Monday, 5 January 2026

श्री कृष्ण की मुरली से तुलसी का ध्यान कैसे भटका Hitanshu VighnahartaGanesh Episode 718 PenBhakti

गणेश जी मैंने अपना कर्तव्य पूर्ण किया राजा दम और उनकी पत्नी को विष्णु देव के वरदान स्वरूप पुत्र की प्राप्ति हुई तो राजा मोर ध्वज एवं उनकी पत्नी को पुत्री की न संबंध नए जन्म के साथ तुलसी और सुदामा की नई यात्रा आरंभ हो चुकी है अब आपको तुलसी को पौधे के रूप में जन्म लेने हेतु मार्ग प्रशस्त करना होगा पूर्व में जब मैं आया था तब आपने कहा तुलसी एक ऐसे पवित्र पौधे के रूप में जन्म लेगी जिनकी पूजा हर आंगन में होगी किंतु उनका जन्म तो एक चंचल बालिका के रूप में हुआ है प्रभु देखिए जो आपकी भक्त भी [संगीत] है [संगीत] [प्रशंसा] ओम नमो भगवते वासुदेवाय [संगीत] [प्रशंसा] नमः पुत्री प्रभु का यही स्थान है उन्हें कहां लेकर जा रही हो तुम नहीं प्रभु तो मेरे हैं उनका स्थान और कहीं नहीं मेरे साथ ही है और वह मेरे साथ ही रहेंगे सदा सदा के [संगीत] लिए उचित कहा था ना मैंने प्रभु अत्यंत चंचल बालिका है वो अब ऐसी चंचल बालिका एक पौधे का रूप कैसे धारण करेगी प्रभु देवर्ष समय की धारा इस जीवन को उस पड़ाव पर भी ले जाएगी कदाचित आप भूल रहे हैं मैंने भी यही कहा था अभी और भी श्राप शेश अभी और भी श्राप शेष मैं बड़ी हो जाऊंगी ना पिताश्री तो इन प्रभु की प्रतिमा को भी अपने साथ अपने कक्ष में ले [संगीत] जाऊंगी पुत्री मैं प्रभु की पूजा के लिए कमल पुष्प लेने जा रहा हूं इतने समय में तुम प्रभु की प्रतिमा लेकर मत चली जाना नहीं पिता श्री मैं इ क्यों लेकर जाऊंगी एक दिन ना स्वयं प्रभु मेरे पास [संगीत] आएंगे मेरा तो सर्वस्व प्रभु कोवर है मेरे मन मंदिर उन्ही की मूरत है पिताश्री क्यों ना ऐसा करें आप यही रुककर पूजा की तैयारी कीजिए और मैं जाकर कमल पुष्प ले आती हूं परंतु वहा जाकर तुम को जाग उठी तो तुम कमल पुष्प लाना भूलो गी तो नहीं नहीं नहीं पिताश्री मैं शीघ्र ही लौट [संगीत] आऊंगी कितनी चंचल है हमारी पुत्री महाराज विवाह योग्य हो गई है किंतु इसके चंचल स्वभाव में लेश मात्र की कमी नहीं आई है और विवाह की बात करो तो स्वप्न यह देखती है कि स्वयं श्री प्रभु नारायण अपने श्री परम कृष्ण के अवतार में आकर इससे विवाह करेंगे अब तो यह प्रभु श्री परम कृष्ण ही जाने कि इसका वर कौन [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] बनेगा इतने सारे कमल पुष्प है इस जलाशय में अब कुछ भी हो जाए मैं ना भूलूंगी ना [संगीत] भूंगी [संगीत] मयूर कितना सुंदर मयूर है ये मेरे [संगीत] प्रभु [संगीत] मेरे प्रभु प्रभु श्री कृष्ण है [संगीत] य [संगीत] आ [संगीत] [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] म [प्रशंसा] यह मोर पंख में लगाती हूं यहां और यह लगाती हूं [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] यहां मेरे प्रभु अब और भी सुंदर लगने लग गए ना [संगीत] अद्भुत है ना