[संगीत] प्रभु श्री हरि अपने भक्तों से अपार प्रेम करते हैं इसीलिए उनके कष्ट हरने के लिए वे कहीं भी किसी भी रूप में प्रकट हो जाते हैं इसीलिए पुत्र क्योंकि भगवान सदैव अपने भक्तों को अपने से भी उच्च स्थान देते हैं परंतु माता यदि भगवान ना हो तो भक्तों का अस्तित्व असंभव है ना पुत्र भक्त और भगवान एक दूसरे के पूरक हैं इसीलिए हम दोनों के ही कथन अपने अपने स्थान पर सर्वदा उचित है पुत्र हनुमान तुमने इस पर ध्यान दिया कि अब तक के प्रभु श्री हरि के सभी अवतारों में संसार के जीवन चक्र के विकास का सार भी छुपा हुआ है है सृष्टि के प्रारंभ में संसार में जल तत्व की ही प्रधानता थी वही जीवन प्रारंभ हुआ इसीलिए प्रभु विष्णु जी का प्रथम अवतार जलम मत्स के रूप में हुआ फिर जल और थल पर विचरण करने वाले कुर्म रूप में द्वितीय फिर थल पर ही रहने वाले निम्न श्रेणी के पशु वराह रूप में तृतीय अवतार लिया [संगीत] फिर नरसिंह अवतार अर्थात पशुओं के राजा सिंह और मनुष्य के समिश्रा [संगीत] के रूप में प्रभु ने अवतार [संगीत] लिया समझ गया माता इसीलिए जीवन के विस्तार के क्रम के अनुसार प्रभु श्री हरि का आगामी अवतार मनुष्य के रूप में होना था हा पुत्र इस बार पृथ्वी पर प्रभु विष्णु जी का आगमन बाल ब्रह्मचारी रूप में हुआ परंतु माता हनुमान को बताइए ना प्रभु ने अपना पंचम अवतार कब और क्यों लिया पुत्र त्रेतायुग में जब अमृत पाकर सभी देवता अमृत्य के अहंकार के मध में चूर होकर अपने अपने कर्तव्यों के प्रति असावधानी हो गए थे परंतु असुरों के गुरु शुक्राचार्य जी द्वारा मृत संजीवनी मंत्र का ज्ञान प्राप्त कर असुरों ने भी मृत्यु [संगीत] परंतपा ॐ यमकम यजामहे ओ तत्सवितुर्वरेण्यं ओम सुगंधिम पुष्टिवर्धनम ओम भर्गो देवस्य धीमहि ओ उर्वारुकमिव [संगीत] बंधना ओम धियो योन प्रचोदयात ओ मृत्य मुक्षीय मामता ओम स्वः ओम भुव ओम भू ओम सह ओम जूम ओम होम [हंसी] [संगीत] [संगीत] ओम [संगीत] अरे हम पुन जीवित हो गए पुन जीवित हो गए हम पुन जीवित हो गए फिर देवताओं से युद्ध में रक्त असुर सेना हताहत होकर भी पुनर्जीवित होने लगी देवता परास्त हो गए थे और अपना बचाव सुनिश्चित करने के लिए उन्हें अपना स्वर्ग छोड़ने पर बाध्य होना पड़ा तब स्वर्ग और पृथ्वी पर विजय पाकर हिरण कश्यप की चौथी पीढ़ी के वंशज चक्रवर्ती अशु सम्राट बली त्रि लोकों के अधिराज बन गए फिर क्या हुआ माता फिर गुरु शुक्राचार्य के सुझाव पर राजा बली ने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया जिससे देवताओं पर असुरों की श्रेष्ठता अनंत काल के लिए स्थिर हो जाए अर्थात माता अच्छाई पर बुराई की की प्रभुता सदा के लिए स्थापित करने का प्रयास था ये हां पुत्र देवताओं की ऐसी दीन हीन अवस्था उनकी माता अदिति से देखी नहीं गई तब उन्होंने देवताओं के पुनर उद्धार के लिए प्रभु विष्णु जी की प्रार्थना प्रारंभ की और दीर्घ काल तक उनकी तपस्या का अद्भुत फल उन्हें प्राप्त हुआ ओ नारायणाय नमः ओम नाराय नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओम नारायणाय नमः ओ नारायणाय नमः ओम नारायणाय [संगीत] नमः प्रभु प्रणाम श्री हरि नारायण कल्याण हो देवी अदिति प्रभु इस मां का हृदय अपने पुत्रों की लाचार अवस्था देखकर अत्यंत व्यथित है आप ही उनकी सहायता कर सकते हैं प्रभु आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी देवी परंतु देवताओं को भी सजगता पूर्ण पद के अनुरूप व्यवहार कर अपने पद के योग्य बने रहना होगा क्योंकि योग्यता खोते ही व्यक्ति के उस पद पर स्थित रहने का अधिकार स्वतः नष्ट हो जाता