जुन और दुर्योधन का सामना होने से पहले उनका अज्ञातवास समाप्त नहीं हुआ था तो पांडव 12 वर्ष का वनवास फिर स्वीकार करेंगे कुल गुरु कृपाचार्य आपके उत्तर पर इसका आधार है कि शांति रहेगी या युद्ध होगा चंद्र और सौर दोनों की गणनाए यह कहती है कि पांडवों का अज्ञातवास विराट युद्ध में युवराज और कुंती पुत्र अर्जुन का सामना होने से पहले ही समाप्त हो चुका था कुलगुरु जिस थाली में खाते हो उसी में छेद मत करो चंद्र और सौर गणनाए कुछ भी कहती हो परंतु मैं गांधार पुत्र दुर्योधन यह कहता हूं कि पांडवों का ज्ञात वास भंग हो चुका था और जो मैं कहता हूं वही सत्य है तो क्या मैं महाराज युधिष्ठिर के पास उनके संदेश के उत्तर में हस्तिनापुर का यही सत्य असत्य ले जाऊ महाराज नहीं नहीं आप प्रिय युधिष्ठिर से कहिए का कि मैं शीघ्र ही अपने किसी दूत द्वारा अपना प्रस्ताव भेजूंगा भारत महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत [संगीत]
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