[संगीत] महाभारत प्रणाम जेष्ठ पिता श्री चक्रवर्ती भवा आओ पुत्र यहां बैठो मेरे निकट मैं एक बड़े धर्म संकट में हूं पुत्र और यदि मैं यह ना जानता होता कि तुम मेरी सहायता अवश्य करोगे तो मैं आत्महत्या कर लेता आप आदेश तो दीजिए ज पिता श्री छोटे अपने बड़ों की सहायता नहीं करते वे तो आदेशों को मानते हैं आज्ञा पालन करते हैं मेरी बातें ध्यान से सुनो पुत्र तुम पांचों भाई उस अनुज पांडु के उत्तराधिकारी हो जिसने लगभग पूरी पृथ्वी जीत ली थी विजय श्री उसकी अधीन थी परंतु जब तक मैंने उससे यह नहीं कहा कि सिंहासन ग्रहण करो तब तक उसने यह सिंहासन ग्रहण नहीं किया जबकि इस सिंहासन पर उसका अधिकार भी था आप मुझे किसी भूमिका के बिना भी आदेश दे सकते हैं जेष्ठ पिता श्री यह भूमिका आवश्यक है पुत्र यह सिंहासन मेरा नहीं है मैं तो अनुज पांडू का प्रतिनिधि हूं केवल प्रतिनिधि और मैं जो भी निर्णय लेता हूं व अनुज पांडु ही की ओर से लेता हूं किंतु जेष्ठ पिता श्री आपके स्वर इतने उदास क्यों है प्रश्न ना करो पुत्र अपने जेष्ठ पिता श्री को बोलने दो क्योंकि यह सब मैं दुर्योधन से नहीं कह सकता उसका अभ मेरे और उसके बीच की दीवार है मेरी समस्या यह है पुत्र कि मैं प्रिय हस्तिनापुर को किसी संकट के द्वार पर नहीं छोड़ सकता पूर्वजों को मुह दिखाने योग्य जाना चाहता हूं यहां से यदि राज्य तुम्हें देता हूं तो दुर्योधन का अभिमान आड़े आता है और यदि राज्य दुर्योधन को देता हूं तो तुम्हारे साथ अन्याय होता है और यह भी पारिवारिक जीवन का एक सत्य है पुत्र जहां बहुत से बर्तन होंगे वहां बर्तनों का टकराव भी होगा इसलिए उन्हें अलग ही कर देना चाहिए इसलिए यह निर्णय लिया गया है हस्तिनापुर राज्य का विभाजन कर दिया जाए देश का विभाजन जेष्ठ पिता श्री आप मेरे भाग का आधार आज भी अनुज दुर्योधन कोही दे दीजिए परंतु देश का विभाजन ना कीजिए ज पिता श्री ना कीज विजन नहीं पुत्र मैं तुम्हारे साथ य अन्याय नहीं कर सकता मैं तुम हस्तिनापुर ही देता और दुर्योधन को ययाती की राजधानी देकर कहता कि तुम युधिष्ठिर के अनुज जाओ और जाकर खांड प्रस्थ को बसाओ परंतु वह हट करता है कहता है कि मैं भी उसके साथ जाऊ पर मैं तो हस्तिनापुर की परछाई ह इसे छोड़कर कहां जाऊ इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम खांड प्रस्थ को बसाओ मेरे कहे की लाज रख लो भाग्य का पालन होगा जेष्ठ पिता [संगीत] [प्रशंसा] श्री सज्जनता फिर झुक गई देखा बेबस रूप पांडु सुतो के हित बनी फिर वही काली [संगीत] धू पुत्र प्रेम के स्वार्थ में था अंधा धृतराष्ट्र दिखा विवशता व्यर्थ ही किया विभाजित [संगीत] राष्ट भारत महाभारत महाभारत महाभारत
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