महाभारत चरण म आयुष्मान चरण चरण आयुमान [संगीत] आओ [संगीत] विदर क्षमा कीजिए ता गुरु मेरा स्थान यहां नहीं वहां [संगीत] है प्रणाम [प्रशंसा] हां कहो गंगापुत्र माते मैंने जो कुछ ऋषि भार्गव से सीखा था व पांडु को सिखा दिया है आज संपूर्ण भारतवर्ष में कोई भी ऐसा नहीं जो पांडु के बाणों का सामना कर सके गुरु वशिष्ठ और बृहस्पति देव से मुझे श्रेष्ठ सिद्धांत और राजनीति का जो ज्ञान मिला था व मुझसे विदुर ने ले लिया है यह इस युग का परम विद्वान और नीति वान है और इसका नाम सदा आदर के साथ लिया जाता रहेगा और मेरा राष्ट्र गंगा पुत्र धृतराष्ट्र कुर वंश का जेष्ठ पुत्र है मा यह बड़ा बलवान है पाषाण को चुटकी से मसल सकता है ज्ञान में यह पांडु और विदुर का साझीदार है पांडु और विदुर इसकी दो आंखें इसलिए कह सकता हूं कि अब वो समय आ गया है जब हस्तिनापुर का राजमुकुट धृतराष्ट्र के सिर की शोभा बने तुम्हारी जो इच्छा तुम्हारी जो आज्ञा गंगा आज्ञा हो तो मैं कुछ निवेदन करूं तागुरु आज्ञा है आप ही द्वारा शास्त्र और नीति का जो ज्ञान मिला है उसी के आधार पर कुछ कहने का साहस कर रहा हं ऐसा कोई भी व्यक्ति राज सिंहासन पर नहीं बैठ सकता जो शारीरिक दृष्टिकोण से संपूर्ण जेष्ठ ब्रता धृतराष्ट्र अपनी नेत्र हीनता के कारण राज सिंहासन के यग नहीं है राज सिंहासन के योग्य तो पांडु है केवल पांडु नहीं वि मैं अपने बड़े भाई के सामने राज सिंहासन पर नहीं बैठूंगा प्रिय भाई यदि मैं स्वयं तुम्हारा हाथ थामकर तुम्हें राज सिंहासन तक ले जाऊं और तुम्हें व स्थान ग्रहण करने का आदेश दू तब विदुर ठीक कह रहा है ताव जी जो व्यक्ति स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता है वो राज्य की क्या रक्षा करेगा हस्तिनापुर की राजगद्दी के योग्य तो केवल एक ही व्यक्ति मेरा भाई पांडव तुम भी तो कुछ बोलो गंगापुत्र यह निर्णय तो आप ही लेंगी माते मैं तो कोरो वंश और हस्तिनापुर राज सिंहासन से बंधा हुआ हूं जो इस राज सिंहासन पर बैठेगा उसकी सेवा और रक्षा करना मेरा धर्म है कौन बैठेगा ये निर्णय आप ही लीजिए मद [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] हस्तिनापुर नरेश पांडु की जय [संगीत] हो तात [संगीत] श्री प्रणाम तात श्री इधर मैं कई दिनों से देख रहा हूं क्या आप किसी गहरी सोच में डूबे रहते हैं कारण ता श्री क्या तुम सचमुच इस गहरी सोच का कारण नहीं जानते आज हस्तिनापुर वर्तमान और भविष्य के डांड पर खड़ा हुआ है विदुर क्या तुम इन दिनों किसी गहरी सोच में डूबते ही नहीं क्या तुम शकित नहीं हो क्या तुम यह नहीं देख रहे कि हमारे पूर्वजों ने जिन जीवन मूल्यों को संजोया था पिरोया था और जिन्ह एक शक्तिशाली और जीवित समाज का आधार बनाया था वह मूल्य आज जगह जगह पर टूट रहे इस धागे में कांठे पड़ गई राजनीति नेत्रहीन हो गई और राजा मोह में फसक दूसरों के अधिकारों को अपनी मुट्ठी में कर लेना चाहता है जब स्वयं मालिक को अपनी ही कलिया ना भा रही हो और वह सारी कलियों के भाग की धूप एक ही कली को दे देना चाहता हो तो उस वाटिका का क्या भविष्य है विदुर क्या भविष्य है और एक दुख की बात तो यह भी है कि व एक कली भी अपनी आवश्यकता से अधिक धूप पाकर चल जाएगी जब किसान अपने ही खेत के अंकुर से शत्रुता कर बैठे तो उस खेत पर क्या बीते आजकल यह प्रश्न किसी बिच्छू की भाती दिन रात मुझे डंक मारते रहते हैं मैं वर्तमान से असंतुष्ट और भविष्य से अत्यंत चिंतित ह समय तो बहती हुई नदी की तरह है ता केवल अपनी सुविधा के लिए हमने उसे वर्तमान भविष्य और अतीत में बांट रखा है जो आज का अतीत है वह कल का वर्तमान रह चुका है और जो आज का वर्तमान है वो कल का अतीत हो जाएगा ता मैं इस समय दर्शन पर बात नहीं कर रहा हूं विदुर मैं आज के कठोर यथार्थ की बात कर रहा हूं वर्तमान जब अतीत बन जाएगा तो हम सब इतिहास के पन्नों में होंगे पर आज इस वर्तमान के हम जीवित पात्र है और अपनी अपनी भूमिका निभा रहे हैं पर हमें अपनी भूमिका