अद्भुत [संगीत] पुष्प लाना फिर भूल गई ना मुझे क्षमा कर दीजिए पिताश्री वो क्या है ना मुझे प्रभु के प्रिय मोर पंख दिखाई दिए फिर मैं स्वयं को कैसे रोक सकती थी तो उन्हें आ मेरी प्रिय पुत्री तुलसी चंचल स्वभाव की अधिकता भ्रमित कर देती है लक्ष्य से भटकने पर विवश कर देती है नाम जपती हो प्रभु श्री परम कृष्ण का और मन में वास करती है चंचलता जो तुम्ह सदा अनुचित करवाएगी और तुमने तो इतना बड़ा लक्ष सोच रखा है स्वयं प्रभु को पाने का [संगीत] प्रणाम पिता श्री पुत्र शंखचूड़ तुम तो बाल्यकाल से ही अस्त्र शस्त्र का अभ्यास कर रहे हो किंतु मात्र अस्त्र शस्त्र ही तुम्हें विजय नहीं बनाएंगे जब लक्ष्य बड़ा हो तो छोटा नहीं सोचना चाहिए और लक्ष्य तक पहुंचने से पहले रुकना भी नहीं चाहिए तुम्हें तो त्रिलोक विजेता बनना है उसके लिए तुम्हें असीम बल अनंत ज्ञान और एक बड़ा वरदान चाहिए जिससे तुम देवताओं के अस्त्रों से ही नहीं स्वयं त्रिदेव से भी सुरक्षित रहोगे उचित है पिताश्री उसके लिए मुझे क्या करना होगा तुम्हें अपने मन को बहुत स्थिर रखना होगा पुत्र अन्यथा अपने चंचल स्वभाव के कारण तुम इस लक्ष्य को कभी भी प्राप्त नहीं कर पाओगी [संगीत] तो मैं क्या करू पिताश्री तो मैं क्या करू पिताश्री अपने चंचल मन चंचल स्वभाव को कैसे निय करके अपने लक्ष्य पर एकाग्र रह तप से त से क्योंकि तप ही एक ऐसा मार्ग है जिस पर चलकर मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है देखो पुत्र अब तुम्हारा पुण्य स्थल पुष्कर की यात्रा करने का समय आ गया है वहां जाओ और वहां जाकर ब्रह्मदेव की तपस्या करो और मनोवांछित वरदान प्राप्त करो पुत्र यदि तुम वास्तव में प्रभु को अपने वर के रूप में पाना चाहती हो तो तुम्ह ने चंचल स्वभाव का त्याग कर मां गंगा के पावन तट पर जाकर प्रभु श्री हरि नारायण की उपासना [संगीत] [संगीत] करो [संगीत] ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओम ओ [संगीत] ओ तब तक उसका तप निरंतर चलता रहेगा जब तक उसके विवाह का मार्ग ना खोल जाए ओ ओ ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय [संगीत] [संगीत] नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो [संगीत] नमः [संगीत] मन में बाद करती है चंचलता जो तुमसे सदा अनुचित ही करवाई अभी एक मुख्य श्राप तो शेष है ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय नम यदि इसका तप सफल हुआ तो य अजय हो जाएगा और इसे रोकना भी असंभव हो जाएगा ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः नारायण नारायण कहीं इनकी चंचलता पुन इनसे कोई भूल तो नहीं करवाने वाली ओ ओ देखना यह है कि इसका तप सफल हो पाता है या नहीं ओम ब्रम देवाय नम ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः चंचलता त्याग कर एकाग्र रहकर तप करना होगा मुझे ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः नारायण नारायण मन की चंचलता पर