महाभारत महारथी महावीर सुदर्शन चक्रधारी मधुसूदन शांति दूत वासुदेव श्री कृष्ण पधार रहे हैं [संगीत] शांति दूध का प्रणाम स्वीकार कीजिए महाराज हे वासुदेव स्थान ग्रहण करके मेरी राज्यसभा का मान बढ़ाइए स्थान ग्रहण कीजिए के वास्ते प्रणाम पिता म विराजी विराज ता श्री हे वासुदेव अब यह बताइए कि आप मेरे अनुज पुत्रों की ओर से क्या प्रस्ताव लाए हैं हे महाराज गंगापुत्र भीष्म को प्रणाम करने के उपरांत मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि मैं किसी की ओर से कोई प्रस्ताव लेकर नहीं आया हूं मैं तो स्वयं अपनी ओर से आया हूं और अपना ही प्रस्ताव लाया हूं परंतु यह विश्वास अवश्य दिलाता हूं कि जो कुछ मैं स्वीकार कर लूंगा उसे स्वीकार करने में पांडव संकोच नहीं करेंगे हे महाराज आप तो स्वयं ज्ञानी हैं और जानते हैं कि शांति कोई प्रस्ताव नहीं जिस पर वाद विवाद चले शांति एक आवश्यकता है युद्ध में पराजय तो एक ही की होती है किंतु दोनों ही ओर से लड़ने वाले योद्धा वीरगति को प्राप्त होते हैं इस राजसभा में गंगापुत्र भीष्म जैसे ज्ञानी और महात्मा उपस्थित हैं कृप और द्रोण जैसे आचार्य विराजमान है योद्धाओं की जो भीड़ इस राजसभा में है वह आज कदाचित संसार की किसी और राजसभा में नहीं है और इसीलिए इस राजसभा का दायित्व भी सबसे अधिक है यदि युद्ध हुआ तो महात्माओं और योद्धाओं का यह जमघट निसंदेह ही बिखर जाएगा महाराज राज निसंदेह ही बिखर जाएगा हे महाराज यदि ऐसा हुआ तो इतिहास उन सारे आंसुओं का उत्तरदाई आपको ठहराए जो इस महायुद्ध के उपरांत बहाए जाएंगे हे नरेश आप भरत के वंशज हैं आपके पास धर्म की धरोहर है मर्यादाओं का निक्षेप है इतिहास की थाती है आप न्यास धारी हैं और आप जैसे न्यास धारी के होते न्यास का अभंग नहीं होना चाहिए महाराज न्यास का अभंग नहीं होना चाहिए और इसीलिए हे धर्म ध्वज रक्षक मैं जो कहने जा रहा हूं उसे ध्यान से सुनिए शांति कभी असंभव नहीं हो सकती और इसीलिए कुरुवंश को शांति के मार्ग पर ले चलिए महाराज शांति के मार्ग पर ले चलिए के इसी में भरत वंश भारतवर्ष और सारे संसार की भलाई है इतिहास गंधार नरेश शकुनी से यह नहीं पूछेगा कि इन्होंने द्यूत क्रीड़ा में कपट क्यों किया था क्योंकि वह कपट आपकी सभा में हुआ था महाराज इतिहास युवराज दुर्योधन से भी यह नहीं पूछेगा कि इन्होने भरत कुल वधु को भरी सभा में क्यों घसीट बुलवाया इतिहास यह भी आप ही से पूछेगा महाराज क्योंकि दुर्योधन आपके युवराज है इतिहास दुशासन से ये नहीं पूछेगा कि इन्होंने दुर्योधन के कहने पर भरत कुल वधु द्रौपदी का वस्त्र हरण करने की सभ्यता क्यों दिखाई इतिहास इसके लिए भी आप ही को दोषी आप ही को उत्तरदाई ठहराए महाराज आप ही को उत्तरदाई ठहराए इसलिए यह जान लीजिए कि शांति का कोई विकल्प नहीं है युद्ध तो कदाचित कोई नहीं चाहता केशव यदि कोई युद्ध नहीं चाहता पितामह तो फिर यह कदाचित क्यों यह तो आप भी जानते हैं पितामह और मैं भी कि युद्ध चाहने वाले इधर भी है और उधर भी इसलिए आज कदाचित जैसे शब्दों को इस राज्यसभा से निकाल दीजिए पितामह क्योंकि कदाचित जैसे शब्दों की छाया में शांति की बात नहीं हो सकती हे पिता म समझाइए अपने नरेश को कि यदि कौरवों और पांडवों में मिलाप हो जाए तो यह सारा संसार उनका हो सकता है उनकी राज्य सीमा