[संगीत] महाभारत प्रणाम प्रणाम युवराज आहा आज मेरी बहन बड़ी प्रसन्न दिखाई दे रही है भैया आइए युवराज विराजी अब तो यह भेष छोड़िए तात बड़े भैया की आज्ञा के अनुसार हम लोग कल अपने भेष में आएंगे और महाराज से जाने की आज्ञा भी लेंगे कल कल क्यों आज क्यों नहीं हम लोग बड़े भैया से प्रश्न नहीं करते कुमार हम लोग तो केवल उनकी आज्ञा का पालन करते हैं और उनकी आज्ञा पालन का दंड भी झेलते हैं जिसे तुम दंड कह रहे हो कुमार वह पारितोषिक भी तो हो सकता है अब हम जन समुदाय से पूरे विश्वास सहित कह सकते हैं कि द्यूत एक सम्मान लेवा रोग है कि दूत मर्यादाओं को आत्महत्या की सीमा तक ले जा सकता है कि दूत भाइयों और पत्नी को व्यक्ति से वस्तु बना सकता है अपनी इस यात्रा से हम जन समुदाय के लिए यह उपहार लेकर इंद्र प्रस्थ लौटेंगे इसलिए यदि ध्यान से देखो तो यह सता महंगा नहीं है इसलिए हे महायोद्धा उत्तर उनकी आलोचना ना करो उनकी आलोचना के लिए तो ऋषियों मषि हों के मुंह छोटे पड़ जाते हैं और छोटे मुंह को बड़ी बात शुभा नहीं देती मैं क्षमा चाहता हूं तनिक ध्यान दो कुमार कि यदि मैं अकेला समूची कुरु सेना को पराजित कर सका तो यदि हम पांचों भाई धनुष उठा लेते तो कौन सी सेना हमारे सामने टिक सकती थी यह जानते हुए भी गंधार नरेश ने हमारे साथ कपट किया है हमने अपनी हार को स्वीकार किया क्योंकि नारायण के अतिरिक्त कोई भी ऐसा नहीं जिसे कभी ना कभी पराजय का सामना ना करना पड़े तो हमने पराजय का स्वाद चखा पराजय बहुत कड़वी होती है युवराज बहुत कड़वी आत्म सम्मान की जीप इसकी कड़वाहट में ऐट जाती है अर्जुन को ब्रह नला बना देती है भीम को रसोया बना देती है धर्मराज सम्राट युधिस्टर को कंग बना देती है और द्रौपदी जैसी रानी को सर्री इसलिए तुमसे जो हार जाए ना कुमार उसका कभी अपमान ना करना क्योंकि युद्ध में हारने वाला भी आदरणीय होता है जबी तो कह रहा हूं द्रोण शिष्य कि आप सबका यहां बड़ा अपमान हुआ है कंग समझकर पिता श्री ने धर्मराज महात्मा युधिष्ठिर को घुड़का भी दिया होगा सरेंद्र समझकर माता श्री ने महारानी द्रौपदी का अपमान भी किया होगा उन्हें दासी समझकर मेरे मामा कीचक ने उन्हें अपनी वास की दलदल में घसीट का प्रयत्न तो कर ही डाला था आप इस राज परिवार और इस राज्य को क्षमा कर दीजिए जिस राज्य में हमें आश्रय मिला हो कुमार वह राज्य हमारे लिए सदैव आदरणीय रहेगा परंतु तुम राजा बनने वाले हो इसलिए समझो कि एक दासी भी नारी होती और आत्म सम्मान पर किसी दासी का किसी महारानी से अधिकार कम नहीं होता दास या दासी होना तो केवल दुर्भाग्य है तो किसी को केवल उसके दुर्भाग्य के लिए तिरस्कृत करना स्वयं विधाता का तिरस्कार करना है इसलिए अपने दास और दसियों के साथ सदैव अच्छा व्यवहार रखो कि तुम यह क्या जानो कि आज जो दास है वो कल कौन था भगवान करें तुम्हें कभी वो दिन ना देखने पड़े जो हमें देखने पड़े महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत हो महाभारत [संगीत]
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