का ज्ञान तो होना चाहिए इस बात का ज्ञान तो मुझे आप ही से मिला है ता श्री कि जीवन का सारा कस बल इसी में है कि हमें अपनी भूमिकाओं का पूरा ज्ञान नहीं यदि भविष्य का हमें पूरा ज्ञान हो जाए तो फिर कर्म का अर्थ ही कहां रह जाता है मनुष्य ही केवल एक ऐसा जीव है जिसे कुछ करने या ना करने का पूरा अधिकार मिला हुआ है तो क्या तुम यह कहना चाहते हो कि मैं धृतराष्ट्र को छोड़ दू यह मैं कैसे कह सकता हूं ता श्री क्योंकि मैं जानता हूं आप अपने चुनने के अधिकार का प्रयोग पहले ही कर चुके हैं तो क्या आंखों पर पट्टी बांध लूं यह प्रश्न आप अपने आप से ही कीजिए और इसका उत्तर भी आप स्वयं ही दीजिए क्योंकि मैं आपके इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे [संगीत] सकूंगा तो कोई शुभ धन देखकर पांडव पुत्रों को कृपा आचार्य के गुरुकुल में छोड़ा जो आज्ञा अब तुम जाओ मैं कुछ देर अकेला रहना चाहता हूं माता श्री के [संगीत] साथ प्रणाम ता [संगीत] श्री प्रणाम युवराज काका श्री आप ऐसा क्यों करते हैं मैं ऐसा इसलिए करता हूं वत्स क्योंकि किसी व्यक्ति को अपना स्थान नहीं भूलना चाहिए ग्रहों की भांति हर व्यक्ति का अपना एक स्थान एक मार्ग होता है यदि वह अपना स्थान छोड़ दे या मार्ग बदल दे तो प्रलय हो जाएगा वत्स तुम हस्तिनापुर के युवराज और फिर रेश होगे महामंत्री होने के नाते यह मेरा कर्तव्य है कि मैं तुम्हारा आदर करूं कृपाचार्य तुम्हें प्रणाम स्वीकार करना नहीं सिखा सकते यह कार्य तो इस दासी पुत्र का ही है बस चलिए यही सही युवराज ने आपका प्रणाम स्वीकार किया तो क्या आप काका श्री अपने युधिष्ठिर को आज्ञा देंगे कि आपके चरण चूकर आशीर्वाद मांग ले क्योंकि जितनी राजनीति आपकी चरण धुली में है उतनी राजनीति इस युग के बड़े-बड़े विद्वानों में भी नहीं है आयुष्मान [संगीत] भवा इसी राजनीति के ज्ञान ने तो मुझे बड़े संकट में डाल रखा है वत्स संकट का क श्री हां बस परंतु इन प्रश्नों के लिए तुम अभी बहुत छोटे हो पर जीवन किसी ना किसी समय स्वयं तुमसे प्रश्न करेगा इसीलिए मैं यहां तुमसे यह पूछने आया हूं कि तुम्हें इस समय गुरुकुल में होना चाहिए था तुम यहां इस राज भवन में क्या कर रहे हो उस दिन गुरुदेव को जेश पिता श्री ने आपके सामने ही बुलवा लिया था और फिर वे वहीं से अपनी बहन के घर चले गए तो मैंने यह उचित जाना कि उनके लौट आने तक हम यहीं रहे वैसे तो आप जानते ही हैं कि दुर्योधन और भीम के बीच अधिक बनती नहीं मैं भीम को समझाता हूं कि दुर्योधन बंधु है तुम्हें उसकी चपलता पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए लेकिन काका श्री आप तो भीम को जानते ही है यह क्यों नहीं कहते कि तुम गुरुकुल से यहां भाग के आए हो यदि तुम गुरुकुल की चुनौती स्वीकार नहीं कर सकते तो जीवन की चुनौती क्या स्वीकार [संगीत] करोगे राजा का धर्म तो बहुत कठोर होता है वत्स वो व्यक्ति को परिवार परिवार को ग्राम ग्राम को प्रांत और प्रांत को समस्त राष्ट्र के लिए भी बलिवेदी पर चढ़ाने में संकोच नहीं करता और तुम तुम भा की खटपट के कारण वहां से यहां भाग के आए हो यदि तुम गुरुकुल में नहीं टिक सकते तो तुम रण भूमि में क्या करोगे जेष्ठ कुरु पुत्र होने के कारण तुम्हारे कंधों पर कर्तव्यों का बोझ भी भारी है वत्स भागने से आत्मा के चंद्रमा में ग्रहण लग जाता है इसीलिए तुम अपने कर्तव्यों की चुनौती को स्वीकार करो और अपने भाइयों को लेकर गुरुकुल च जा आपकी आज्ञा का पालन होगा काका [संगीत] श्री धर्मराज भव आयुष्मान भव पुत्र भीष्म के सिवा कोई ऐसा ना था जिस पर वे पूरी तरह भरोसा कर सके और गंगापुत्र भीष्म भी अपनी प्रतिज्ञा का किवाड़ बंद किए बैठे थे फिर भी भीम और दुर्योधन के तनाव की यह कहानी जो नाग लोक तक चली गई ऐसी न थी कि विदुर उसके विषय में वार्तालाप करने भीष्म के पास ना जाते और जब भीष्म ने यह सुना तो उन्हें अपने सुने पर यकीन नहीं आया युधिष्ठिर की कहने से कुछ कहते कहते रुक गया था जीता