महाभारत प्रिय दुर्योधन सोचता तो मैं भी वही हूं जो तुम सोचते हो मैं चाहता भी वही हूं जो तुम चाहते परंतु मैं कुछ कह नहीं सकता क्योंकि मुझे हर और से ता श्री विदुर दोनों प वकार सामंतो और नगर जन ने घेर रखा और व सभी के सभी युधिष्ठिर ही के पक्ष में इसलिए जो भी करना है वो तुम्हे और तुम्हारे मामा श्री को ही करना पड़ तुम लोगों ने युधिष्ठिर को वर्णावत भेजने की चर्चा की आज विदु से कहा बोले कि युधिष्ठिर को वारवत भेजने में तो कोई आपत्ति नहीं है परंतु यदि उसके साथ मैं भी जा सकूं तो बहुत अच्छा हो और यदि मैं ना जा पाऊ तो उनके साथ तुम्हें और दुशासन को यह कैसे हो सकता है पिता वही तो मैं कह रहा हूं बस इसलिए यह आवश्यक जो भी करो बहुत सावधानी से मैं जो भी कर रहा हूं पिता श्री बड़ी सावधानी सेही कर रहा हूं आप बस जेष्ठ भ्राता श्री युधिष्ठिर को किसी प्रकार वारवत भेज दीजिए और क्यों तुम और तुम्हारे मामा श्री दोनों इस बात पर इतना आग्रह क्यों कर रहे हो इसमें क्या रहस्य है बस समझ लीजिए कि यदि आपने यह कर दिया तो मुझे बड़ा आनंद मिलेगा और साथ में राज मुकुट भी ठीक मैं ता श्री से पूछ लेता पिता मह की जय हो इस समय आने का कारण महाराज भवन में प्रवेश कर चुके हैं क्या महाराज य आए हैं और कौन-कौन उनके साथ है महाराज अकेले ही आ रहे हैं महाराज ने आने का कष्ट क्यों किया यदि कोई ऐसी समस्या थी जो सवेरे की प्रतीक्षा नहीं कर सकती थी तो महाराज ने मुझे बुलवा लिया होता तुम हस्ते ना पुर नरेश हो तुम्हें भगवान के अतिरिक्त और किसी के आगे शीष नहीं झुकाना चाहिए तो क्या रेश होने के उपरांत मैंने वह अधिकार भी खो दिया ता श्री जो मुझे आपके स्नेह पर था क्या अब मैं वो तराश नहीं रहा जिसने आपके स्नेह की उंगलियां थाम कर चलना सीखा आओ बैठो यहां और अब बताओ कि समस्या क्या है समस्या समस्या यह है तास जी कि बहुत से लोग यह सोचते हैं कि मैं प्रिय युधिष्ठिर को राजगद्दी नहीं सौंपना चाहता लोग सोचते हैं कि मैं पिता हूं इसलिए अपने पुत्र दुर्योधन के पक्ष में इसलिए इस संदेह को मिटाने के लिए मैं चाहता हूं कि आने वाले वारवत समारोह में हस्तिनापुर के प्रतिनिधित्व के लिए प्रिय युधिष्ठिर को भेज ताकि लोग यह जान ले कि उनका अगला होने वाला नरेश युधिष्ठिर ही है तुमने बहुत सही सोचा है और मैं यह भी सोच रहा हूं ताश कि युधिष्ठिर के साथ दुर्योधन को भी भेज दो यदि किसी के हृदय में थोड़ा सा भी संदेह हो तो वह भी निकल जा और लोग यह जान ले कि दुर्योधन ने भी प्रिय युधिष्ठिर को स्वीकार कर लिया राजा का धर्म लोगों से डरना नहीं है धृतराष्ट्र राजा का धर्म लोगों से प्रेम करना है लोगों की सोच से डरकर कुछ करना राजा को शोभा नहीं देता इसलिए युधिष्ठिर के साथ दुर्योधन का जाना मैं उचित नहीं समझता पांडवों के आते ही युधिष्ठिर को वारवत भेज दीजिए जो आज्ञा ता पांडु पुत्रों के आते ही मैं प्रिय युधिष्ठिर को वारवत भेज [संगीत] भारत भत महाभारत [संगीत] महाभारत महाभारत
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