नियंत्रण पाना इनके लिए सरल नहीं है इसीलिए अनेकों मुद्राओं के पश्चात भैरव मुद्रा में अब जाके स्थिर हुई है ओम नमो भगवते वासुदेवा अब कदाचित इनका तप सफल होने की संभावना है देवर्ष गोलोक के किसी भी वासी का जन्म यदि धर्ती पर हुआ है तो उसमें जगत का कल्याण ही छिपा है तुलसी के जन्म के पीछे भी धरती और धरती वासियों को विसूचिका जैसे संक्रमण से बचाने का महान उद्देश्य है और आज जो भी घटित होगा वो तुलसी के जन्म को सार्थक बनाने के साथ-साथ गणेश के विवाह का मार्ग प्रशस्त करने के लिए भी होगा ओम ओम ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो कुशल हो गया नारायण नारायण प्रभु अब मुझे भी आज्ञा दीजिए चलना चाहिए ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः ओम नमो भगवते वासुदेवाय नारायण नारायणम देवी तुलसी अचानक मुस्कुराने क्यों लगी है मेरे प्रभु आपकी वंशी की धुन सुन कर आप की तुलसी अन्य सब कुछ भूल जाती है बस फिर तो आप ही दिखाई देते हैं मुझे ओ ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः ओ ओम नमो भगवते वासुदेवाय कृष्णाय नमो नमः ओ नमो वासुदेवाय कृष्णाय नमो [संगीत] [प्रशंसा] नम कहीं देवी तुलसी का ध्यान तो नहीं भटक रहा [संगीत] [प्रशंसा] है अवश्य किसी दिव्य शक्ति का प्रभाव है इन पर [संगीत] [हंसी] [प्रशंसा] [संगीत] ओम सिद्धि बुद्धि सहित महा गणपत अदभुत दृश्य है किंतु कुछ स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा है कौन है वहा कौन है इस दिव्य ऊर्जा के स्त ब्रह रू पाया विष्णु रूप स्वरूपाय नमस्ते भम अदभुत है आपकी लीला अद्भुत है आपका परम ब्रह्म स्वरूप महा गणपत नम पुत्र गणेश का तप तो अपने चरम पर है इसीलिए उसने परम ब्रह्म स्वरूप धारण किया है समय आ गया है प्रिय पुत्र गणेश के तप के संपन्न होने का [प्रशंसा] ओ ओ ओ ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय नमः ओम ब्रह्म देवाय नम अब इसकी तपस्या मेरी चिंता का कारण बनती जा रही है ओम ब्रह्म देवाय नम [संगीत] ओ विन हता प्रथम पूज्य गणेश जी की तपस्या हमारे समस्त विघ्नों को दूर करेगी विघ्न हर्ता प्रथम पूज्य गणेश जी ने अपना पर ब्रह्म स्वरूप अकारण धारण नहीं किया आपको शत शत नमन प्रभु [संगीत] ओ परम कृष्ण देवी तुलसी की एकाग्रता का भंग होना उचित नहीं [संगीत] की मेरे प्रभु आपकी मुरली की ल आपके आदेश के समान है आप आदेश दे आप बुलाए मुझे और मैं ना आऊ यह कैसे संभव है और प्रभु मैं जानती आप आएंगे मेरे लिए आप अवश्य आएंगे आपकी उसका समोह उसका अदभुत आकर्षण मन करता है बस उसम रम जा बह जाओ खो जाओ क्या देवी तुलसी तो गणेश जी के निकट जा रही [संगीत] है गणेश अपने परम ब्रम स्वरूप में है त की ऊर्जा ने अदभुत दिव्य स्वरूप धारण कर लिया है अवश्य ही कुछ विशेष घटित होने वाला है ये कैसी चंचलता का प्रभाव है देवी तुलसी पर गणेश जी के तप स्थन की ओर क्यों बढ़ती जा रही [संगीत] [प्रशंसा] है मुझे आशंका है