श्री माता सत्यवती पांडु पुत्रों को मुझे सौप कर गई थी विदर तो क्या मैं उस कर्तव्य का पालन कर रहा हूं आवश्यकता तो इस बात की है ता श्री क्या आप दुर्योधन को यहां बुलाकर उसे समझाए दुर्योधन तो धृतराष्ट्र का हस्ताक्षर है विदुर हस्ताक्षर उसका तो अपना कोई व्यक्तित्व ही नहीं होगा तरा उसकी आंखों से अपने सारे सपने देखना चाहते हैं ये लोग मुझे चैन से मृत्यु लोक त्यागने नहीं देंगे विदुर और मेरी विवशता देखो कि मैं हस्तिनापुर राज सिंहासन से यह भी नहीं कह सकता कि जा मैं तेरे इस अन्याय का साथ नहीं देना चाहता मनुष्य को शपथ लेते समय बहुत सावधान रहना चाहिए क्योंकि शपथ की गांठ ना तो कभी टूट सकती है ही खुल सकती है मैं यह भी नहीं कह सकता कि मेरे यह चौड़े कंधे मेरी ही ली हुई एक शपथ के बोझ तले टूट रहे हैं कालेश्वर कालेश्वर कालेश्वर तात श्री यह आप क्या कह रहे हैं तात श्री आप तो इस गुरु राज घराने के चंद्रमा है यदि आप ही को ग्रहण लग जाए तो इस राज घराने का क्या होगा यदि आप ही वास्तविकता की आंखों में आंखें डालने से घबरा जाए तो यह धरती जीने के योग्य नहीं रह जाएगी ता श्री मैं क्या करू विधर मैं क्या करूं मैं वर्तमान की लंबी होती परछाइयों से डर रहा हूं मैं धृतराष्ट्र की उच्च आकांक्षा से डर रहा हूं मैं इस सोच से डर रहा हूं कि जब यह विष वृक्ष बड़ा होगा तब क्या होगा इस विषय में राजनीति एक ही बात कहती है ता श्री कि ऐसा वृक्ष बड़ा होने से पहले ही काट दिया जाए नहीं विदुर नहीं इस पौधे के कटने से हस्तिनापुर राज सिंहासन भी कट जाएगा और मैं उस राज सिंहासन की रक्षा करने के लिए वचन पत हूं दुर्योधन अभी बच्चा है संभाला जा सकता है धृतराष्ट्र में भी साठ घठ करने की समझ नहीं है व अपनी आग में जलना चाहता है सो जल रहा है परंतु धृतराष्ट्र और दुर्योधन को विष की खाद देने वाला केवल श कोनी है शने जो आज भी यही सोचता है कि गुरुराज घराने ने नेत्रहीन धृतराष्ट्र का गांधारी से विवाह करवाकर कंधार राज परिवार का अपमान किया है उसने हस्तिनापुर राज सिंहासन पर अपनी चौसर बिछ रखी है आज मैं हस्तिनापुर राज सिंहासन के लिए जैसे डर रहा हूं वैसे तुम भी डरो विदुर तुम भी डरो क्योंकि हस्तिनापुर के प्रति हमारे कर्तव्य की मांग यही है यही है महाराज की जय हो महामंत्री विदुर जी पधार रहे हैं ठीक है तुम लोग जाओ प्रणाम महाराज आओ विदुर आओ इस समय तुम्हें महाराज ने नहीं बुलवाया है अनुज मैंने बुलवाया है तुम्हारे भ्राता श्री आओ मेरे निकट बैठ जाओ धन्यवाद महाराज पितामह कैसे है विदुर भगवान की कृपा है बराता श्री विदुर हम तीन भाई इस दासी पुत्र को भाई मत कहिए महाराज गंगा जल तो गंगा जल ही रहता है विर गागर चाहे सोने की हो या मिट्टी की मां गागर नहीं होती भता बीज अपने आप में तो कुछ भी नहीं होता जब तक उसे भूमि का स्नेह ना मिले बीज अंतरिक्ष में नहीं पनप सकता यदि पृथ्वी का कोई महत्व ना होता तो भगवान ने पृथ्वी बनाई ना होती हम मातृभूमि वाले लोग हैं भ्राता दासी होने से मेरी माता का स्थान किसी और माता से नीचा तो नहीं हो जाता परंतु मेरी पहचान केवल मेरी माता है और मनुष्य को अपनी पहचान की डोर कभी नहीं छोड़नी चाहिए तुम इसी कारण मुझे अति प्रिय हो तुम्हारी सोच बिल्कुल सीधी है प्रिय पांडु पुत्रों का कोई समाचार यह समाचार मिला है कि भीमसेन बलराम जी से गदा युद्ध की कला सीखकर अपने भाइयों से आ मिले और अब सब हस्तिनापुर ही की ओर आ रहे हैं तुम्हारे विचार में उनके आ जाने के उपरांत मुझे क्या करना चाहिए प्रिय युधिष्ठिर को राजा बनाकर वन की और प्रस्थान कर लेना चाहिए या फिर उनके राज्य अभिषेक के लिए प्रतीक्षा करनी चाहिए तुम तो जानते ही हो कि दुर्योधन कितना हठीला वह अभी तक ठीक से यह समझ नहीं पाया है कि युधिष्ठिर ही को युवराज होना चाहिए तो क्या यह उचित नहीं होगा कि इसे थोड़ा समय और दिया जाए यह निर्णय तो आप ही को लेना है ब्रता श्री और यह निर्णय तो आप लेही चुके कि कुंती पुत्रों