[संगीत] महा [संगीत] भारत अर्जुन यह तो अर्जुन का देव श है मित्र इसका अर्थ यह है कि हमने इनके अज्ञातवास को भंग कर दिया है बधाई हो मित्र बधाई हो सारथी रथ लेकर पितामह की ओर [संगीत] चलो हे पितावा हे गुरु द्रोण हे कुल गुरु कृपाचार्य आप सबने की प्रत्यंचा ध्वनि तो अवश्य ही पहचान ली होगी और उस शंख के नाथ को भी अवश्य ही सुना होगा इसलिए मैं आपसे एक बात कहने जा रहा हूं जो मैं पहले भी कई बार कह चुका हूं दूत का पण बंद यही था कि यदि अज्ञातवास भंग होगा तो 12 वरस का बनवास फिर से आरंभ हो जाएगा हां पुत्र मुझे वह अशुभ दिन विस्तार से याद है तो फिर आप तीनों साक्षी हैं कि मैंने पांडवों के अज्ञातवास को भंग कर दिया है पितामह आप हम दोनों के बड़े हैं अपने रथ को आगे बढ़ाइए और जाकर अर्जुन का आदेश दीजिए कि वह अपने भाइयों के साथ 12 बरस के दूसरे बनवास को जाने की तैयारी करें पुत्र हम यहां मत्स देश को जीतने आए थे या तुम्हारे भाइयों का अज्ञातवास भंग करने तो क्या मैंने अर्जुन से यह कहा था कि वो मत नरेश की रक्षा करने की धुन में यह भूल जाए कि अभी अज्ञात वास का वर्ष पूरा नहीं हुआ संभवत उन्हें वनवास भाग है और यही कारण है कि वे स्वयं ही उसे भंग करना चाहते हैं अंगराज कर्ण यह एक परिवार की समस्या है इसमें ना मेरा बोलना उचित है और ना तुम्हारा मैं तो फिर भी दोनों का गुरु हूं परंतु तुम तुम तो बाहर वाले हो अपनी जीभ से व्यंग की प्रतिंजा उतार लो गुरुओं के इतिहास में आप जैसा गुरु कदाचित ही मिले जो सबके सामने और सदैव एक शिष्य के पक्ष में है और दूसरे शिष्य के विरोध में रथ पहले वाले स्थान पर ले लो सारथी यहां तो घर वालों का वाद विवाद चल रहा है अपने बड़ों का आदर करना सीखो अंगराज कण सभी लोग तुम्हें अर्ध रथी कहते हैं पर मैं तुम्हें महारथी मानता हूं पर अभी अभी जिस व्यक्ति से तुमने असभ्य स्वर में असभ्य बात कही है तुम उसके धनुष पर प्रत्यंचा भी नहीं चढ़ा सकते गुरु परशुराम के अतिरिक्त आज पूरे संसार भर में इनसे बात करने योग कोई नहीं है इसलिए अपना स्थान पहचानो और अपने स्थान पर जाओ पितामह यदि आपके अतिरिक्त किसी और ने मेरे मित्र का ऐसा अपमान किया होता तो आप ही की सौगंध आज उसका रथ रिक्त हो गया होता वो अपने रथ पर ना होता और मैंने उसका शफ काटक धरती पर फेंक दिया होता मैं तुमसे क्षमा चाहता हूं मित्र और प्रार्थना करता हूं कि यहीं मेरे साथ खड़े रहो अंगराज कण तुम जिस दिन सत्य का वाण सहन करना सीख जाओगे उसी दिन मरथी हो जाओगे आचार्य द्रोण ने ठीक ही कहा था यह कुरु परिवार की समस्या है और तुम इस परिवार के नहीं हो युवराज तुम्हें अंगराज तो बना सकते थे किंतु वे तुम्हें गुरु वंशज नहीं बना सकते यह क्रोध जो भी कोई वीर पीले अंगराज अमृत समान हो इसीलिए प्रिय दुर्योधन तुम