है अपने पद के दायित्व भुलाकर देवताओं के भोग विलास में पूर्णत लिप्त रहने के कारण ही असुरों को अपनी शक्ति में वृद्धि का अवसर प्राप्त हुआ प्रभु मैं वचन देती हूं कि देवताओं के पद का दायित्व मैं स्वयं उन्हे समझाऊ अपना दोस्त तो उन्हें स्वयं ज्ञात हो गया जिसका उन्हें पछतावा भी है परंतु अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा लौटाने में उन्हें आपके सहायता की आवश्यकता है प्रभु आप चिंता ना करें देवी मैं एक की व्यथा समझता हूं इसीलिए आपके मातृत्व का आदर करते हुए मैं आपके पुत्र के रूप में अवतार लूंगा और देवताओं और मनुष्य जाति का उद्धार करूंगा जिसकी इच्छा थी उससे कहीं अधिक प्राप्त हो गया प्रभु आपको अपने पुत्र के रूप में पाकर ये मां धन्य हो गई आपकी ये भक्ति आपकी कृपा पाकर कृतार्थ हुई प्रभु [संगीत] कल्याण प्रभु श्री हरि का नन्हा सा रूप कितना मनोहर हुआ होगा ना माता परंतु उनके इस अवतार को क्या नाम मिला और इसके उपरांत क्या हुआ पुत्र स्वयं स्वामी अर्थात ब्रह्मा जी द्वारा प्रभु विष्णु जी के इस रूप का नामक हुआ और जगत में प्रभु विष्णु जी का यह रूप वामन नाव के अवतार से प्रसिद्ध हुआ माता हनुमान यह समझ नहीं पा रहा है कि एक नन्हे से बालक के रूप में प्रभु विष्णु जी समस्त देवताओं को पुनः स्वर्ग लौटाने में कैसे सहायक बने उस पराक्रमी योद्धा चक्रवर्ती असुर सम्राट बली से युद्ध कैसे किया उन्होंने यदि व्यक्ति का उद्देश्य शुद्ध एवं धर्म उचित हो तो व्यक्ति के दोष भी उसकी शक्ति बन जाते हैं इसीलिए किसी की क्षमता का आकलन कभी भी उसके कद या उसकी शारीरिक बनावट से कदापि नहीं करना चाहिए अन्यथा इस त्रुटि का भारी मूल्य चुकाना पड़ सकता है और ऐसी ही भूल चक्रवर्ती असुर सम्राट राजा बलि भी कर बैठा कैसी भूल माता जब राजा बली गुरु शुक्राचार्य के निर्देशानुसार उनकी देखरेख में में अश्वम यज्ञ का आयोजन कर रहे थे और यज्ञ की पूर्ति में ब्राह्मणों को दान देने की एक मात्र अंतिम ति शेष थी तब प्रभु विष्णु जी के वामन अवतार ने यज्ञ वाटिका में प्रवेश [संगीत] किया अहम राष्ट्री संग मनी वसु नाम चतु प्रथमा यज नाम ताम मा देवा पुत्रा भूरी स्थाना भूर बश यम [संगीत] नती ओ सहनाववतु सहनो भुनक्तु सह विरम करवावे तेजस्वी वतम मस्तु मा विद विषव सर्वे भवंतु सुखिन सर्वे संतु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चित दुख भा भवे कौन है जो इतने मधुर और सोहक स्वर में वेदों का पाठ कर रहा है प्रणाम ब्राह्मण [संगीत] श्रेष्ठ आप जैसे दिव्य ज्ञान संपन्न अद्भुत आलौकिक व्यक्तित्व के मेरे इस स्मेद यज्ञ के आयोजन में पधारने से मैं राजा बली कृतार्थ हुआ मुझे विश्वास आपकी कृपा से मेरा यह यज्ञ अवश्य सफल होगा परंतु सर्वप्रथम इतना बताने की कृपा अवश्य करें कि आप कौन है ब्राह्मण श्रेष्ठ अपना परिचय देने की कृपा करें अपना नाम बताएं विप्र भ राजन संसार के समस्त नाम मेरे ही तो है कौन सा नाम बताऊ आपको वैसे भी व्यक्ति के पहचान उसके कर्मों से होती है नाम से [संगीत] नहीं इतना बताने की कृपा करें ब्राह्मण श्रेष्ठ कि आप आए कहां से हैं आपका निवास कहां है बाल ब्रह्मचारी का कोई ठौर कहां जहां उसके पगत हम जाते हैं वही उसका गांव जाता है राजन तो मैं आपको कैसे बताऊं कि मेरा निवास कहां का है हां आप यह अवश्य कह सकते हैं कि मैं समस्त ब्रह्मांड का हू और संपूर्ण ब्रह्मांड ही मेरा निवास स्थान है आपका कथन सर्वथा उचित है ब्राह्मण श्रेष्ठ हे विप्र अपने यज्ञ को पूर्ण करने हेतु मैं दान कर पुण्य लाभ प्राप्त कर रहा हूं आप आज्ञा दें