के लौटते ही युधिष्ठिर को वारणा वत भेज दिया जाए यह समाचार तुम्ह किसने दिया यह समाचार पूरे नगर को मिल चुका है भ्राता श्री अच्छा तो फिर यह बताओ कि इस विषय में तुम्हें क्या कहना युधिष्ठिर को भेज या ना भेज गंधार नरेश ने सुझाव दिया है तो सोच समझ कर ही दिया होगा महाराज चंद्रमौली भगवान शंकर का उत्सव है अनेक जनजातियों के लोग इस उत्सव में ना केवल ये कि आते हैं बल्कि बहुत बड़ी संख्या में आते हैं तो फिर वे भी अपने युवराज के दर्शन कर लेंगे परंतु मेरे विचार में युधिष्ठिर का अकेले जाना उचित ना होगा क्यों उनके अकेले जाने से लोग यह सोचना आरंभ कर सकते हैं कि राज परिवार में एका नहीं है इसलिए या तो युधिष्ठिर के साथ दुर्योधन और दुशासन जा कि प्रजा यह देख ले कि गांधारी पुत्रों ने जेष्ठ कुंती पुत्र को अपना युवराज मान लिया है या फिर स्वयं भ्राता से चले जाए और प्रजा से उनका परिचय करवाए ऐसा करने से लाभ होगा प्रजा यह सोचने लगी है कि आपने किसी दबाव में आकर युधिष्ठिर को युवराज बना लिया है पर आपका मन दुर्योधन ही के पक्ष में है जनता के हृदय में इस प्रकार की आशंकाएं राज नीति के लिए ठीक नहीं है भ्राता श्री जन समुदाय को राजा पर संपूर्ण विश्वास होना चाहिए यदि आप साथ ले जाए तो राजनीति का वातावरण ही शुद्ध हो [संगीत] जाएगा बस तुम ही लोगों का ध्यान लगा रहा वहां सब कुशल तो है काका श्री यह कहना तो बहुत कठिन है पुत्र काका श्री पितामह कैसे हैं बहुत घायल है विराजी काका [संगीत] श्री तुम तो पांडव परिवार के रेड की हड्डी हो पुत्री मेरे आशीर्वाद के बिना ही तुम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकती हो तुम यह ना समझना कि भाभी श्री अपने बुढ़ापे के कारण तुम लोगों के साथ नहीं आई वह कभी इतनी दुर्बल नहीं हो सकती कि अपने कर्तव्यों से कतरा जाए किंतु व भी पिता मह भीष्म आचार्य द्रोण या जे भ्राता श्री तराश की भांती ही हस्तिनापुर का अतीत है तुम लोग तो वर्तमान हो पुत्र तो अपने आप को संभालो और सोचो उस भविष्य के विषय में जिसका निर्माण तुम्ही को करना है यह कर्म भूमि तो तुम लोगों की है पुत्र हमें दिए की भांती जलाए रखना चाहो तो जलाए रखो और बुझाना चाहो तो बुझा दो यह यह आप क्या कह रहे काका श्री जब राजनीति में सत्य को सहन करने की शक्ति ना रह जाए तो समझ लेना चाहिए कि राजनीति की दीवारें अपनी जगह से सरक चुकी है और व गिर नेही वाली है आओ पुत्र वो व्यक्ति बड़ा ही मूर्ख होता है पुत्र जो दीवारों के गिरने की प्रतीक्षा करता रहता है और उन्हीं की छाऊ में बैठा रहता है इन दीवारों की छाऊं की सीमा से निकल जाओ पुत्र निकल जाओ और इससे पहले कि इन दीवारों का ढोह तुम्हें निगल जाए [संगीत] इन दीवारों को गिराकर नई दीवारें बनाने का कार्य आरंभ करो हां [संगीत] पुत्र मुझे इस बात का दुख नहीं है कि ब्रता श्री ने मुझे निकाल दिया है दुख तो मुझे इस बात का है पुत्र कि वो अब बिल्कुल अकेले है बिल्कुल केले उनके पास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो उनसे कड़वे सत्य बोल सके काका श्री हां पुत्र कोई नहीं [संगीत] इस क्रोध का कारण ता श्री धृतराष्ट्र धृतराष्ट्र क्या तुमने यह निर्णय ले लिया है कि तुम हस्तिनापुर का विनाश किए बिना नहीं रहोगे अरे पुत्र जिस सिंहासन पर बैठे हो उसके नीचे तो आग ना जलाओ यह सिंहासन जल जाएगा जल जाएगा यह सिंहासन किंतु मुझे मेरी भूल तो बताइए ता श्री भूल यदि तुम यह नहीं जानते कि तुमसे क्या भूल हुई है तो तुम राजा बनने के योग्य नहीं हो वो जो एक व्यक्ति जो तुम्हारे सामने सर उठाकर सच बोल सकता था तुमने उसे भी निकाल दिया अरे मूर्ख सत्य चाहे कितना ही कड़वा क्यों ना हो सत्य फिर भी सत्य होता है सत्य को सुनने उससे सीखने और उसे स्वीकार करने का साहस कर भेज किसी को विदुर के पास और वापस बुला ले उसे यदि व वापस नहीं आया तो हस्तिनापुर में सूर्य फिर कभी उदय नहीं होगा और राज भवन तुम्हारे समेत अंधकार के गर्त में डूब