भी गंगापुत्र से क्षमा मांगो य किस किस अपराध के लिए क्षमा मांगेगा आचार्य मैं तो उस दिन से डर रहा हूं जब इसे क्षमा करते करते मेरी झोली रिक्त हो जाएगी मैं क्षमा चाहता हूं पितामह परंतु मैं विवश हूं मुझसे मेरे क्रोध का अश्व सदा नहीं जाता कहीं ऐसा ना हो पुत्र कि जब यह अश्व सद जाए तो तुम यह देखो कि तुम अश्वर रोहण करने के योग्य ही नहीं रहे व वह दिन देखने के लिए जीवित नहीं रहना चाहता पुत्र इसलिए मेरा कहा मानो सेना को लेकर हस्तिनापुर की ओर लौट चलो लौट चलो पुत्र लौट चलो चाहे युद्ध हो या द्यूत कपट नहीं करना चाहिए पुत्र जब चौसर का अंतिम दाम लगा था तो मैं वहा था पुत्र और तब यह नहीं ठहरी थी कि तुम अपने गुप्त चर को लेकर पांडु पुत्रों के अज्ञातवास को भंग करने का प्रयत्न भी करोगे यह विवाद यहां से विजय लौटने को उपरांत कर लेंगे पितामह अभी तो इस क्षण का सत्य यह है उनका अज्ञातवास भंग हो चुका है और उन्ह 12 बरस के बनवास को स्वीकार करना ही पड़ेगा केवल मत सेना से युद्ध करने की बात करो पुत्र अज्ञातवास की बात करो गणित के अनुसार पांडवों का अज्ञातवास समाप्त हो चुका [हंसी] है यूं हसने के लिए क्षमा चाहता हूं पितामह किंतु आप गणित भूल चुके हैं भारतवर्ष के सारे गणिता चार्य को एकत्रित करो और उनसे पूछो की गणित मैं भूला हूं य तुम्हारी ईर्ष को गणित आती ही नहीं आपके संतोष के लिए यह भी कर लूंगा पितामह किंतु आप मेरे साथ युद्ध करने आए हैं तो युद्ध कीजिए यदि पराजय के लिए युद्ध करना चाहते हो युवराज तो अवश्य करो क्योंकि जिस अर्जुन ने अकेले ही अग्नि पराभूत कर लिया हो उसका यह सेना क्या बिगाड़ सकती हस्तिनापुर के आचार्यों का तो ढंग ही निराला है वहां के गुरु युद्ध भूमि में अपने शिष्यों का साहस बढ़ाने के स्थान पर शत्रु की वीरता के बखान से उनका साहस घटाने का प्रयत्न करते हैं सामने यदि अर्जुन है तो होने दीजिए मैं आपको वचन देता हूं कि जैसे गरुड़ भूमि से सर्प को उठा लेता है वैसे ही मैं अर्जुन को उसके रत से उठा लूंगा यदि आप अर्जुन का सामना करते डरते हैं तो मुझे आज्ञा दीजिए अंगराज अपने अहंकार के रथ के लिए कोई योग्य सर्थी खोजो तुम अपने सारे शरीर में घी लगाकर और कौश वस्त्र पहनकर भकते हुए अग्निकुंड में क्यों फलाना चाहते हो अर्जुन एक अग्निकुंड है अंगराज और तुम कौशिक का एक लच्छा तुम्हे अपने भस्म होने के समय का अनुभव भी नहीं मिलेगा नदी की मछली भी तैरने में निपुण होती है मगर वो तैर कर सागर को पार तो नहीं कर सकती और यह भी ना भूलो कि आज अर्जुन ने उस अपमान का कवच भी पहन रखा होगा जो 13 वर्ष पहले कुरु राज्य सभा में किया गया था तुम्हारे पाण उस कवच को नहीं बेच सकते [संगीत] भारतत महाभारत महाभारत [संगीत]
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