तुलसी जो कर रही है व उसे कहीं दंड का भाकी ना बना [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] देरे प्रभु मेरे परम कृष्ण मेरा मन तो कब से आप में ही रमा हुआ [संगीत] है मेरे प्रभु मेरे परम कृष्ण आपने मुझे दर्शन प्रदान कर धन्य कर दिया बाल्यकाल से आप ही की तो प्रतीक्षा कर रही हू प्रभु अब तो लगता है ये एक जन्म की नहीं जन्म जन्मांतर की प्रतीक्षा है [संगीत] प्रभ परम कृष्ण मोह में तुलसी यह क्या करती जा रही है कहीं उससे पुत्र गणेश का तप ना भंग हो जाए तो क्या मैं ही तुलसी को जाकर रोक द अनर्थ हो जाएगा देवी तुलसी को गणेश जी के क्रोध का भागी बनना पड़ जाए मुझे उने रोकना ही [संगीत] [संगीत] होगा रोक जाइए रुक जाइए देव नियति के विधान में बाधा मत डालिए स्मरण कीजिए मैंने क्या कहा था मेरी प्रत्येक इच्छा के पीछे एक बहुत बड़ा कारण छिपा होता है इसलिए होने को होने दीजिए प्रिय ओ ओ अद्भुत सर्वता अद्भुत [संगीत] आपको शतशत नमन [संगीत] प्रभु हे प्रभु यह कैसा अद्भुत रूप धारण किया है आपने अपने प्रभु के प्रति कैसी आस्था है तुलसी की कि गणेश के दर्शन होने पर भी उसे गणेश में भी श्री परम कृष्ण का ही आभास हो रहा है प्रभु आपका यह निराला रूप तो अत्यंत मनोहर है आपकी तुलसी आपको आपके इस रूप में देखकर और भी स्नेह सुधा से भर गई प्रभु यह तो मेरा परम सौभाग्य है जो आपके इस रूप के दर्शन करने का सुख पा रही वही कृष्ण रंग वही मोर मुकुट वही बंसी वही मुख का तेज हे परम ब्रह्म गणेश जी आपके दिव्य दर्शन प्रभु श्री कृष्ण रूप में पाकर हम धन्य हो गए प्रभु आपकी तुलसी तो आपको आपकी प्रत्येक रूप में पहचान देगी और आपकी और भागी चली आएगी फिर आप इस रूप में हो या किसी अन्य रूप में अब मेरी बरसों की प्रतीक्षा का अंत कीजिए आप अपनी इस तुलसी को अपने अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कीजिए ये क्या कह दिया तुलसी ने प्रभु कदाच वो पल आ ही गया जब मेरी कामना पूर्ण हो प्रभु मेरी गुहार सुन अपने नेत्र खोलो और मुझसे विवाह करो अपने तुलसी को अपना लीजिए अपना लीजिए मुझे ये क्या हो रहा है गणेश के नेत्र खुल गए उसका त भंग हो [संगीत] [प्रशंसा] गया आपने मेरी विनती सुन ली आपकी स्नेह पूर्ण दृष्टि से आपकी तुलसी धन्य हो गई अब आप अपने मुख से भी कह दीजिए कि आप मुझसे विवाह करले आप मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकारें विवाह यही चाहती है ना और इसके लिए आपने ना समय देखा ना कार्य देखा ना मेरी साधना देखी ना धीरज धरा अपनी इच्छा अपने स्वार्थ के लिए एक तपस्वी का तप भंग किया है आपने ये तो घोर उद्दंडता है उद्दंडता नहीं प्रभु आपकी तुलसी आपके साथ उद्दंडता की कल्पना भी नहीं कर सकती मेरे प्रभु श्री परम कृष्ण यह मेरी उदंड नहीं यह तो मेरा प्रेम है प्रभु मैं तो सदा से आपकी प्रेम मेरा भी अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती मुझे स्वीकार कीजिए स्वामी स्वीकार