जाएगा डूब जाएगा इसके साथ हस्तिनापुर भी डूब जाएगा [संगीत] कुमार की जय हो प्रणाम संजय हमारी कुटिया में आपका स्वागत है काका श्री के पास आए होगे मैं आया नहीं हूं कुंती पुत्र भेजा गया हूं आइए यह तो बड़े आश्चर्य की बात है संजय कि पहले तो महाराज ने मुझे निकाल दिया और फिर तुम्हें मेरे पीछे लपका दिया मुझे मना कर ले जाने के लिए यह तो महाराज ही जाने पर सुना था कि गंगापुत्र भीष्म गए थे महाराज के पास क्या बात हुई यह तो मैं नहीं जानता उनके जाने के पश्चात ही मुझे बुलवाकर महाराज ने आदेश दिया कि जाओ और मेरे अनुज को मेरी ओर से मना कर लाओ और जो मनाने पर भी ना आए तो कहना कि महाराज का आदेश है अब तो महाराज की आज्ञा का पालन करना ही होगा अब कब भेंट होगी काका श्री पता नहीं पुत्र परंतु अपनी माता श्री की ओर से चिंतित ना संजय युधिष्ठिर के पास से होकर लौट आया है उसने युधिष्ठिर के सारे सुझाव नहीं बताए अधिक समय उसने मुझे दोषी ठहराने में गवा दिया युधिष्ठिर के सारे सुझाव कल राज्यसभा में सुनाए [संगीत] जाएंगे परंतु संजय के साथ ही मेरी नींद भी चली गई जिसे आप संजय का दोष लगाना ठहरा रहे हैं भ्राता श्री वो आपके प्रति उनका शुभ चिंतन रहा उन्होंने जो कुछ कहा होगा अवश्य ही आपके हित में कहा होगा और आपके सार्थी होने के नाते वह सब कुछ कहकर उन्होंने अपने धर्म और अपने कर्तव्य का पालन किया है हे ब्रदर श्री आपने केवल बारबार पांडवों ही के साथ अन्याय किया है तनिक सोचिए महाराज क्या आपने स्वयं ने राज्य का विभाजन करके अपने दुर्योधन और अपने हस्तिनापुर के साथ कैसा घोर अन्याय किया है राजा होने के नाते राज्य की सीमा का आदर करना आपका कर्तव्य था आपने विभाजन करके राजा की मर्यादा का उल्लंघन किया है [संगीत] महाराज परंतु युधिष्ठिर युधिष्ठिर चुपचाप इस अन्याय को सह गया चुपचाप इस अन्याय को सह गया और आपने यह विभाजन आपने यह विभाजन हस्तिनापुर के हितु को ध्यान में रखते हुए नहीं किया आपने दुर्योधन को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया था आप उसे राजा बनाने के लिए कोई भी मूल्य चुकाने को तैयार है मैं यह नहीं जानता भ्राता श्री क्या हस्तिनापुर आपको इस विभाजन के अपराध के लिए कभी क्षमा कर भी पाएगा या नहीं और [संगीत] तुम मैं तो आपको कभी क्षमा नहीं करूंगा कभी क्षमा नहीं करूंगा और कदाचित आप भी अपने आप को क्षमा नहीं कर पाएंगे ब्रता श्री मेरी मां मेरी मां आपकी माता श्री की दासी थी मैं तो बंधा हुआ हूं दा सत्व की टोरी से महाराज बंदा हुआ हूं अब आप न्याय करें या अन्याय मैं आपको छोड़ नहीं सकता मैं आपको छोड़ नहीं [संगीत] सकता बोलते रहो आज तुम्हारे कड़वे स्वर मुझे उतने कड़वे नहीं लग रहे हैं और क्या किया मैंने आपने और जो कुछ किया भता श्री मैं उसे दोहराना नहीं चाहता फला शग द्यूत क्रीड़ा द्रौपदी वस्त्र हरण यह सब बड़ी दुखद यादें हैं भ्राता श्री ख और भुलाई भी नहीं जा सकती क्या कभी आपकी आत्मा के आंगन में द्रौपदी की आर्थ पुकार नहीं गूंजती क्या उसके उठाए हुए प्रश्न आपको बिच्छू की भाति डंक नहीं मारते इसलिए हे भ्राता श्री अब पुत्र मोह की ओर से ध्यान हटाकर देश प्रेम के मार्ग पर धरिए न्याय कीजिए महाराज न्याय कीजिए और यदि पांडव इंद्र प्रस्थ लेकर द्रौपदी के अपमान को भूल जाए तो उनका आभार मानिए धर्म के सुरक्षा चक्र में आ जाइए ब्रता श्री क्योंकि यदि युद्ध की ठहरी तो न य हस्तिनापुर बचेगा और नहीं नहीं य कुरुवंश हे महाराज अपनी महत्वाकांक्षा को धिक्कार दीजिए क्योंकि वही आपकी शत्रु है और अपने शत्रु के निवास स्थान पर अंधेरे में कभी नहीं जाना चाहिए कभी नहीं चुप क्यों हो गए बोलते रहो अंत में केवल यही कहना है महाराज कि अपने स्थान पर अपने पुत्र मोह को सोचने मत दीजिए हस्तिनापुर आपका दायित्व है आपका और दुर्योधन वो आपका दायित्व नहीं है महाराज वो आपका रोग है [संगीत] रोग हे पुत्र दुर्योधन को बहुत चाह चुके अब तनिक हस्तिनापुर को जाकर देखो मैं