मैं आपके लिए क्या प्रस्तुत करूं राजन आप क्या दे सकते हैं [संगीत] मुझे राजन आप क्या दे सकते हैं मुझे बहुमूल्य रत्न मूल्यवान आभूषण रथ वस्त्र खेत आपके रहने हेतु प्रासाद संपूर्ण ग्राम सुंदर सेविका जो आपकी इच्छा हो मांग लीजिए मैं सहर्ष आपको प्रदान करूंगा भोग विलास की इन वस्तुओं का मेरे लिए क्या उपयोग राजन धन संपत्ति वाहन इत्यादि सांसारिक क्रियाकलाप में लीन मनुष्य की आवश्यकता पूर्ण करते हैं मैं ठहरा एक बाल [संगीत] ब्रह्मचारी आपका विनम प्रस्ताव पाकर मैं आपका कृतज्ञ हूं राजन परंतु जिन का भी आपने नाम लिया मैं उन्हें स्वीकार नहीं कर सकता परंतु मेरे द्वार से आप जैसा बाल ब्रह्मचारी तपस्वी रिक्त हाथ वापस कैसे जा सकता है ऐसा कैसे संभव है कुछ तो होगा जिसकी आपको आवश्यकता हो और मैं दान कर सकूं आपकी जो भी इच्छा होगी मैं सहर्ष प्रदान करूंगा राजन यदि आप कुछ देना ही चाहते हैं तो मैं आपसे वो सब दान में मांगता हूं जो मेरे तीन पग में समान पग में समा जाए समा कहिए व मुझे देंगे [संगीत] आप अ राजा बली रुक जाइए रुक जाइए अभी भी समय है रुक जाइए अन्यथा अनर्थ हो जाएगा सोचिए राजन आप तीनों लोगों के सम्राट महान दैत्य राज बली जो संसार में कोई भी वस्तु देने में समर्थ है उनसे मात्र तीन पग में समाने योग्य वस्तुएं कैसे मांग सकता है गुरुदेव आप तो स्वयं जानते हैं ऋषि मुनियों के कुछ संकल्प होते हैं वो उन संकल्प से अधिक कुछ नहीं मांगते आप समझ नहीं रहे हैं राजन मैं पूर्ण विश्वास के साथ कह सकता हूं कि यह कोई अन्य नहीं श्री हरि विष्णु देव श्री हरि विष्णु [संगीत] देव यह आप क्या कह रहे हैं यही सत्य है ये इंद्र एवं अन्य देवताओं के हित साधन के लिए यहां [संगीत] है यदि आपने इनकी बात मानकर उनकी इच्छा अनुसार दान देने का संकल्प ले लिया सब कुछ कवा देंगे [संगीत] जो अपने गुरु पर विश्वास करता है उसका कभी अहित नहीं होता विश्वास कीजिए मुझ पर मत दीजिए दान [संगीत] यदि आपकी बात सत्य है तो यह स्वयं दाता है इन्हें कोई क्या दान [संगीत] देगा सोचिए गुरुदेव संपूर्ण संसार जिनके समक्ष हाथ फैलाए खड़ा रहता है वे आज मेरे समक्ष हाथ फैलाए खड़े हैं स्वयं प्रभु का हाथ नीचे और मेरा हाथ ऊपर संसार में ऐसा सौभाग्य तो कदाचित ही किसी को प्राप्त हुआ होगा य आपका सौभाग्य नहीं दैत्य राज दुर्भाग्य होगा नहीं गुरुदेव इतिहास के स्वर्णम अक्षरों में यह लिखा जाएगा कि एक दैत्य राज ऐसा भी था जिसने स्वयं प्रभु को दान दिया और फिर दान देने का सुख उपभोग करने के सुख से सहस्त्र गुना अधिक होता है गुरुदेव और पुण्य दई [संगीत] भी इस विलंब के लिए क्षमा करें विप्र मैं दान देने का संकल्प लेने के लिए प्रस्तुत हूं आप पुनः सोच लीजिए क्या आप उतना ही चाहते हैं जो आपके तीन पग में समा जाए इस संसार में मात्र तीन पग धरती मनुष्य की अपनी होती है उससे अधिक की इच्छा करने वाले मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं होते राजन मुझे मात्र उतना ही चाहिए जितना मेरे तीन पग में समा जाए नहीं मैं ऐसा नहीं होने दूंगा यह विष्णु देव देवताओं के हित है तो मैं असुर गुरु शुक्राचार्य असुरों का हित हू असुरों के हि साधन के लिए मुझे कुछ भी करके य दान रोकना [संगीत] होगा देव प्रतिष्ठा सुर हरे तब हरि वामन रूप धरे जो समती ना पग माए दान बली वो कर पाए दैत्य गुरु पहचान करे विष्णु वामन रूप धरे रोके हेतु शुक्र चली दृढ़ संकल्पा किंतु [संगीत] बली ईश्वर किसी भी रूप में दर्शन दे सकते हैं आवश्यकता है पहचानने की
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