कीजिए मेरे प्रेम भरे आग्रह को प्रभु प्रेम नहीं देवी यह भ्रम है आपके मन का आपके आराध्य श्री परम कृष्ण और मैं एक तत्व अवश्य है किंतु फिर भी एक दूसरे से पृथक है भिन्न है किंतु प्रभु तत्व ही तो सत्य है जल हेम हो या वाष्प ता तो जाली है ना जब मुझे आप में मेरे प्रभु श्री परम कृष्ण दिखाई दे रहे हैं तो मैं आप में और उनमें क्या भेद करू नहीं देवी ये भ्रम ही है आपका एक तत्व होते हुए भी जल हिम और वाष्प के गुण भिन्न है क्या प्यास लगने पर आप वाष्प का पान कर सकती हैं क्या हिम से आप स्नान कर सकती है इसलिए तत्व एक है किंतु कारण भिन्न है आप उसम भेद ना कर सकी यही आपका भ्रम है जिसे मैं सर्वथा अस्वीकार करता हूं जिसे मैं सर्वथा अस्वीकार करता हूं नहीं प्रभु तुलसी का सरल प्रेम जो सत्य दिखा रहा है आप उसे क्यों नहीं मान रहे प्रभु आप ही मेरे परम कृष्ण है मेरे आराध्य भी और मेरे स्वामी भी इसलिए अब मेरी विनती को स्वीकार कीजिए प्रभु मेरा जीवन सार्थक कीजिए मुझसे विवाह कीजिए प्रभु विवाह की [संगीत] मुझसे देवी बार-बार एक ही भूल कर रही है आप मैं विवाह की कोई इच्छा नहीं रखता आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने का इच्छुक ह और आप मेरे स्पष्ट करने पर भी बारबार विवाह का प्रस्ताव रख रही है वो भी मेरी तपस्या भंग करने के पश्चात मेरा क्रोध मत जगाए देवी जाइए चली जाइए यहां से आपका यह उदंड आचरण कहीं आपको मेरे श्राप का भाग ही ना बना दे इसलिए आपसे पुनः आग्रह करता हूं चली जाइए यहां से इसके पहले कि मैं आपको श्राप दे दूं अभी तक जो हुआ को आधार देने के लिए अभी एक मुख्य श्राप तो शेष है प्रभु जब से चेतना पाई तब से प्रभु श्री परम कृष्ण के प्रति समर्पण का भाव है मेरे मन में सदा से उन्हीं को पूछती आई हूं प्रभु मेरी भूर भी उन्ही के नाम से होती है और मेरी संध्या में भी मेरे मन में मेरी जिव पर उन्ही का नाम है प्रभु उन्ही को पाने की इच्छा से सारे सुखों को त्याग कर मैं यहां तपस्या करने आई हूं प्रभु क्या इसीलिए कि जब मैं आपके निकट पहुच तो आप ब्रह्मचर्य की इच्छा का कारण बता मुझे ठुकरा मेरे विवाह प्रस्ताव को निता से अस्वीकार कर नहीं प्रभु मेरा प्रेम सरल अवश्य है किंतु इस प्रकार आपके द्वारा अपमान की योग्य नहीं आप क्या श्राप देंगे मुझे मेरे पावन प्रेम मेरे अतुलित स्नेह मेरे संपूर्ण समर्पण का अपमान करने के लिए मैं शाप दूंगी आपको मैं शाप दूंगी आपको यदि मेरा कृष्ण प्रेम सत्य है यदि प्रभु के लिए मेरी श्रद्धा मेरी भक्ति सच्ची है तो आपको केवल अपना ब्रह्मचर्य ही भंग नहीं करना होगा अी तो एक नहीं दो विवाह करने होंगे ये श्राप है तुलसी का दो विवाह करने होंगे य श्राप है तुलसी का [संगीत] मन की चंचलता व्यक्ति को लक्ष्य से दूर ले जाती है और मन की स्थिरता सदैव लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करती है

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