क्षमा चाहता हूं ताश जी वासुदेव के स्वागत का कार्यभार आप ही संभालिए नहीं पुत्र यह कार्य तो विदुर और दुर्योधन को करना चाहिए किंतु हे दुर्योधन ध्यान रहे वासुदेव श्री कृष्ण संपूर्ण सत्य है उन्हें अपने अभिमान के कांटे से मत छूना सत्य का अपमान संभव नहीं परंतु सत्य के अपमान का परिणाम शुभ नहीं होता दुर्योधन के अतिरिक्त मेरे सारे पुत्र वासुदेव के स्वागत के लिए नगर के द्वार से द कोस आगे तक जाएंगे अनगिनत लास काए जाएंगी जो स्वागत नृत्य करती हुई वासुदेव को राज भवन तक ले जाएंगी जहां स्वयं दुर्योधन उनका स्वागत करेगा हे विदुर आदेश दो के मार्ग पर छिड़काव किया जाए कि धूल ना उड़े दुशासन का भवन दुर्योधन के भवन से भी अच्छा है उसी में वासुदेव के ठहरने का प्रबंध किया जाए मैं स्वयं वासुदेव की पूजा करूंगा 16 स्वर्ण रथ जिसमें बालिका अश्व जुते होंगे आठ कामो मद गज 100 कुंवारी दासिया और उतने ही दास 18000 मृदुल ऊन के कंबल अनगिनत मृग छाले और एक ऐसा रथ उनकी भेंट करूंगा जो रात में भी दिन ही की भांति दमके हे महाराज इस मिथ्या चार से क्या लाभ होगा महामंत्री विदुर आप अपने ही महाराज को उन्हीं के कक्ष में मिथ्या चारी कह रहे हैं हे गंधार नरेश मंत्रियों का यही कर्तव्य है कि वह अपने नरेश के सामने सदैव सच बोले और जो अपने नरेश के सामने सच नहीं बोल सकता उसे मंत्री होने का कोई अधिकार नहीं है कोई अधिकार नहीं है हे गंधार नरेश जब राज्य के मंत्री अपने ही नरेश से झूठ बोलने लगे तो समझ लेना चाहिए कि उस राज्य का सूर्य अस्त होने वाला है मैं इस राज्य के सूर्य को अस्थ होने से रोकना चाहता हूं और इसीलिए सच बोल रहा हूं महाराज वासुदेव को जो कुछ भी भेंट करना चाहते हैं वह वास्तव में भेंट नहीं उत्कोच है परंतु हे महाराज कोई उत्कोच वासुदेव को अर्जुन से अलग नहीं कर सकता अर्जुन उनका मित्र नहीं उनका आता जाता श्वास है श्वास कृपया उन्हें यह भेंट देने की भूल ना कीजिए महाराज उनके आने का तात्पर्य ही यह है कि वे शांति चाहते हैं और उनके अतिरिक्त वहा शांति चाहने वाला और कोई नहीं है उनका आना पांडवों से कहीं अधिक आपके हित में है समस्त हस्तिनापुर के हित में है इसीलिए महाराज वे जो भी कुछ कहे उसे मान लेने का प्रयत्न कीजिए प्रयत्न कीजिए महाराज आज मैं पहली बार काका श्री से सहमत हो रहा हूं पिता श्री यह भेंट देने का उचित अवसर नहीं है व यह भी तो सोच सकता है कि हम सब उससे डर गए हैं और आप चाहे उसे कितना भी प्रसन्न करने का प्रयत्न करें ता श्री परंतु जिस युद्ध की ठहर चुकी है वह युद्ध तो होगा तुम उनका स्वागत करो या ना करो पुत्र वासुदेव तो वही करेंगे जो करने का निर्णय ले चुके हैं और यह ना सोचो पुत्र यदि तुमने उन्हें भेंट नहीं दी या उनकी पूजा नहीं की तो उनका अपमान हो जाएगा उनका अपमान तो हो ही नहीं सकता क्योंकि वे मान और अपमान से परे हैं पुत्र और ये भी ना सोचो कि अर्जुन उनका मित्र है इसलिए वे उनका पक्ष लेंगे वे धर्म के अतिरिक्त किसी के पक्ष में हो ही नहीं सकते पुत्र तो क्या आप यह कहना चाहते हैं पितामह कि मैं पांडवों के जीवन काल में सम्राट हो ही नहीं सकता यदि ऐसा है तो मैं वासुदेव को बंदी बना लूंगा ऐसा ना कहो पुत्र ऐसा ना कहो यदि तुम यह भूल भी जाओ कि वे कौन है तो यह अवश्य याद रखना कि वे शांति दूत बन कर आ रहे हैं और उनकी ओर से हमें कोई क्षति भी नहीं पहुंची है तुम उन्हें बंदी बनाने की सोच भी कैसे सके तुम्हारी क्रूर सोच सर्वनाश को आमंत्रित कर रही है वत्स अपनी सोच की दिशा बदलो हे महाराज मैं आपके इस पत भ्रष्ट पुत्र की बातें अब और नहीं सुन सकता परंतु जाते जाते आपसे यह अवश्य कह देना चाहता हूं यदि आपकी सभा में वासुदेव का अपमान करने का प्रयत्न किया गया तो अपने इस पुत्र पर रोने के लिए आपको आंसुओं की भी कमी पड़ जाएगी वासुदेव कृष्ण की जय वासुदेव कृष्ण की जय वासुदेव कृष्ण की जय वासुदेव कृष्ण की जय वासुदेव कृष्ण की जय वासुदेव कृष्ण की जय वासुदेव