के अतिरिक्त और कोई सीमा रह ही नहीं जाएगी किंतु जो युद्ध हुआ महाराज तो आपके पास कुछ नहीं रह जाएगा ना पुत्र और ना ही अनुज पुत्र क्या पता आपको किसकिस के शव पर रोना पड़े महाराज किस किस के शव पर रोना पड़े क्या आपके पास आपके अनुज पुत्रों में से किसी का शव आए महाराज तो क्या आप उसे शत्रु का शव मानकर किसी प्रकार का आनंद अनुभव कर पाएंगे हे वृद्ध नरेश इससे पहले कि आप प्राण त्यागे कुल को एकत्र कीजिए नरेश कुल को एकत्र कीजिए पांडव आपके स्नेह की छाया में पले बढ़े हैं आपके स्नेह और आशीर्वाद पर आज भी उनका उतना ही अधिकार होना चाहिए इसलिए धर्म ध्वज रक्षक इंद्र प्रस्थ उन्हें लौटा [संगीत] दीजिए वासुदेव मुझे यह शांति प्रस्ताव स्वीकार नहीं है सोच तो लेते पुत्र इसमें सोचना क्या है पिता मा अण के अनुसार उन्हें 12 बरस के बनवास को स्वीकार कर लेना चाहिए था और वे राज मांग रहे हैं अपनी नात की आंच को धीमी करो दुर्योधन धीमी करो जैसे कुल्हाड़ी वृक्ष को काट कर गिरा देती है वैसे ही व्यक्ति का कपट कुल्हाड़ी बनकर स्वयं उसे काट डालता है और यह भी देखो व वासुदेव मित्र की भाषा बोल रहे हैं और मित्र की भाषा यह कह रही थी कि मैं अपना आधा राज उन्हे दे दू यदि यह मित्रता है तो मुझे शत्रुता की परिभाषा समझाइए पितामह शत्रु वो युवराज जो किसी योद्धा को किसी अनुचित युद्ध के लिए भड़का है जो कुछ भी वासुदेव ने कहा वही धर्म है इंद्र प्रस्थ तो मैं कभी नहीं दूंगा कुलगुरु हां यदि वासुदेव के पास कोई और प्रस्ताव हो तो मैं उस पर विचार कर सकता हूं आप लोग दुर्योधन के शुभ चिंतक है इन्हें समझाइए क्योंकि भरत वंश के भविष्य को इस नासमझ योद्धा की महत्वाकांक्षा पर बली नहीं चढ़ाया जा सकता और यदि प्रस्ताव ही का प्रश्न है युवराज तो मेरे पास एक और प्रस्ताव भी है यदि दुर्योधन इंद्रप्रस्थ रखना चाहे महाराज तो अवश्य रख ले मैं पांडवों की ओर से पांच गांव मांग रहा हूं अव स्थल वरका स्थल मकां वारणा वत और एक और कोई गांव केवल पांच गांव हे नरेश यदि आप यह पांच गांव भी दे दें तो पांडव उन्हें पाकर संतुष्ट हो जाएंगे पांच गांव और वह भी उन पांडवों को मैं उन पांडवों को सई की नोक जितनी भूमि भी नहीं [संगीत] दूंगा हे दुर्योधन अपनी माता श्री शिव भक्ति नी गांधारी को अपने शव पर विलाप करने लिए क्यों आमंत्रित कर रहे हो वासुदेव यदि तुम दूत रहे होते तो तुम्हारे यह कहने परन इन्ह बोलने दीजिए पितामह बोलने दीजिए यदि मैं दूत ना होता तो क्या कर लेते युवराज यू मेरी माता श्री की बात करने पर मैं तुम्हारी जी खच लेता और और तुम्ह बंदी बनाकर काराग में डाल देता राजदूत को बंदी बनाओगे युवराज उस अतिथि को बंदी बनाओगे जिसके स्वागत के लिए कुरु श्रेष्ठ गंगापुत्र भीष्म और आचार्य श्रेष्ठ द्रोण और कृप गए थे हे अहंकारी दुर्योधन यदि हमें बंदी बना सकते हो तो अवश्य प्रयत्न करके देख [संगीत] लो सैनिक इस ग्वाले को बंदी बना लो अरे मूर्ख क्या कर रहा [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] है [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [संगीत] विश्वर रूप दिखला रहे विश्वम भर भगवान आंखें जिनके पास हो ले इनको पहचान ले इनको पहचान महाभारत महाभारत महा भार महा भार [संगीत]
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