[संगीत] महाभारत वासुदेव इतना दुख करने का कोई कारण नहीं है पार्थ द्रौपदी वस्त्र हरण सभ्यता का वस्त्रहरण था संस्कृति का वस्त्रहरण था मर्यादा का वस् रण था इसलिए यह दुख अकेले तुम्हारा या तुम पांच पांडव भाइयों ही का दुख नहीं है यह दुख तो है भूत वर्तमान और भविष्य का सारी मानव जाति का मानव जाति के समुद्र में तुम तो केवल एक बूंद हो पार्थ केवल एक बूंद और कोई बूंद सागर के दायित्व का बोझ नहीं उठा सकती वह चाहे दुख हो या सुख अपने भाग से अधिक नहीं लेना चाहिए पार्थ इस भीष्म अपमान में मेरा जो भाग है वासुदेव व भी इतना भारी है कि यदि किसी पर्वत पर रख दू तो उसकी कमर टूट जाए और आप कहते हैं कि इतना दुखी होने का कोई कारण नहीं इस अपमान का काटा मेरे हृदय में अटक गया है वासुदेव जो मुझे ना सोने देता है ना जागने देता है और बड़े भैया युद्ध की आज्ञा भी नहीं देते व प्रश्चित कर रहे हैं वासुदेव प्रश्चित उन्हें प्रायश्चित करना भी चाहिए जेष्ठ भ्राता होने का अर्थ क्या यह है कि वे तुम सबको दाव पर लगा द उन्होंने जो कुछ दांव पर लगाया उसमें से कुछ भी केवल उनका नहीं था राज्याभिषेक ने संदेह उनका हुआ किंतु खांडव प्रस्थ को इंद्रप्रस्थ बनाने में तुम सबके परिश्रम का हाथ है राजसूय यज्ञ निसंदेह उनका हुआ परंतु उस यज्ञ का हवन कुंड तुम चारों हो इसलिए उस राज मुकुट को दांव पर लगाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं था अब बची द्रौपदी तो वो यदि अकेले उनकी पत्नी रही होती तब भी उसे दांव पर लगाने का उन्हें कोई अधिकार ना था पत्नी संपत्ति नहीं होती पार्थ जीवन की भागीदार नहीं होती है इसलिए उन्हें प्रायश्चित तो करना ही चाहिए और तुम सबको भी युद्ध के लिए व्याकुल होने का कोई अधिकार नहीं क्योंकि जब भ्राता युधिष्ठिर मर्यादा का उल्लंघन कर रहे थे तो तुम सबका यह कर्तव्य था कि उनका विरोध करते परंतु यह विरोध द्रौपदी के अतिरिक्त किसी ने नहीं किया किसी ने नहीं इसलिए अपमान के इस विष को पीते रहो कि यही तुम्हारा प्रायश्चित है कोई तो सीमा होगी वासुदेव कोई तो सीमा होगी जिसके आगे हमें यह विष नहीं पीना पड़ेगा मैंने करण को मृत्यु दंड देने की प्रतिज्ञा ली है मजले भैया ने दुर्योधन की जंगा तोड़ने और दुशासन के लह पंचाली के खुले केने की प्रतिज्ञा लिए है इन प्रतिज्ञा का क्या होगा वासुदेव क्या इतिहास हमें प्रतिज्ञा ना पूरी करने वाले कायरो की भीड़ में खड़ा करने वाला है वासुदेव बोलो वासुदेव बो अभी भविष्य की चिंता ना करो अभी केवल अपने वर्तमान के विषय में सोचो दुर्योधन दुशासन शकुनी और कण के लहू पर का अधिकार सिद्ध है पार्थ यह सब तो धरती के ऋणी है भूमि इनका लहू अवश्य पिएगोन पहल करने दो युद्ध तो केवल तब होगा जब शांति के सारे मार्ग बंद हो चुके होंगे सारे मार्ग यह ना भूलो पार्थ कि मैं तुम में हूं और तुम मुझ में जो कुछ मेरा है वह सब तुम्हारा भी है तुम्हारा शत्रु मेरा शत्रु और तुम्हारा मित्र मेरा मित्र तुम नर हो पार्थ और मैं नारायण और इसीलिए पलट पलट कर पीछे देखना ना तुम्हें शोभा देता है और ना मुझे यदि तुम चाहो भी कि द्रौपदी वस्त्र हरण ना हो तब भी इस विषय में तुम कुछ नहीं कर सकते पार्थ क्योंकि यह घटना तो घट चुकी है अपने इस अपमान के विष को मथ पार्थ मथ और भविष्य के लिए इस विष के कलश से अमृत काटो तो क्या केवल प्रतीक्षा करूं वासुदेव नहीं तैयारी करो दिव्यास्त्र इकट्ठा करो पार्थ दिव्यास्त्र महादेव को प्रसन्न करो महाभारत महाभारत महाभारत [संगीत] महाभारत महाभारत
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