कृष्ण की [प्रशंसा] [संगीत] जय देवकी नंदन वासुदेव श्री कृ पधार रहे [संगीत] हैं हस्तिनापुर में आपका स्वागत है वासुदेव पधार [संगीत] हे शांतिदूत वासुदेव कृष्ण मेरी ओर से स्नेह की यह भट स्वीकार करें [संगीत] हे महाराज आपने यह भेंट देकर मेरा मान बढ़ाया है परंतु इसके बदले में आपको देने के लिए मेरे पास शांति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है पहले तनक विश्राम कर लो वासुदेव ताकि यात्रा की थकन मिट जाए जो आज्ञ पितामह पुत्र दुशासन जी वासुदेव को अपने भवन में ले जाओ जो आज्ञा नहीं पिता श्री पहले मैं इ अपने भवन में ले जाऊंगा और भोजन के पश्चात फिर दुशासन इन्हे भले ही अपने भवन में ले जाए नहीं युवराज भोजन केवल दो स्थानों पर किया जाता है या तो अपने अतिथ के निवास स्थान पर या फिर अपने मित्र के निवास स्थान पर और ना आप मेरे अतिथ हैं और ना ही मित्र इसलिए मैं महात्मा विदुर जी के घर जाऊंगा वहां कुंती बुआ भी है आज्ञा महाराज आइए विदुर जी आइए [संगीत] वासुदेव सबस ऊंची प्रेम सगा [संगीत] सबस ऊंची प्रेम [संगीत] सगाई दुर्योधन के मेवा त्यागे दुर्योधन के मेवा त्यागे साग विदुर घर खा सबसों ऊंची प्रेम [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] सगाई झूठे फल सबरी के खाए झूठे फल सबरी के खाए बहु विधि स्वाद बताई सब सो ऊंची प्रेम सगाई [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] प्रेम के बस नृप सेवा कीनी प्रेम के बस दप सेवा कीनी आप बने हरि नाई सब सो ऊंची प्रेम सगाई [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] राज सु यज्ञ युधिष्ठिर कीनो राज सु यज्ञ युधिष्ठिर कीनो ता में झूठ उठा सबसों ऊंची प्रेम [संगीत] [संगीत] [प्रशंसा] सगाई प्रेम के बस पथ रथ हा क्यों प्रेम के बस पथ रथ हा क्यों भूली गए टकराई सब सो ऊंची प्रेम सगाई [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत] ऐसी प्रीति बड़ी वृंदावन ऐसी प्रीति बड़ी वृंदावन गोपीन नाच नचाई सब सऊ ऊंची प्रेम सगाई [संगीत] सूर कुर ही लायक नाही सूर कूर ही लायक नाही कह लगी करो बड़ा सबसों ऊंची प्रेम सगाई दुर्योधन के मेवा त्यागे दुर्योधन के मेवा त्यागे साग विदुर घर खाई सब सो ऊंची प्रेम सगाई ऊंची प्रेम [संगीत] सगाई ऊंची प्रेम [संगीत] सगाई बस बस काकी श्री बस आप क्या सोच रहे हैं महात्मा मुझे तुमसे इस अविवेक की आशा नहीं थी वासुदेव अविवेक और नहीं तो क्या तुम्हें मेरे यहां नहीं ठहरना चाहिए था दुर्योधन तो पहले ही दुरात्मा है वह तुम्हारे यहां ठहरने का न जाने क्या अर्थ निकालेगा यदि तुम दुशासन के भवन में ठहर लिए होते तो वो कदाच तुम्हारी बात मान भी लेते पर अब तो वो बिल्कुल नहीं मानेंगे सुनाना मेरा कर्तव्य है महात्मा सुनना या ना सुनना दुर्योधन का कार्य है यदि सुनना चाहेगा तो सुनेगा और यदि सुनना नहीं चाहेगा तो नहीं सुनेगा उसने अपने कान में ता श्री आचार्य द्रोण कृपाचार्य द्रोण पुत्र अश्वथामा और अंगराज करण की वीरता की रुई भर रखी है वासुदेव उसके कान बंद हैं वो सुनना चाहे भी तो नहीं सुन सकता वो यह सोचता है कि पांडव उस सेना के सामने आने की असभ्य नहीं दिखला सकते जिसके सेनापतियों में तात श्री और आचार्य द्रोण भी होंगे परंतु यह दोनों तो विराट में भी थे विराट की बात और थी वासुदेव वह अर्जुन का अपना युद्ध नहीं था अर्जुन मत्स नरेश का आभारी था और दुर्योधन ने मच्छ देश पर आक्रमण किया था परंतु यदि अब युद्ध हुआ तो व अर्जुन का अपना युद्ध होगा यह तो वह जानते हैं महात्मा कि यदि युद्ध हुआ तो उन्हें गंगापुत्र भीष्म और आचार्य द्रोण के विरुद्ध भी शस्त्र उठाना ही पड़ेगा तो फिर हो जाने दो युद्ध हह जाने दो हस्तिनापुर को कि इसके खंडहर पर एक नवीन सुंदर और स्वस्थ सनापुर का निर्माण हो सके वासुदेव तुम अपना शांति प्रस्ताव लेकर राज्यसभा में ना जाओ क्योंकि वहां जो तुम्हारी बात सुनेंगे वह विवश है और जो विवश नहीं है वह तुम्हारी वह तुम्हारी बात नहीं