महाभारत आओ [संगीत] कृष्णा तुम तो स्वयं ही अग्नि से उत्पन्न हुई हो याज्ञ सेनी तो फिर तुम्हें किसी और अग्नि की क्या आवश्यकता है अपमान तुम्हारा नहीं हुआ द्रौपदी अपमान हुआ मानवता का अपमान तो हुआ स्वयं मेरा कीचड़ को छू लेने से धूप मैली नहीं होती तुम तो जीवन की धूप हो जल पवन अग्नि आकाश और धरती का अपमान भला कौन कर सकता है तुम सदैव मानव जाति के लिए आदरणीय रहोगी हे भक्त वत्सल हे पुरुषोत्तम तुम्ही दया भी हो और दयालु भी तुम ही सत्य हो तुम शाश्वत अंकुर हो जो संसार की कोक से फूटता रहता है तुम मार भी हो तुम्ही लक्ष्य भी सूर्य तुम्ही से निकल और तुम्ही में डूब जाते हैं इसलिए मेरी सुनो मैं तुम्हारी सखी हूं और दुशासन मुझे तुम्हारी सखी को बालों से पकड़ कर खींचता हुआ भरी सभा में ले गया और व एकत्र राजाओं के सामने दुर्योधन ने मुझे दासी और उस सूत पुत करण ने मुझे वेश का गंगा पुत्र भेष भी कुलवधू का ये अपमान और वो भी जेष्ठ पिताश्री तराश के सवा में और मैं उन महावीर को क्या कह जिनमें से कोई सर्वश्रेष्ठ गदाधर है और कोई सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर और जिन्होंने चुपचाप अपनी पत्नी का य अपमान सहन किया अर्जुन के गा परम के गधा पर जिनके होते हुए बोन की सभा में मेरा पान हुआ और थयो ने ना कुछ कहा ना कुछ किया सबकी सहायता करने के लिए खड़े हो जाने वाले उन पांडवों में से मेरी सहायता करने के लिए कोई नहीं उठा कोई नहीं उठा कोई नहीं [संगीत] उठा कोई नहीं उ [संगीत] जिन लोगों ने तुम्हारा अपमान किया है ना सखी उन सबकी पत्नियां उनके शवों पर विलाप करेंगी तुमने अपने पुत्र को कांपल भेजकर अच्छा ही किया मैं भी सुभद्रा को द्वारिका ले जाऊंगा किने वाले युद्ध को ध्यान में रखते हुए उसके पुत्र अभिमन्यु का पालन पोषण किया जा सके पर य युद्ध होगा ना मैं चाहता तो नहीं फिर भी युद्ध तो होगा यदि आप नहीं चाहते वासुदेव तो यह युद्ध भला कैसे हो सकता है क्या मैंने द्रौपदी का वस्त्र हरण चाहा था बड़े भैया यही तो कठिनाई कि संसार में सब कुछ मेरे चाहने के अनुसार नहीं होता यूं ही यह युद्ध भी होगा क्योंकि इस युद्ध का निर्णय द्रौपदी के खुले हुए केश ले चुके हैं इस युद्ध का निर्णय दुर्योधन की ईर्षा ले चुकी है इस युद्ध का निर्णय आपके ज्येष्ठ पिता श्री की उच्चा आकांक्षा ले चुकी है इसलिए इस युद्ध की तैयारी कीजिए और यह ना कि आपका सामना केवल दुर्योधन की ईर्षा या जेष्ठ पिता श्री की उच्चा आकांक्षा से होगा यह युद्ध इतना साधारण नहीं होगा सामने की सेना में अपने अपने रथों पर खड़े होंगे गंगापुत्र भीष्म द्रोणाचार्य कृपाचार्य अश्वथामा कर्ण रुक्मी जयद जैसे महान योद्धा और स्वयं दुर्योधन भी योद्धाओं की इस भीड़ में दो तो तुम्हारे गुरु हैं पार्थ और इस आयु में भी गंगापुत्र भीष्म के बाणों का उत्तर आधुनिक संसार में किसी के पास नहीं है इसलिए दिव्य अस्त्रों की खोज में निकलो दिव्य अस्त्रों की खोज में इंद्र की तो तुम पर यूं भी कृपा है और सारे दिव्य अस्त्र इंद्र के पास रखे हुए हैं तुम्हारे अतिरिक्त वह दिव्य अस्त्र इंद्र किसी को नहीं देंगे जब तक तुम्हारे पास य दिव्य अस्त्र नहीं होंगे तब तक तुम्हारी विजय संभव नहीं युद्ध में इन अस्त्रों का प्रयोग हो या ना हो किंतु तुम्हारे पास इन अस्त्रों का होना आवश्यक है तुम अपनी तैयारी करो यह ना समझना कि दुर्योधन चुपचाप बैठा हुआ है वो भी तैयारी कर रहा है महाभारत महाभारत महाभारत महाभारत महा भार [संगीत]
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