सुनेंगे मैं यह जानता हूं महात्मा जानता हूं फिर भी शांति दूत बनकर आया हूं तो अपने कर्तव्य पालन के उपरांत ही जाऊंगा महारथी महावीर सुदर्शन चक्रधारी मधुसूदन शांति दूत वासुदेव श्री कृष्ण पधार रहे हैं [संगीत] शांति दूत का प्रणाम स्वीकार कीजिए महाराज हे वासुदेव स्थान ग्रहण करके मेरी राज्यसभा का मान बढ़ाइए स्थान ग्रहण कीजिए वास प्रणाम पितामह विराज विराज ता हे वासुदेव अब यह बताइए कि आप मेरे अनुज पुत्रों की ओर से क्या प्रस्ताव लाए हैं हे महाराज गंगापुत्र भीष्म को प्रणाम करने के उपरांत मैं यह निवेदन करना चाहता हूं कि मैं किसी की ओर से कोई प्रस्ताव लेकर नहीं आया हूं मैं तो स्वयं अपनी ओर से आया हूं और अपना ही प्रस्ताव लाया हूं परंतु यह विश्वास अवश्य दिलाता हूं कि जो कुछ मैं स्वीकार कर लूंगा उसे स्वीकार करने में पांडव संकोच नहीं करेंगे हे महाराज आप तो स्वयं ज्ञानी हैं और जानते हैं कि शांति कोई प्रस्ताव नहीं जिस पर वाद विवाद चले शांति एक आवश्यकता है युद्ध में पराजय तो एक ही की होती है किंतु दोनों ही ओर से लड़ने वाले योद्धा वीरगति को प्राप्त होते हैं इस राजसभा में गंगापुत्र भीष्म जैसे ज्ञानी और महात्मा उपस्थित हैं कृप और द्रोण जैसे आचार्य मान है योद्धाओं की जो भीड़ इस राजसभा में है वह आज कदाचित संसार की किसी और राजसभा में नहीं है और इसीलिए इस राजसभा का दायित्व भी सबसे अधिक है यदि युद्ध हुआ तो महात्माओं और योद्धाओं का यह जमघट निसंदेह ही बिखर जाएगा महाराज निसंदेह ही बिखर जाएगा हे महाराज यदि ऐसा हुआ तो इतिहास उन सारे आंसुओं का उत्तरदाई आपको ठहराए जो इस महायुद्ध के उपरांत बहाए जाएंगे हे नरेश आप भरत के वंशज हैं आपके पास धर्म की धरोहर है मर्यादाओं का निक्षेप है इतिहास की थाती है आप न्यास धारी है और आप जैसे न्यास धारी के होते न्यास का अभंग नहीं होना चाहिए महाराज न्यास का अभंग नहीं होना चाहिए और इसीलिए हे धर्म ध्वज रक्षक मैं जो कहने जा रहा हूं उसे ध्यान से सुनिए शांति कभी असंभव नहीं हो सकती और इसीलिए कुरुवंश को शांति के मार्ग पर ले चलिए महाराज शांति के मार्ग पर ले चलिए कि इसी में भरत वंश भारतवर्ष और सारे संसार की भलाई है इतिहास गंधार नरेश शकुनी से यह नहीं पूछेगा कि इन्होंने द्यूत क्रीड़ा में कपट क्यों किया था क्योंकि वह कपट आपकी सभा में हुआ था महाराज इतिहास युवराज दुर्योधन से भी यह नहीं पूछेगा कि इन्होने भरत कुल वधु को भरी सभा में क्यों घसीट बुलवाया इतिहास यह भी आप ही से पूछेगा महाराज क्योंकि दुर्योधन आपके युवराज है इतिहास दुशासन से भी यह नहीं पूछेगा कि इन्होंने दुर्योधन के कहने पर भरत कुल वधु द्रौपदी का वस्त्र हरण करने की असभ्य क्यों दिखाई इतिहास इसके लिए भी आप को दोषी आप ही को उत्तरदाई ठहराए महाराज आप ही को उत्तरदाई ठहराए इसलिए यह जान लीजिए कि शांति का कोई विकल्प नहीं है युद्ध तो कदाचित कोई नहीं चाहता केशव यदि कोई युद्ध नहीं चाहता पिता मा तो फिर यह कदाचित क्यों कदाचित यह तो आप भी जानते हैं पिता मा और मैं भी युद्ध चाहने वाले इधर भी है और उधर भी इसलिए आज कदाचित जैसे शब्दों को इस राज्यसभा से निकाल दीजिए पितामह क्योंकि कदाचित जैसे शब्दों की छाया में शांति की बात नहीं हो सकती हे पितामह समझाइए अपने नरेश को कि यदि कौरवों और पांडवों में मिलाप हो जाए तो यह सारा संसार उनका हो सकता है उनकी राज्य सीमा के अतिरिक्त और सीमा रह ही नहीं जाएगी किंतु जो युद्ध हुआ महाराज तो आपके पास कुछ नहीं रह जाएगा ना पुत्र और ही अनुज पुत्र क्या पता आपको किस किस के शव पर रोना पड़े महाराज किस किस के शव पर रोना पड़े क्या आपके पास आपके अनुज पुत्रों में से किसी का शव आए महाराज तो क्या आप उसे शत्रु का शव मानकर किसी प्रकार का अनंद अनुभव कर पाएंगे हे वृद्ध नरेश इससे पहले कि आप प्राण त्यागे कुल को एकत्र कीजिए नरेश महाभारत महाभारत [संगीत] महाभारत महाभारत
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